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Ajab Gajab: डीडवाना में है निरंजनी संप्रदाय का प्रमुख तीर्थ स्थल, लोककथाओं में एक डाकू के रूप में मिलता है उल्लेख

Last Updated:July 12, 2026, 14:48 IST

Ajab Gajab: नागौर के डीडवाना से करीब 500 वर्ष पहले शुरू हुआ निरंजनी संप्रदाय आज देश के कई राज्यों में अपनी निर्गुण भक्ति, साधना और वैराग्य की परंपरा का विस्तार कर चुका है. स्वामी हरिदास महाराज की आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ा यह संप्रदाय आज भी गाढ़ाधाम दयाल बगीची और गुरु परंपरा के माध्यम से जीवंत है.

नागौर. राजस्थान की पहचान केवल किलों, वीरों और लोकसंस्कृति तक सीमित नहीं है. यह भूमि ऐसी संत परंपराओं की भी जननी रही है, जिन्होंने समय की सीमाओं को पार कर पूरे देश में अपनी आध्यात्मिक छाप छोड़ी. डीडवाना से लगभग पांच शताब्दी पहले शुरू हुआ निरंजनी संप्रदाय आज राजस्थान से निकलकर गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड सहित देश के 10 से अधिक राज्यों में अपनी साधना, भक्ति और वैराग्य की परंपरा का विस्तार कर चुका है. वर्तमान में इस संप्रदाय की मूल गद्दी पर संत सांवरदास महाराज विराजमान हैं और परंपरा का संचालन कर रहे हैं.निरंजनी संप्रदाय की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्थापना कथा है.

संप्रदाय के प्रवर्तक स्वामी हरिदास महाराज का प्रारंभिक जीवन हरिसिंह के नाम से जुड़ा मिलता है. लोककथाओं में उनका उल्लेख एक डाकू के रूप में किया जाता है, लेकिन गुरु गोरखनाथ के सान्निध्य ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. सांसारिक मोह-माया छोड़ उन्होंने कठोर तप, योग साधना और आत्मचिंतन का मार्ग अपनाया. आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करने के बाद उन्होंने निराकार ब्रह्म की उपासना पर आधारित निरंजनी संप्रदाय की स्थापना की, जिसका मूल संदेश आडंबर से दूर रहकर ईश्वर के निर्गुण स्वरूप की आराधना करना है. इतिहासकारों के अनुसार, स्वामी हरिदास महाराज का जन्म विक्रम संवत 1512 में डीडवाना से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित कापड़ोद गांव में सांखला राजपूत परिवार में हुआ था. उन्होंने अपना पूरा जीवन लोककल्याण, साधना और अध्यात्म के प्रचार-प्रसार में समर्पित किया.

विक्रम संवत 1600 की फाल्गुन शुक्ल षष्ठी को 88 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रह्मलीन होकर समाधि ली. उनकी समाधि आज गाढ़ाधाम दयाल बगीची के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे निरंजनी संप्रदाय का प्रमुख तीर्थ माना जाता है. हर वर्ष फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर गाढ़ाधाम दयाल बगीची में आयोजित होने वाला गुदड़ी मेला इस संप्रदाय का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है. देशभर से संत-महात्मा और हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. कई दिनों तक रामनाम संकीर्तन, हरिकीर्तन, सत्संग और आध्यात्मिक प्रवचन होते हैं. समाधि स्थल पर श्रद्धालु दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं और गुरु परंपरा के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं. करीब 500 वर्षों बाद भी निरंजनी संप्रदाय की परंपरा निरंतर जीवंत है. डीडवाना की यह संत परंपरा आज भी राजस्थान की आध्यात्मिक विरासत को देशभर में नई पहचान दिला रही है.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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