विजयादशमी पर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने किया शस्त्र पूजन, सिटी पैलेस में दिखी वीरता की विरासत

Last Updated:October 21, 2026, 09:27 IST
Lakshraj Singh Mewar Shastra Pujan 2026: उदयपुर के सिटी पैलेस स्थित ऐतिहासिक सलेहखाना में विजयादशमी के पावन पर्व पर मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने अपने पुत्र महाराज कुमार हरितराज सिंह के साथ पूर्वजों के ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्रों का विधि-विधान से पूजन किया. महाराणा प्रताप और महाराणा सांगा के समय के खांडा, तलवारें, कटार, ढाल और धनुष-बाण जैसी अनमोल धरोहरों की पंडितों के मंत्रोच्चार के बीच पूजा की गई. इस दौरान मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास और समृद्ध राजपरंपरा की अनूठी झलक देखने को मिली.
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Udaipur: विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. इस पावन अवसर पर देशभर में शस्त्र पूजन की प्राचीन परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उदयपुर में मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और 77वें श्री एकलिंग दीवान डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने अपने सुपुत्र महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ के साथ अपने वीर पूर्वजों के ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्रों का विधि-विधान से पूजन किया. यह भव्य और पारंपरिक आयोजन उदयपुर सिटी पैलेस स्थित ऐतिहासिक शस्त्रागार ‘सलेहखाना’ में संपन्न हुआ.
महाराणा उदयसिंह द्वितीय के शासनकाल में निर्मित सिटी पैलेस का ‘सलेहखाना’ मेवाड़ के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में शुमार है. यहाँ महाराणा सांगा, महान योद्धा महाराणा प्रताप, महाराणा राज सिंह और मेवाड़ के अन्य यशस्वी महाराणाओं से जुड़े ऐतिहासिक हथियारों का अनमोल संग्रह आज भी पूरी सुरक्षा के साथ संरक्षित है. विजयादशमी के दिन इन अस्त्र-शस्त्रों का पूजन कर मेवाड़ की उस वीरता, युद्ध कौशल और पराक्रम को याद किया गया, जिसने इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है. पंडितों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सभी पारंपरिक हथियारों की पूजा-अर्चना की गई.
कला और शिल्पकला का अनूठा संगम हैं मेवाड़ के हथियारमेवाड़ के ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्र केवल युद्ध लड़ने के साधन मात्र नहीं थे, बल्कि वे उत्कृष्ट शिल्प कला का भी बेहतरीन नमूना रहे हैं. यहाँ के महाराणा विशेष उत्सवों और राजकीय आयोजनों में खास तौर पर तैयार की गई तलवारें साथ रखते थे. इन तलवारों की मूठ पर सोने के बारीक तार, स्वर्ण वर्क, कुंदन, मीनाकारी और कीमती रत्नों से नक्काशी की जाती थी. इसके अलावा ढालों पर की गई स्वर्णकारी और भालों व कटारों पर उकेरी गई सुंदर कलाकृतियां मेवाड़ के हुनरमंद कारीगरों की कला को बयां करती हैं. इस पूजन में खांडा, तलवारें, भाले, कटार, ढाल, बंदूकें और पारंपरिक हथियारों को शामिल किया गया.
आदिवासी योद्धाओं के योगदान का प्रतीक धनुष-बाणइतिहास गवाह है कि महाराणा प्रताप की सेना और संघर्ष में मेवाड़ के आदिवासी योद्धाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा था. धनुष और बाण उनके मुख्य पारंपरिक युद्ध उपकरणों का हिस्सा हुआ करते थे. इसी ऐतिहासिक और सामाजिक समरसता की परंपरा को सम्मान देते हुए शस्त्र पूजन में धनुष और लोहे के बाणों को भी विशेष रूप से शामिल किया गया. विजयादशमी पर हुआ यह शस्त्र पूजन समारोह मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पूर्वजों के अदम्य शौर्य और गौरवशाली इतिहास को जीवंत करने का एक ऐतिहासिक अवसर साबित हुआ.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Udaipur,Udaipur,Rajasthan
First Published :
October 21, 2026, 09:27 IST



