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सवाई माधोपुर में बेटी ने निभाया बेटे का फर्ज… पिता की अर्थी को कंधा देकर मुखाग्नि तक, बदल दी परंपरा

Last Updated:April 17, 2026, 18:16 IST

Daughter Lit Father Funeral Pyre Sawai Madhopur : सवाई माधोपुर में बृजेश कंवर ने पिता ठाकुर मोहन सिंह राजावत की अर्थी को कंधा दिया और मुखाग्नि दी, परिवार के समर्थन से परंपरा को चुनौती दी. यह सिर्फ एक बेटी का अपने पिता के लिए प्यार नहीं था, बल्कि उस भरोसे को निभाने की कोशिश थी, जो पिता ने अपने जीते जी उस पर रखा था.बेटी ने निभाया बेटे का फर्ज; अर्थी को कंधा देकर मुखाग्नि तक, बदल दी परंपराZoomसवाई माधोपुर में बेटी ने निभाया बेटे का फर्ज

राजस्थान: सवाई माधोपुर से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि सोच को झकझोर देने वाली कहानी बन गई है. यहां बाल मंदिर कॉलोनी में एक बेटी ने वो किया, जिसे समाज अक्सर बेटों से जोड़कर देखता आया है. पिता की अंतिम यात्रा में कंधा देने से लेकर मुखाग्नि देने तक, हर कदम पर उसने परंपराओं को चुनौती दी और अपने पिता की आखिरी इच्छा को पूरा किया.

यह कहानी ठाकुर मोहन सिंह राजावत और उनकी बेटी बृजेश कंवर की है. मोहन सिंह लंबे समय से ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे. अपने आखिरी दिनों में उन्होंने कई बार कहा था कि उनकी बेटी किसी बेटे से कम नहीं है और उनकी अंतिम विदाई वही करेगी. यह सिर्फ एक भावुक बात नहीं थी, बल्कि एक पिता का अपनी बेटी पर पूरा भरोसा था. जब उनका निधन हुआ, तो यह जिम्मेदारी सच में बृजेश के सामने खड़ी थी.

पिता की अंतिम इच्छा, बेटी ने निभाया हर कदमजब अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो वहां मौजूद लोग एक पल के लिए रुक गए. वजह थी—बृजेश कंवर का आगे बढ़कर अपने पिता की अर्थी को कंधा देना. आंखों में आंसू साफ दिख रहे थे, लेकिन कदम बिल्कुल मजबूत थे. उन्होंने पहले अपने पिता को पुष्पांजलि दी और फिर खुद कंधा देकर उन्हें श्मशान तक लेकर गईं.

यह सिर्फ एक बेटी का अपने पिता के लिए प्यार नहीं था, बल्कि उस भरोसे को निभाने की कोशिश थी, जो पिता ने अपने जीते जी उस पर रखा था. हर कदम के साथ एक रिश्ता विदा हो रहा था, लेकिन साथ ही एक नई सोच भी जन्म ले रही थी. वहां मौजूद लोग इस दृश्य को चुपचाप देखते रहे.

मुखाग्नि देकर तोड़ी परंपरा, परिवार बना ताकतश्मशान घाट पर सबसे बड़ा पल तब आया, जब मुखाग्नि देने की बारी आई. आमतौर पर यह जिम्मेदारी बेटे निभाते हैं, लेकिन यहां बृजेश ने खुद यह जिम्मेदारी उठाई. हाथ जरूर कांप रहे थे, लेकिन इरादे बिल्कुल साफ थे. उन्होंने अपने पिता को मुखाग्नि दी और इस दौरान वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं.

इस फैसले में परिवार का साथ भी बड़ी बात रही. बृजेश ने अपने ससुर और पति से अनुमति मांगी, और दोनों ने पूरा समर्थन दिया. यही वजह रही कि वह बिना किसी दबाव के अपने पिता की इच्छा पूरी कर सकीं. यह सिर्फ एक परिवार का फैसला नहीं था, बल्कि एक बड़ा संदेश भी था कि अब सोच बदल रही है.

About the AuthorAnand Pandey

नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें

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Sawai Madhopur,Sawai Madhopur,Rajasthan

First Published :

April 17, 2026, 18:16 IST

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