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रद्दी अखबार से बदली किस्मत, बनाया जोरदार जुगाड़, 50 महिलाओं को मिल गया काम, अब अमेरिका तक पहुंच रहे हैं प्रोडक्ट 

Last Updated:December 04, 2025, 17:28 IST

Bharatpur News Hindi : सुशीला देवी ने भरतपुर में पुराने अखबारों से पेपर फैब्रिक बनाकर हैंडमेड बैग तैयार किए, जिससे 50 महिलाओं को रोजगार मिला और उनके उत्पाद अमेरिका तक पहुंच गए हैं.

भरतपुर : साधारण ग्रामीण महिला सुशीला देवी ने ऐसा कमाल कर दिखाया है. जिसकी चर्चा अब दूर-दराज देशों तक पहुंच चुकी है. लोग जिन पुराने अखबारों को बेकार समझकर रद्दी में बेच देते हैं उसी अखबार ने सुशीला की जिंदगी बदल दी उन्होंने कागज की कतरनों को हथकरघे पर बुनने का नया तरीका खोज निकाला और इसी जुगाड़ से बने बैग आज विदेशों तक पहुंच रहे हैं. सुशीला ने शुरुआत घर में पड़े पुराने अखबारों से की उन्हें बारीक कतरनों में काटकर धागे की तरह इस्तेमाल किया और फिर अपने पुराने हथकरघे पर इन्हें बुनने का प्रयोग शुरू किया.

कई बार कोशिशें असफल रहीं पर सुशीला ने हिम्मत नहीं छोड़ी आखिरकार उन्होंने ऐसा मजबूत और आकर्षक पेपर फैब्रिक तैयार कर लिया जिससे बैग लिफाफे और अन्य उत्पाद आसानी से बनाए जा सकते थे शुरू में उन्होंने टोट बैग और शगुन लिफाफे बनाए जो स्थानीय बाजारों और लोगों को बेहद पसंद आने लगे धीरे-धीरे सुशीला के इस नवाचार की चर्चा हाटों और मेलों तक पहुंच गई भरतपुर में लगने वाली प्रसिद्ध हाट में उनकी विशेष दुकान लगाई है. जहां लोग उनके बनाए हस्तनिर्मित बैग खरीदने आते हैं.

हैंडमेड बैगों की बढ़ी देशभर में डिमांडइन बैगों की खासियत यह है कि ये पूरी तरह हाथ से बनाए जाते हैं. पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और देखने में भी बेहद खूबसूरत लगते हैं. इसी वजह से इनकी मांग न सिर्फ स्थानीय स्तर पर बल्कि देशभर में बढ़ने लगी समय के साथ सुशीला के बैगों की चर्चा सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंची जिसके बाद विदेशों से भी ऑर्डर आने शुरू हो गए आज उनके बनाए लैपटॉप बैग, टोट बैग और शगुन लिफाफे अमेरिका तक भेजे जा रहे हैं.

50 महिलाओं को दिया रोजगार, बनी मिसालइनके डिजाइन मजबूती और पर्यावरण-मित्र होने की वजह से विदेशी ग्राहक भी इन्हें खास पसंद कर रहे हैं. सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि सुशीला देवी इस काम को अकेले नहीं कर रहीं उन्होंने अपने साथ 50 से ज्यादा महिलाओं को प्रशिक्षण देकर अपने साथ जोड़ लिया है. आज ये महिलाएं पेपर फैब्रिक तैयार करने से लेकर बैग बनाने तक हर काम में माहिर हैं और इससे उनकी आमदनी भी बढ़ी है. गांव की कई महिलाएं इस काम की वजह से आत्मनिर्भर बन रही हैं.

रद्दी कागज से कमाई और पर्यावरण संरक्षणहाथ से बनाए जाने वाले इन बैगों की कीमत 50 रुपये से शुरू होकर डिजाइन के अनुसार 2000 रुपये तक पहुंचती है. सुशीला देवी का यह प्रयास न सिर्फ ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का बड़ा साधन बना है. बल्कि पर्यावरण संरक्षण का मजबूत संदेश भी देता है. उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि अगर लगन और सोच सही हो तो रद्दी कागज भी नई जिंदगी की शुरुआत बन सकता है.

About the AuthorRupesh Kumar Jaiswal

रुपेश कुमार जायसवाल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश में बीए किया है. टीवी और रेडियो जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं. फिलहाल नेटवर्क18 से जुड़े हैं. खाली समय में उन…और पढ़ें

Location :

Bharatpur,Rajasthan

First Published :

December 04, 2025, 17:28 IST

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रद्दी पेपर से रोजगार की राह,50 महिलाओं संग बनाई पहचान,अमेरिका तक नाम

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