100 सेकंड में एक AK-203! भारतीय सेना की ताकत बनेगा देसी ‘शेर’, एक ही वार में दुश्मन होंगे खल्लास

भारत ने हथियार बनाने के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाई है. रूस के साथ मिलकर बनाई जा रही AK-203 असॉल्ट राइफल का अब 100 फीसदी स्वदेशी वर्जन तैयार हो गया है. भारत में इसे ‘शेर’ नाम दिया गया है. अमेठी के कोरवा स्थित प्लांट में तैयार इस राइफल के साथ अब भारत को इसके निर्माण के लिए विदेशी कंपोनेंट्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.
इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड (IRRPL) ने AK-203 के सभी प्रमुख हिस्सों का देश में ही निर्माण करने की क्षमता हासिल कर ली है. कंपनी जल्द ही 10 पूरी तरह स्वदेशी राइफलों को भारतीय सेना को सौंपेगी. इनका अलग-अलग परिस्थितियों में कड़ा परीक्षण किया जाएगा. परीक्षण सफल रहने के बाद अप्रैल 2027 से पूरी तरह देसी AK-203 की डिलीवरी शुरू करने की तैयारी है.
3 हजार राउंड की टेस्ट फायरिंग
कंपनी के सीईओ मेजर जनरल एसके शर्मा के मुताबिक, स्वदेशी प्रोटोटाइप राइफल का फैक्ट्री में करीब 3,000 राउंड सफल परीक्षण किया जा चुका है. अब सेना को दी जाने वाली 10 राइफलों का यूजर ट्रायल, DGQA टेस्ट, मिलिट्री इन्फैंट्री ट्रायल और अलग-अलग मौसम में परीक्षण होगा.
इन राइफलों को गर्म मौसम के साथ-साथ ऊंचाई वाले इलाकों में भी परखा जाएगा. कंपनी का कहना है कि उसे अपनी राइफल पर पूरा भरोसा है और परीक्षण के साथ ही बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी भी शुरू कर दी जाएगी.
हर महीने बनेंगी 12 हजार राइफलें
अमेठी का कोरवा प्लांट फिलहाल करीब हर 100 सेकंड में एक AK-203 तैयार करने की क्षमता रखता है. यानी एक घंटे में लगभग 36 राइफलें बनाई जा सकती हैं. कंपनी अगले साल से दो शिफ्ट में उत्पादन शुरू करने की योजना बना रही है. इसके बाद रोजाना करीब 600 राइफलें तैयार की जा सकेंगी. इसका मतलब है कि हर महीने लगभग 12 हजार और सालाना करीब 1.5 लाख AK-203 राइफलों का उत्पादन संभव होगा.
कंपनी को भारतीय सशस्त्र बलों के लिए 6 लाख से ज्यादा AK-203 राइफलें तैयार करनी हैं. मौजूदा उत्पादन क्षमता को देखते हुए कंपनी का दावा है कि पूरा ऑर्डर 2030 या 2031 की शुरुआत तक पूरा किया जा सकता है, जबकि मौजूदा अनुबंध के मुताबिक इसे 2032 तक पूरा करना है.
50 बड़े और 180 छोटे हिस्से, सब भारत में तैयार
100 फीसदी स्वदेशी AK-203 तैयार करना आसान नहीं था. इसके लिए राइफल के करीब 50 प्रमुख कंपोनेंट और 180 छोटे हिस्सों को भारत में ही बनाना पड़ा. रूस से इस राइफल से जुड़ा करीब 90 हजार पन्नों का तकनीकी दस्तावेज भारत को मिला था. इसके आधार पर भारतीय इंजीनियरों और कंपनियों ने उत्पादन प्रक्रिया को समझा और स्थानीय स्तर पर विकसित किया.
सबसे बड़ी चुनौती रूस में इस्तेमाल होने वाले सैन्य मानकों के कच्चे माल को भारतीय मानकों के अनुरूप तैयार करना था. इसके अलावा करीब 120 अलग-अलग मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं को भारत में विकसित करना पड़ा. राइफल बनाने में इस्तेमाल होने वाले करीब 1,600 सटीक उपकरण और गेज भी देश में ही तैयार किए गए.
रिसीवर असेंबली इसका सबसे जटिल हिस्सा माना जाता है. इसमें खास तरह की मेटल स्टैंपिंग और मशीनिंग की जरूरत होती है. इसके स्वदेशीकरण के साथ AK-203 के 100 फीसदी देसी बनने का रास्ता साफ हुआ.
पहले ही मिल चुकी हैं 55 हजार AK-203
भारतीय सेना को अब तक करीब 55 हजार AK-203 राइफलें मिल चुकी हैं. हालांकि इनमें शुरुआती दौर में रूस से आए कंपोनेंट्स का इस्तेमाल किया गया था और धीरे-धीरे इनका स्वदेशीकरण बढ़ाया गया. इसके अलावा करीब 7,500 राइफलें असेंबल होकर तैयार हैं, जिन्हें जल्द सेना को भेजा जाना है. शुरुआती 70 हजार राइफलों के चरण में स्वदेशीकरण का स्तर करीब 5 फीसदी से बढ़कर 70 फीसदी तक पहुंचा था. अब 100 फीसदी स्वदेशीकरण हासिल होने के बाद AK-203 के उत्पादन में भारत की भूमिका पूरी तरह बदल गई है.
दूसरे देशों को भी बेची जाएगी AK-203 राइफल
फिलहाल कंपनी का सबसे बड़ा लक्ष्य भारतीय सेना की जरूरत पूरी करना है. लेकिन भविष्य में भारत में बनी AK-203 को दूसरे देशों में भी निर्यात किए जाने की संभावना है. कंपनी के मुताबिक, दुनिया के अलग-अलग देशों से 1.5 लाख से ज्यादा राइफलों को लेकर रुचि दिखाई गई है. हालांकि निर्यात के लिए भारत सरकार और कंपनी बोर्ड की मंजूरी जरूरी होगी.
इतना ही नहीं, अमेठी के इसी प्लांट में रूस के साथ मिलकर AK-19 असॉल्ट राइफल और PPK-20 सबमशीन गन जैसे दूसरे हथियारों के निर्माण पर भी चर्चा चल रही है. यानी अमेठी का यह प्लांट आने वाले समय में सिर्फ AK-203 बनाने तक सीमित नहीं रहेगा. यहां से भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को नई दिशा मिलने की उम्मीद है.



