सस्ती दवा को भयंकर महंगा बेचने वालों के पीछे कौन… सबको जेल जाना होगा?

मरीजों को दवा माफिया कैसे लूटने में लगा हुआ है. कैसे दवा पर मनमानी MRP छापकर मोटे मुनाफे का खेल चल रहा है. पब्लिक से जुड़े इस सबसे बड़े मुद्दे को हमने कल ही देश की पाठशाला में उठाया था और इस खबर पर देश भर से जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला है. पब्लिक ने कहा कि कोई तो न्यूज़ चैनल है, कोई तो शो है जो पब्लिक की बात कर रहा है.. और हमने आपसे कल ही वादा किया था कि हम इस मुद्दे को छोड़नेवाले नहीं हैं.. आज इसका पार्ट-2 लेकर आए हैं.. हर कोई इस खुलासे से शॉक्ड है कि कि किसी दवा की कीमत पर 4 हजार, 5 हजार परसेंट तक का मार्जिन कैसे कमाया जा सकता है. ये तो वाकई मरीज से खुलेआम लूट हुई. लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है कि सस्ती दवा को भयंकर महंगा बेचने वालों के पीछे कौन है. और महंगी दवाओं को लिए मरीजों को घर, जमीन, गहने बेच देने के लिए मजबूर करने वाले इन लोगों को जेल क्यों नहीं भेजा जाता. क्योंकि दवाओं में भयंकर मुनाफाखोरी से भी इन लोगों का लालच खत्म नहीं होता दिख रहा है. बच्चों की नकली दवा के लिए जानवरों की दवा वाला ऐसा खेल हो रहा, जिसे देखकर हिल जाएंगे.
सस्ती दवा भयंकर महंगा बेचने वाला खेलगरीब और मजबूर आदमी से दवा के नाम पर हजार गुना मुनाफा कमानेवालों और इस पर भी नकली दवा बेचकर उनकी जान से खिलवाड़ करने वालों का इलाज कौन करेगा. सस्ती दवा को भयंकर महंगा बेचने वाला खेल क्या है. इसके बारे में आगे बताएंगे. लेकिन पहले देखिए दवाओं पर मोटा मुनाफा कमाने के बाद भी कैसे लोगों की जान से खिलवाड़ का गंदा धंधा चल रहा है. छोटे छोटे बच्चों की भी जान जोखिम में डाली जा रही है. गुजरात के सूरत में पुलिस के स्पेशल टीम ने FDA की टीम के साथ मिलकर एक मेडिकल स्टोर में छापेमारी की. मेडिकल स्टोर चलाने वाले पर घोड़े, गाय और भैंस जैसे जानवरों के लिए इस्तेमाल होने वाले लिवर टॉनिक को बच्चों की दवा बताकर बेचने का आरोप लगा है.
पुलिस के मुताबिक आरोपी मेडिकल स्टोर वाला जानवरों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाई को छोटी शीशियों में भरकर बच्चों के लिए बेचता था. और 60 ML और 100 ML वाली इन शीशियों में खासकर बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा का स्टीकर लगा दिया जाता था. पुलिस ने आरोपी मेडिकल स्टोर चलाने वाले मोहम्मद साजिद मुल्ला को गिरफ्तार कर लिया है. पूछताछ में उसने बताया उससे पुलिसवालों के भी होश उड़ गए. आप भी देखिए बच्चों की जान से खिलवाड़ करके कैसे मोटे मुनाफे का खेल चल रहा था.
जानवरों वाली दवा1 लीटर की MRP- 360 रुपये
इंसानों वाली दवा100 ML की MRP- 140 रुपये
1 लीटर की MRP- 1400 रुपये
1 लीटर पर मुनाफा- 1140 रुपये
ये मुनाफा और भी ज्यादा होगा, क्योंकि MRP पर मार्जिन को जो खेल चल रहा है. उससे साफ है कि जानवरों वाली दवा मेडिकल स्टोर वाले को और भी सस्ती मिली होगी. मतलब पैसे की भूख तब भी खत्म नहीं रही है, भले ही इंसान की जान खतरे में क्यों पर पड़ जाए. अब बात सस्ती दवा को भयंकर महंगा बेचने वाले खेल पर नकेल कसने की. कैंसर की दवाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार भी एक्शन मोड में आ चुकी है. कैंसर की महंगी दवाओं पर राहत देने के लिए सरकार ने 8 अक्टूबर को बड़ा फैसला लिया. जिसके तहत कैंसर की दवाओं पर मुनाफा 30 प्रतिशत तक सीमित हो जाएगा. ये मुनाफा दवा के दवा कंपनी से निकलकर मरीज के पास पहुंचने तक की कीमत के हिसाब से तय होगा.
कैंसर की 2700 वाली दवा की कीमतों में कितना फर्क पड़ेगा?दरअसल किसी भी कंपनी में बनने के बाद दवा डिस्ट्रीब्यूटर तक पहुंचती है. डिस्ट्रीब्यूटर इसे रिटेलर या केमिस्ट को PTR यानी प्राइस टू रिटेलर को देते हैं. जिसे रिटेलर MRP मैक्सिमम रिटेल प्राइस पर मरीज को बेचते हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने PRT और MRP के बीच के बड़े अंतर पर सबसे ज्यादा चिंता जताई है. अब ये भी देखिए सरकार के इस फैसले से उस कैंसर की उस 27 सौ वाली दवा की कीमतों में कितना फर्क पड़ेगा. जिसे 27 हजार में बेचा जा रहा है. और जिसका जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों सुनवाई के दौरान किया.
कैंसर की दवाPTR- 2700 रुपये
MRP- 27000 रुपये
कुल मार्जिन- 24 हजार 300 रुपये
PRT पर मार्जिन- 900%
सरकार के फैसले का असरमार्जिन- MRP का 30% तक सीमित
अधिकतम MRP- 3857 रुपये
मरीज की कितनी बचत- 23 हजार 143 रुपये
… तो MRP का खेल खत्म हो जाएगासरकार ने उम्मीद जताई है कि कैंसर दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय करने से मरीजों को हर साल करीब 25 सौ करोड़ की बचत होगी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट का कहना है सरकार के इस फैसले में खुश होने जैसा कुछ नहीं है. कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि जब कैंसर की दवाओं का मार्जिन तय किया जा सकता है, तो दूसरी दवाइयों की कीमत पर कंट्रोल क्यों नहीं किया जा सकता. जिस पर एक्शन प्लान बताने के लिए सरकार को 27 अक्टूबर तक का समय दिया गया है. वहीं दवा कारोबार से जुड़े लोगों का भी मानना है कि दवाओं के मार्जिन पर 30 परसेंट का कैप लगाने से MRP का खेल खत्म हो जाएगा और मरीजों को बहुत बड़ी राहत मिलेगी. केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारें भी मरीजों को लूटने वाले MRP के खेल पर नकेल कसने में जुट गई हैं.
– पिछले दिनों यूपी में भी फूड एंड ड्र्ग एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट ने राज्य के 214 मेडिकल कॉलेज और प्राइवेट अस्पतालों की फार्मेसी में दवाओं की जांच की.
– 130 दवाओं के एनालिसिस से पता चला कि दवाओं की खरीद और MRP में बड़े अंतर का खेल चल रहा है.
– इनमें 36 दवाएं ऐसी मिलीं, जिन पर MRP खरीद की कीमत से 10 गुना से भी अधिक था.
– जबकि कुछ दवाओं में तो खरीद और MRP में 67 गुना तक का अंतर मिला.
– जैसे बैक्टीरियल इंफेक्शन में इस्तेमाल होने वाला पॉलीमाइक्सिन-B इंजेक्शन, जिसे करीब 74 रुपये में खरीदा गया, उस पर करीब 4981 MRP छपी हुई मिली.
– इसी तरह बेवाकि-ज़ुमैब दवा को देखिए, जिसकी खरीद की कीमत 7 हजार 541 रुपये थी, लेकिन इस पर MRP 69 हजार 995 छपी हुई थी. यानी PTR और MRP में 62 हजार 453 का बड़ा अंतर.
प्राइवेट अस्पतालों की मनमानीहमारी पड़ताल में एक मेडिकल स्टोर पर केमिस्ट ने बताया कि MRP का खेल होता कैसे है. केमिस्ट ने बताया कि MRP ज्यादा प्रिंट होने का फायदा ये होता है कि दुकानदार इसे अपनी मर्जी की कीमत पर बेच सकते हैं. और मोटा मुनाफा कमाकर भी मरीज के ये दिखाते हैं कि उसे दवा डिस्काउंट पर मिल रही है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया है कि कई प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों को जबरन इन हाउस फार्मेसी से ही महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अस्पताल अब सर्विस प्रोवाइडर की नहीं बल्कि मुनाफा कमाने वाली इंडस्ट्री की तरह काम कर रहे हैं.
इन पर कोई डिस्काउंट भी नहीं दिया जातासुप्रीम कोर्ट की इस चिंता पर जब हमने दवा कारोबार से जुड़े लोगों से सवाल किया, तो MRP के एक और खेल का पता चला. एक दवा करोबारी ने बताया कि कुछ दवा कंपनियां मोनोपोली प्रोडक्टस बनाकर सीधे अस्पताल और उनके डॉक्टर्स को अप्रोच करते हैं. ऐसे प्रोडक्ट सिर्फ खास हॉ़स्पिटल या उसके पास के केमिस्ट के पास ही मिलते हैं. और इन पर कोई डिस्काउंट भी नहीं दिया जाता. ऐसा नहीं की लूट सिर्फ दवाओं के नाम पर हो रही है. दवा तो मरीज तब लेता है, जब उसे पता चलता है कि उसे क्या बीमारी है. लेकिन किसी बीमारी का पता लगाने के लिए जब वो डॉक्टर के पास पहुंचता है. लूट का खेल वहीं से शुरू हो जाता है. मरीज को तमाम तरह के टेस्ट करवाने की लिस्ट सौंप दी जाती है. और ये टेस्ट इतने महंगे होते हैं कि मरीज कई बार सस्ते टेस्ट के झांसे में फंस जाते हैं. जिन्हें सिंक टेस्ट कहा जाता है. दरअसल
– सिंक टेस्ट कोई असली मेडिकल टेस्ट नहीं है.
– ये पैथोलॉजी लैब्स में होने वाला बड़ा फर्जीवाड़ा है.
– इसमें मरीज के खून, यूरिन या कोई दूसरा सैंपल लिया तो जाता है, लेकिन उसकी पूरी जांच नहीं की जाती है.
– कुछ मामलों में तो बिना किसी जांच के सैंपल्स को सिंक में फेंक दिया जाता है.
– इसके बाद लैब बिना टेस्ट के रिपोर्ट तैयार कर देती है.
– रिपोर्ट में नॉर्मल वैल्यूज डाल दी जाती हैं.
– या फिर पुराने डाटा और अनुमान के आधार पर नंबर्स लिख दिए जाते हैं.
इसका नतीजा ये होता है कि मरीज का समय रहते बीमारी का पता नहीं चल पाता है और बाद में इलाज के लिए महंगी दवाओं के भरोसे रहना पड़ जाता है. मेडिकल टेस्ट के नाम पर हो रहे इसी फर्जीवाड़े की वजह से लोगों का पैथोलॉजी लैब्स से भरोसा उठता जा रहा है. लोकल सर्कल के एक सर्वे में इसको लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ चुके हैं.
– पैथोलॉजी लैब्स पर लोकल सर्कल के एक सर्वे में 48 हजार से ज्यादा लोगों की राय ली गई.
– 35 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें पैथोलॉजी लैब्स पर कतई भरोसा नहीं है.
– 34 प्रतिशत लोगों ने गलत पैथोलॉजी रिपोर्ट मिलने की बात मानी.
– 50 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें जरूरत से ज्यादा टेस्ट लिखे गए.
– 66 प्रतिशत लोगों ने कहा की डॉक्टर ने उस लैब से टेस्ट करवाने को कहा, जहां से उसे टेस्ट पर कमीशन मिलता है.
अब ये भी देखिए जो दवाएं देश के कई परिवारों की जेब को बीमार कर रही हैं. जिनकी MRP को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. उनकी कीमत तय कैसे होती है.
– भारत में दवाओं को दो कैटेगरी में बांटा गया है. एक कैटेगरी शेड्यूल्ड दवाओं की है. और दूसरी कैटेगरी में नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं आती हैं.
– शेड्यूल्ड दवाएं वो हैं, जो NLEM यानी नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स में शामिल हैं.
– इनकी कीमत NPPA यानी नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी तय करती है.
– DPCO यानी ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 2013 के तहत शेड्यूल्ड कैटेगरी में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत बाजार के आंकड़ों पर तय की जाती है.
– इसके लिए उन ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की कीमतों का औसत निकाला जाता है, जिनकी बाजार हिस्सेदारी कम से कम 1% है.
– इसके बाद इसमें 16% मार्जिन जोड़कर सीलिंग प्राइस तय किया जाता है.
– सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2026 तक NPPA ने 935 फॉर्मूलेशन्स की सिलिंग प्राइस तय कर रखी है.
– वहीं नॉन शेड्यूल्ड दवाएं वो हैं, जो NLEM यानी नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स की लिस्ट से बाहर हैं.
– इनकी शुरुआती कीमत कंपनी खुद तय करती है.
– सरकार का इन पर सिर्फ इतना ही कंट्रोल है कि दवा कंपनी एक साल में दवा की MRP में 10 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं कर सकती. इसके अलावा विशेष परिस्थितियां होने पर सरकार अतिरिक्त नियंत्रण भी ला सकती है.
30 परसेंट से ज्यादा नहीं होना चाहिएदवा और मेडिकल डिवाइस की कीमतों में मुनाफाखोरी पर बवाल मचा है. उस पर रिटेल्ड डिस्ट्रीब्यूटर केमिस्ट अलायंस का भी मानना है कि किसी भी दवा का ट्रेड मार्जिन, यानी दवा के कंपनी से निकलकर मरीज तक पहुंचने वाला मार्जिन 30 परसेंट से ज्यादा नहीं होना चाहिए. 20% रिटेलर को और 10% डिस्ट्रीब्यूटर को मिल सके, इतना काफी है. ऐसा नहीं है कि सरकार नॉन शेड्यूल्ड कैटेगरी वाली दवाओं की कीमतों पर नजर नहीं रखती है. NPPA यानी नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी समय समय पर इस पर स्टडी करती रहती है. साल 2022 में की गई ऐसी ही एक स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ. NPPA की स्टडी में पता चला कि
– मोटा मुनाफा कमाने के लिए सबसे ज्यादा महंगी दवाओं में सबसे ऊंचा मार्जिन होता है.
– स्टडी में खास तौर पर उन दवाइयों में मार्जिन ज्यादा मिला, जिनकी एक टैबलेट की कीमत 100 रुपये से ऊपर थी.
– 2022 में हुई इस स्टडी के मुताबिक उस वक्त भारत में नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की सालाना टर्नओवर 1 लाख 37 हजार करोड़ था.
– जो भारत के कुल फार्मा मार्केट का करीब 81 प्रतिशत था.
इसीलिए NPPA ने नॉन शेड्यूल्ड दवाओं के मार्जिन को सीमित करने की ज्यादा जरूरत बताई थी. हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर पर संसद की स्थाई समिति भी दवाओं और मेडिकल डिवाइसेज में हो रही मुनाफाखोरी पर चिंता जता चुकी है. इसी साल अगस्त में स्थाई समिति ने इनकी कीमतों को कंट्रोल करने के लिए सुझाव भी दिया. और बताया कि
– किसी भी दवा या मेडिकल डिवाइस की लैंडिंग प्राइस और MRP यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस के बीच अंतर 20% से अधिक नहीं होना चाहिए. लैंडिंग प्राइस वो लागत है, जिस पर कोई दवा बाजार में सप्लाई चेन तक पहुंचती है.
– सिफारिश की गई कि मेडिकल सर्विसेज में कीमतों की पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है,
– क्योंकि इलाज के दौरान दवाओं और मेडिकल डिवाइसेज पर होने वाला खर्च कई परिवारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है.
– इसके लिए संसद की स्थायी समिति ने इमरजेंसी में इस्तेमाल होने वाली लाइफ सेविंग क्लॉट बस्टिंग दवा टेनेक्टेप्लेस का भी उदाहरण दिया.
– और बताया कि टेनेक्टेप्लेस रिटेलर को करीब 18 हजार में मिलती है, जबकि मरीज को इसके लिए 50 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं.
– इसी तरह दांतों को सीधा करने के लिए लगाए जाने वाले क्लियर एलाइनर की कीमतों को कंट्रोल करने की भी जरूरत बताई गई.
– जिन्हें अलग कंपनियां डेढ़ लाख से 5 लाख रुपये तक में बेच रही हैं.



