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Agriculture Tips: उड़द की खेती करने वाले किसान जरूर पढ़ें, ये 5 उन्नत किस्में बदल देंगी आपकी किस्मत

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उड़द की खेती करने वाले किसान जरूर पढ़ें, ये 5 उन्नत किस्में कराएंगी आपकी चांदी

Last Updated:July 12, 2026, 16:45 IST

Urad Dal Farming Tips: खरीफ सीजन में भीलवाड़ा के किसान उड़द की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कम लागत और कम समय में बेहतर उत्पादन के लिए पीयू-31, पंत यू-31, टी-9 और टीएयू-1 जैसी उन्नत और प्रमाणित किस्मों का ही चयन करना चाहिए. खेत की 2-3 बार जुताई, बीजोपचार, उचित जल निकासी और समय पर खरपतवार नियंत्रण अपनाकर उड़द की खेती से बंपर आर्थिक लाभ कमाया जा सकता है.

भीलवाड़ा. खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ जिले के किसान उड़द की बुवाई की तैयारियों में जुट गए हैं. उड़द एक प्रमुख दलहनी फसल है, जिसकी खेती कम लागत और कम समय में की जा सकती है. समय पर अच्छी बारिश और खेत की वैज्ञानिक तैयारी होने पर किसान बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं. अधिक पैदावार के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उन्नत और प्रमाणित बीजों का चयन. गुणवत्तापूर्ण बीजों के उपयोग से फसल अधिक मजबूत होती है, रोगों का प्रकोप कम रहता है और दानों की गुणवत्ता भी बेहतर मिलती है. इससे उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों की लागत घटती है और बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है.

उड़द की कई उन्नत किस्में किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित हो रही हैं. इनमें पीयू-31, पंत यू-31, एलबीजी-752, टीएयू-1 और टी-9 प्रमुख हैं. इन किस्मों की विशेषता यह है कि ये कम अवधि में पककर तैयार हो जाती हैं और सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छा उत्पादन देती हैं. इनमें से कई किस्मों में रोगों और कीटों के प्रति बेहतर सहनशीलता होती है, जिससे फसल खराब होने का खतरा कम रहता है. यदि किसान अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुसार उपयुक्त किस्म का चयन करें, तो प्रति बीघा उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. साथ ही बेहतर गुणवत्ता वाले दानों के कारण बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है.

उड़द की बुवाई हमेशा पर्याप्त नमी वाली भूमि में करनी चाहिए. बुवाई से पहले खेत की दो से तीन बार अच्छी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लें, ताकि बीज का अंकुरण बेहतर हो सके. बुवाई के लिए हमेशा प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करें और बीजोपचार अवश्य करें. इससे शुरुआती रोगों से बचाव होता है तथा पौधों का विकास तेजी से होता है. बीजों की उचित दूरी पर बुवाई करने से पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे फसल स्वस्थ रहती है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है. समय पर बुवाई करने से किसान मानसून की बारिश का पूरा लाभ उठा सकते हैं.

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उड़द की फसल में अन्य कई फसलों की तुलना में पानी की आवश्यकता कम होती है, लेकिन खेत में जलभराव बिल्कुल नहीं होना चाहिए. अधिक समय तक पानी भरा रहने से पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं और विभिन्न रोगों का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए खेत में पानी की उचित निकासी की व्यवस्था जरूरी है. यदि वर्षा कम हो, तो आवश्यकता के अनुसार हल्की सिंचाई की जा सकती है. फसल की अच्छी बढ़वार के लिए समय पर खरपतवार नियंत्रण भी आवश्यक है, क्योंकि शुरुआती अवस्था में खरपतवार पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं. इसके अलावा संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने से पौधों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है.

फसल तैयार होने तक किसानों को नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करते रहना चाहिए. यदि कहीं कीट या रोग के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर अनुशंसित दवा का छिड़काव करें. पीला मोजेक जैसे रोगों से बचाव के लिए स्वस्थ एवं प्रमाणित बीजों का चयन और समय-समय पर निगरानी बेहद जरूरी है. कीटनाशकों और अन्य कृषि रसायनों का उपयोग हमेशा निर्धारित मात्रा में ही करें, ताकि फसल सुरक्षित रहे और अनावश्यक खर्च से बचा जा सके. नियमित देखभाल और वैज्ञानिक खेती की तकनीकों को अपनाकर किसान उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ बेहतर आर्थिक लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं.

किसानों को हमेशा प्रमाणित बीज ही खरीदने चाहिए और स्थानीय कृषि अधिकारियों की सलाह लेकर अपने क्षेत्र की जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार उपयुक्त किस्म का चयन करना चाहिए. समय पर बुवाई, उन्नत बीजों का उपयोग, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और रोग-कीटों का समय पर उपचार अपनाकर उड़द की खेती को अधिक लाभदायक बनाया जा सकता है. कम लागत और कम अवधि में तैयार होने वाली यह दलहनी फसल किसानों की आय बढ़ाने का बेहतर विकल्प बन रही है. यदि मौसम अनुकूल रहे और वैज्ञानिक खेती की तकनीकों का पालन किया जाए, तो इस खरीफ सीजन में उड़द की फसल से बेहतर उत्पादन के साथ किसानों को अच्छा आर्थिक लाभ मिल सकता है.

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