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नागौर का पारंपरिक गहना है टेवटा, दिवाली पर रहती है अधिक डिमांड, जानिए महिलाएं क्यों करती हैं धारण

Last Updated:October 14, 2025, 10:27 IST

Traditional Jewel Teavana Impotance: नागौर और आस-पास के क्षेत्रों में पारंपरिक गहनों में टेवटा का विशेष महत्व है. यह गले में पहनने वाला खूबसूरत गहना महिलाओं की सुंदरता बढ़ाता है और पारंपरिक पोशाकों के साथ खास अवसरों पर पहना जाता है. दिवाली, तीज और गणगौर जैसे त्योहारों पर टेवटा पहनना शुभ माना जाता है. सोने, चांदी और गोल्ड प्लेटेड डिजाइन में तैयार यह गहना वैवाहिक सुख और समृद्धि का प्रतीक है. दिवाली के समय इसकी मांग दोगुनी हो जाती है. स्थानीय सुनार पीढ़ियों से इसे बना रहे हैं.

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नागौर. राजस्थान की पहचान सिर्फ रंग-बिरंगे कपड़ों और लोकगीतों से नहीं, बल्कि उन पारंपरिक गहनों से भी है जो राजस्थान की कहानी बताती है. इन्हीं गहनों में से एक है टेवटा, जिसे नागौर व आस-पास के इलाकों में शुभ और पारंपरिक आभूषण माना जाता है. यह गले में पहनने वाला सुंदर गहना हर त्योहार और खास मौके पर महिलाओं की सुंदरता को बढ़ा देता है. जिस प्रकार दिवाली की सुंदरता दीपक के रोशनी से मानी जाती है, ठीक उसी प्रकार महिलाओं की सुंदरता टेवटा से मानी जाती है.

टेवटा एक पारंपरिक राजस्थानी आभूषण है, जो गले में पहना जाता है. इसकी खास पहचान इसका चौकोर आकार का पेंडेंट होता है. यह अक्सर भारी डिजाइन, कुंदन, सफेद मोती और सोने की नक्काशी के साथ बनाया जाता है. राजस्थानी महिला इसे अपने पारंपरिक पोशाकों लुगड़ी ओढ़नी या घाघरा चोली या राजपूती पोशाक के साथ पहनती है. इसकी कारीगरी इतनी सुंदर होती है, देखने वालों को भी अच्छी लगती है. इसकी नक्काशी पर बारीक कुंदन और मोती जड़े होते हैं जो दिवाली जैसे त्यौहार में चार चांद लगा देते हैं.

नागौर की परंपरा में शामिल है टेवटा

नागौर और आस-पास के गांव में टेवटा वंश परंपरा का गहना माना जाता है. यहां की महिलाएं इसे खास अवसरों पर जैसे तीज, गणगौर, दिवाली पर पहनती हैं. पुराने समय में जब विवाह होते थे तो दुल्हन के गहनो में टेवटा जरूर शामिल किया जाता है. यह वैवाहिक सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जो आज वर्तमान समय तक चला आ रहा है. आज भी टेवटा की मांग बढ़ती जा रही है. नागौर क्षेत्र में महिलाए टेवटा के बिना अपने श्रृंगार को अधूरा मानती है. आज भी नागौर में टेवटा बनवाने का चलन बरकरार है. पहले यह पूरे सोने का बनता था, अब लोग चांदी और गोल्ड प्लेटेड डिजाइन भी पसंद करते हैं. आभूषण व्यापारियों के अनुसार, दिवाली के वक्त इसके ऑर्डर दोगुना हो जाते हैं. यहां के सुनार इसे पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं.

दिवाली पर टेवटा का महत्व

दिवाली अपने साथ कई खुशियां लेकर आती है. इस दिन दीपक की रोशनी से घर जगमगा जाते हैं, तो वहीं महिलाएं अपने पारंपरिक गहनों से खुद को सजाती है. टेवटा पहनना इस दिन लक्ष्मी का स्वागत करने का शुभ प्रतीक माना जाता है. सोने और चांदी को समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, इसलिए दिवाली पर महिलाएं खास तौर पर टेवटा पहनकर पूजा-अर्चना करती है. स्थानीय लोगों का मानना है कि सोने चांदी के गहने पहनने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है और इसे मां लक्ष्मी के चरणों में भी चढ़ाया जाता है. गांव में महिलाएं जब पारंपरिक पोशाक पहनकर टेवटा गले में धारण करती है तो पूरा माहौल संस्कृति और रोशनी से महक उठता है.

दिवाली के दौरान रहती है अधिक डिमांड

दिवाली के आते ही नागौर के बाजारों में टेवटा की चमक बढ़ने लगती है. सुनारों की दुकानों पर नए-नए डिजाइन सजे रहते हैं. कुछ पारंपरिक कुंदन वर्क वाले, तो कुछ हल्के वजन के मॉडर्न टच में रहते हैं. महिलाएं अपने वेशभूषा से मेल खाते हुए टेवटा खरीदती हैं और दुकानदार बताते हैं कि हर साल दिवाली से पहले बिक्री में 25 से 30% तक की बढ़ोतरी हो जाती है. स्थानीय कारीगर बताते हैं कि हमारे लिए टेवटा बनाना सिर्फ गहना नहीं, बल्कि कला और संस्कृति की पहचान है. इसे बनाना मेहनत और परंपरा दोनों का संगम है. टेवटा को कई जगह पर तिमनिया या टेडिया के नाम से भी जाना जाता है.

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दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट… और पढ़ें

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Nagaur,Rajasthan

First Published :

October 14, 2025, 10:26 IST

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