सपने पूरे करने बच्चों को भेजा दिल्ली, वहां से लौटीं लाशें… सत्य निकेतन हादसे की ये तस्वीरें देख छलक जाएंगे आंसू

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‘बच्चों को दिल्ली मत भेजो…’ सत्य निकेतन की ये तस्वीरें देख छलक जाएंगे आंसू
Agency:एजेंसियां
Last Updated:September 08, 2026, 23:37 IST
Satya Niketan Building Collapse: दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने के बाद कई परिवारों के सपने मलबे में दब गए. माता-पिता ने बच्चों को बेहतर शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद में राजधानी भेजा था, लेकिन सात लोगों की मौत ने उनकी जिंदगी बदल दी. इस हादसे के बाद परिवारों का भरोसा टूट गया है. उनका दर्द एक ही सवाल में सिमट गया है- क्या बच्चों के भविष्य के लिए दिल्ली भेजना इतनी बड़ी कीमत मांगता है?
हर माता-पिता की तरह इन परिवारों ने भी अपने बच्चों के लिए बड़े सपने देखे थे. किसी को अच्छे कॉलेज में पढ़ाना था, किसी को बड़ा अफसर बनते देखना था तो किसी को अपने पैरों पर खड़ा होते हुए. इसी उम्मीद में घर से दूर, दिल्ली भेजा था. लेकिन राजधानी में पढ़ाई और बेहतर भविष्य की तलाश में निकले बच्चों में से कुछ की कहानी रविवार को सत्य निकेतन की एक इमारत के मलबे में हमेशा के लिए खत्म हो गई. अब इन परिवारों के पास दिल्ली से जुड़ी यादों में सपनों की चमक नहीं, बल्कि अस्पताल, मलबा, तलाश और अपनों को खोने का दर्द है. सात लोगों की मौत वाले इस हादसे के बाद कई परिवारों की जुबान पर एक ही बात है- ‘अपने बच्चों को दिल्ली मत भेजो.’
मध्य प्रदेश के देवास के रहने वाले भूपेंद्र जाज ने अपने बेटे अंकित को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए परिवार के साथ काफी संघर्ष किया था. उनके लिए दिल्ली उम्मीद थी, लेकिन रविवार के हादसे ने उसी उम्मीद को मातम में बदल दिया. इमारत ढहने में अंकित की मौत हो गई. भूपेंद्र बताते हैं कि हादसे के कुछ ही देर बाद बेटे के एक दोस्त का फोन आया. उसने पूछा कि अंकित कहां है और चेतावनी दी कि अगर वह अभी देवास में है तो उसे उस इलाके में न जाने दिया जाए. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अंकित सुबह ही दिल्ली पहुंच चुका था.
भूपेंद्र के मुताबिक, परिवार जब दिल्ली पहुंचा तो उन्हें अपने बेटे के बारे में सही जानकारी हासिल करने के लिए भी काफी भटकना पड़ा. उन्होंने बताया कि हादसे के बाद परिवार को किसी ने स्पष्ट जानकारी नहीं दी. उन्हें केवल कुछ तस्वीरें दिखाई गईं, जबकि मलबे में कई और शव मौजूद थे. एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि जिस बेटे को बेहतर भविष्य के लिए घर से हजारों किलोमीटर दूर भेजा, उसे आखिरी बार देखने के लिए भी उसे व्यवस्था से जूझना पड़ा. परिवार अब इस हादसे की गहराई से जांच चाहता है.
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अंकित की मौत के बाद परिवार ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने इस असहनीय दुख के बीच मानवता की एक उम्मीद भी जगा दी. डॉक्टरों ने परिवार को बताया कि मलबे में दबने की वजह से अंकित की एक आंख खराब हो चुकी थी, लेकिन दूसरी आंख दान की जा सकती है. परिवार ने बिना देर किए उसकी आंख दान करने का फैसला कर लिया. भूपेंद्र ने कहा कि उन्होंने उसी समय तय कर लिया था कि बेटे की आंख किसी जरूरतमंद की जिंदगी में रोशनी बन सके, तो उसके जाने के बाद इससे बेहतर श्रद्धांजलि क्या होगी.
अंकित के दादा माखनलाल जाज के लिए यह सिर्फ पोते को खोने का दुख नहीं, बल्कि परिवार की उम्मीदों के अचानक खत्म हो जाने जैसा है. उन्होंने आरोप लगाया कि हादसे के बाद परिवार को अधिकारियों से पर्याप्त मदद नहीं मिली. उनका कहना है कि ऐसी जर्जर इमारतों को समय रहते खाली कराया जाना चाहिए था. माखनलाल की आवाज में बेटे की मौत का दर्द साफ था. उन्होंने कहा, ‘हमारी सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं… अब हमारे पास क्या बचा है?’
सत्य निकेतन हादसे ने जम्मू के एक परिवार को भी गहरे सदमे में डाल दिया है. 19 वर्षीय नीरज बावा दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में दूसरे वर्ष का छात्र है. वह जम्मू से दिल्ली इसलिए आया था क्योंकि वह अच्छे कॉलेज में पढ़ना चाहता था. अब वह अस्पताल की ICU में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है. हादसे में उसके शरीर के निचले हिस्से में गंभीर चोटें आई हैं.
नीरज के रिश्तेदार अशोक कुमार ने बताया कि परिवार को हादसे की जानकारी किसी अधिकारी से नहीं, बल्कि मीडिया के जरिए मिली. नीरज के पिता सेना से सेवानिवृत्त हैं. जब उन्होंने टीवी पर इमारत गिरने की खबर देखी तो शुरुआत में उन्हें इस घटना का नीरज से कोई संबंध नहीं लगा. लेकिन फिर उन्हें याद आया कि उनका बेटा भी सत्य निकेतन इलाके में पीजी में रहता है. इसके बाद परिवार ने उसकी तस्वीर तलाशनी शुरू की. जैसे ही नीरज की तस्वीर मिली, परिवार ने टैक्सी ली और जम्मू से दिल्ली के लिए निकल पड़ा.
सत्य निकेतन हादसे ने जम्मू के एक परिवार को भी गहरे सदमे में डाल दिया है. 19 वर्षीय नीरज बावा दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में दूसरे वर्ष का छात्र है. वह जम्मू से दिल्ली इसलिए आया था क्योंकि वह अच्छे कॉलेज में पढ़ना चाहता था. अब वह अस्पताल की ICU में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है. हादसे में उसके शरीर के निचले हिस्से में गंभीर चोटें आई हैं. नीतीश की मां सीमा चिब ने बताया कि उनकी बेटी पहले दिल्ली आकर पढ़ाई करने के बारे में सोच रही थी. लेकिन सत्य निकेतन की घटना के बाद उसने अपना फैसला बदल दिया है. एक हादसे ने सिर्फ एक परिवार से बेटा नहीं छीना, बल्कि दूसरे परिवारों से उस शहर पर भरोसा भी छीन लिया, जहां वे अपने बच्चों का भविष्य बनाने आए थे.
सत्य निकेतन की पांच मंजिला पीजी इमारत के मलबे में फंसे लोगों को निकालने के लिए करीब 27 घंटे तक बचाव अभियान चला. रेस्क्यू ऑपरेशन सोमवार शाम खत्म हुआ. इस हादसे में सात लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए. लेकिन मलबा हटने के साथ सिर्फ ईंट और सीमेंट नहीं निकला. उसके साथ कई परिवारों की उम्मीदें भी बाहर आईं- कहीं किसी का बेटा था, कहीं किसी का भाई, कहीं किसी परिवार का सबसे छोटा बच्चा. ये वे बच्चे थे जिन्हें उनके माता-पिता ने अपने घरों से दूर इसलिए भेजा था कि वे पढ़ें, आगे बढ़ें और एक दिन परिवार का नाम रोशन करें.
सत्य निकेतन हादसे के बाद इन परिवारों के लिए दिल्ली अब सिर्फ पढ़ाई और अवसरों का शहर नहीं रह गया है. किसी के लिए यह वह जगह है जहां उसका बेटा आखिरी बार गया था, किसी के लिए वह शहर जहां से उसका बच्चा अस्पताल पहुंचा, और किसी के लिए वह जगह जहां से उसके घर की सबसे बड़ी उम्मीद हमेशा के लिए चली गई. इसीलिए इन परिवारों के मुंह से बार-बार एक ही बात निकल रही है- बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्हें घर से दूर जरूर भेजिए, लेकिन ऐसी जगह नहीं जहां उनकी सुरक्षा ही दांव पर लग जाए. क्योंकि इन परिवारों ने अपने बच्चों को दिल्ली सपने पूरे करने भेजा था… सपने तो पूरे नहीं हुए, लेकिन घर लौट आया जिंदगी भर का दर्द.
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September 08, 2026, 23:37 IST



