हाड़ा राजपूतों के शौर्य का प्रतीक है बूंदी का तारागढ़ किला, जानें क्यों कहलाता था ‘अजेय दुर्ग’

Last Updated:July 12, 2026, 16:20 IST
Bundi Taragarh Fort history and architecture: राजस्थान के बूंदी में स्थित ऐतिहासिक तारागढ़ दुर्ग हाड़ा राजपूतों के शौर्य और बेजोड़ स्थापत्य का प्रतीक है. सन 1354 में राव बर सिंह हाड़ा द्वारा 1426 फीट की ऊंचाई पर निर्मित यह किला अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा ‘अजेय’ रहा. दिल्ली सल्तनत और मुगलों के कई आक्रमणों को झेलने वाले इस किले में छत्र महल और बादल महल जैसी भव्य संरचनाएं हैं. साथ ही, यहाँ की प्रसिद्ध ‘गर्भ गुंजन’ तोप और जल संरक्षण के लिए बने विशाल जलाशय इसके उन्नत सैन्य और नागरिक प्रबंधन को दर्शाते हैं.
राजस्थान के हाड़ौती अंचल में स्थित बूंदी का ऐतिहासिक तारागढ़ दुर्ग देश के सबसे प्राचीन, भव्य और अजेय किलों में शुमार है. यह दुर्ग केवल पत्थरों से बनी एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि सदियों से हाड़ा राजपूतों के अदम्य साहस, स्वाभिमान और समृद्ध स्थापत्य कला का जीवंत प्रतीक रहा है. अरावली की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं पर समुद्र तल से करीब 1,426 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्ग की नींव वर्ष 1354 में राव बर सिंह हाड़ा ने रखी थी. इसका निर्माण राज्य की सुरक्षा को मजबूत करने और बाहरी आक्रमणों से रक्षा के उद्देश्य से कराया गया था.
उस समय मेवाड़ और मालवा की ओर से होने वाले संभावित सैन्य आक्रमणों से बूंदी राज्य की सुरक्षा के लिए इस ऊंची पहाड़ी का रणनीतिक रूप से चयन किया गया था. भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता था और दुश्मनों के लिए यहां तक पहुंचना बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण था. यही कारण है कि तारागढ़ दुर्ग को अपने समय का ‘अजेय दुर्ग’ माना जाता था. इसकी मजबूत संरचना और सामरिक स्थिति के चलते किसी भी आक्रमणकारी के लिए इसे जीत पाना आसान नहीं था.
इतिहास के विभिन्न कालखंडों में दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों और मुगल शासकों सहित कई शक्तिशाली साम्राज्यों ने इस दुर्ग पर अधिकार करने का प्रयास किया. हालांकि इसकी ऊंची प्राचीरें, मजबूत परकोटे, चारों ओर फैले घने जंगल और पथरीली पहाड़ियां प्राकृतिक सुरक्षा कवच साबित हुईं. इन्हीं कारणों से कोई भी आक्रमणकारी इस किले पर आसानी से विजय प्राप्त नहीं कर सका. बाद के समय में हाड़ा शासकों और मुगल साम्राज्य के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण होने लगे, जिससे युद्ध की परिस्थितियां कम हुईं और दुर्ग के भीतर विकास एवं निर्माण कार्यों का नया दौर शुरू हुआ.
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दुर्ग के शांतिपूर्ण दौर में यहां कई भव्य और कलात्मक महलों का निर्माण कराया गया. इनमें छत्र महल, बादल महल और रतन दौलत महल प्रमुख हैं, जो आज भी अपनी अद्भुत वास्तुकला से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. इन महलों में राजपूती स्थापत्य की भव्यता और मुगल वास्तुकला की कलात्मक शैली का सुंदर संगम देखने को मिलता है. वहीं तारागढ़ दुर्ग का सैन्य इतिहास यहां स्थापित प्रसिद्ध ‘गर्भ गुंजन’ तोप के बिना अधूरा माना जाता है. अपने समय में यह विशाल तोप दुश्मनों के लिए भय का प्रतीक थी और दुर्ग की सैन्य शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती थी.
तारागढ़ दुर्ग की प्रसिद्ध ‘गर्भ गुंजन’ तोप मध्यकाल में अपनी लंबी मारक क्षमता और गगनभेदी गर्जना के लिए पूरे राजपूताना में प्रसिद्ध थी. कहा जाता है कि इसकी आवाज दूर-दूर तक सुनाई देती थी और युद्ध के दौरान दुश्मनों के मन में भय पैदा कर देती थी. वहीं दुर्ग के भीतर बनाए गए विशाल जलाशय और गहरी बावड़ियां उस समय की उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण हैं. हाड़ा शासकों ने पानी के संरक्षण की ऐसी व्यवस्था विकसित की थी कि लंबे समय तक घेराबंदी होने पर भी किले में पानी की कमी न हो. युद्ध के दौरान जब दुर्ग चारों ओर से घिर जाता था, तब इन्हीं जलाशयों का संचित पानी सैनिकों और राजपरिवार के लिए जीवनरेखा साबित होता था.
यह ऐतिहासिक तोप मध्यकाल में अपनी प्रभावशाली मारक क्षमता और गगनभेदी गर्जना के लिए पूरे राजपूताना में प्रसिद्ध थी. युद्ध के दौरान इसकी आवाज दुश्मनों के मन में भय पैदा कर देती थी और यह दुर्ग की सैन्य शक्ति का प्रमुख प्रतीक मानी जाती थी. वहीं किले के भीतर बनाए गए विशाल जलाशय और गहरी बावड़ियां उस समय की उन्नत जल संरक्षण एवं प्रबंधन प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण हैं. हाड़ा शासकों ने ऐसी व्यवस्था विकसित की थी कि लंबे समय तक घेराबंदी की स्थिति में भी पानी की कमी न हो. युद्धकाल में जब दुर्ग चारों ओर से शत्रु सेना से घिर जाता था, तब इन्हीं जलाशयों में संचित पानी सैनिकों और राजपरिवार के लिए जीवनरेखा साबित होता था.
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