Rajasthan

एक रियासत, सात शासक… कैसे बना हैदराबाद भारत का शक्तिशाली केंद्र? जानिए इतिहास

Last Updated:April 27, 2026, 22:30 IST

हैदराबाद का इतिहास आसफ जाही वंश के सात निज़ामों के शासन से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने 1724 से 1948 तक इस रियासत को एक मजबूत और विकसित राज्य के रूप में स्थापित किया. मीर क़मरुद्दीन खान से लेकर मीर उस्मान अली खान तक, हर निज़ाम ने अपने शासनकाल में प्रशासन, शिक्षा, उद्योग और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया. अंतिम निज़ाम के समय हैदराबाद को स्वर्ण युग कहा गया, जब यह दुनिया के सबसे आधुनिक और समृद्ध रियासतों में शामिल हो गया.

हैदराबाद की पहचान दुनिया भर में अपनी समृद्ध संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर के लिए है. इतिहासकार ज़ाहिद सरकार के अनुसार, इस शहर को आसफ़ जाही राजवंश के सात निज़ामों ने अपने दूरदर्शी नेतृत्व से गढ़ा था. 1724 से 1948 तक, इन शासकों ने न केवल हैदराबाद की सीमाओं का विस्तार किया, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास में अभूतपूर्व योगदान देकर इसे आधुनिक भारत के प्रमुख केंद्रों में से एक के रूप में स्थापित किया.

निज़ाम-उल-मुल्क आसफ़ जाह प्रथम (1724–1748) का असली नाम मीर क़मरुद्दीन खान था. उन्होंने 1724 में शकर खेड़ा की लड़ाई जीतकर दक्कन पर अपनी पकड़ मजबूत की और मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के एक शक्तिशाली सेनापति थे. इन्होंने स्वतंत्र आसफ़ जाही राजवंश की स्थापना की और उन्हें हैदराबाद राज्य का वास्तविक निर्माता माना जाता है. उन्होंने दक्कन में एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा तैयार किया.

निज़ाम अली खान आसफ़ जाह द्वितीय (1762-1803) ने अपनी राजधानी को औरंगाबाद से हटाकर हैदराबाद स्थानांतरित किया. उनके शासनकाल में हैदराबाद ने कई कूटनीतिक उतार-चढ़ाव देखे. उन्होंने 1798 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर करने वाले पहले प्रमुख भारतीय शासकों में से एक थे. साथ ही, उन्होंने मराठों और मैसूर के टीपू सुल्तान के बीच संतुलन बनाकर हैदराबाद को सुरक्षित रखा.

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सिकंदर जाह आसफ़ जाह तृतीय (1803-1829) के शासनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘सिकंदराबाद’ शहर की स्थापना थी. ब्रिटिश सेना की छावनी के रूप में विकसित हुए इस शहर का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया. आज भी सिकंदराबाद व्यापार और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र माना जाता है.

नासिर-उद-दौला आसफ़ जाह चौथा (1829-1857) ने राज्य के राजस्व और प्रशासनिक तंत्र को आधुनिक बनाने की दिशा में काम किया. उनके काल में शिक्षा और न्याय व्यवस्था में शुरुआती सुधार देखने को मिले. उनके शासनकाल में वित्तीय सुधारों पर विशेष जोर दिया गया और राजस्व प्रणाली को केंद्रीयकृत करने के लिए मैलवी और तहसीलदार जैसे पदों को अधिक प्रभावी बनाया गया. उन्होंने रियासत में शांति बनाए रखने के लिए आंतरिक प्रशासनिक मजबूती पर भी काम किया.

अफ़ज़ल-उद-दौला आसफ़ जाह पांचवे (1857-1869) का शासनकाल इतिहास के एक बड़े बदलाव का गवाह बना. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन्होंने स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया. इसी दौरान हैदराबाद में रेलवे लाइन और टेलीग्राफ सेवा की शुरुआत हुई, जिसने आधुनिक संचार की नींव रखी.

महबूब अली खान आसफ़ जाह छह (1869-1911) को महबूब अली पाशा के नाम से जाना जाता है और वे हैदराबाद के इतिहास में सबसे लोकप्रिय निज़ाम रहे. इन्होंने ‘दरबार-ए-आम’ में जनता की समस्याओं को सीधे सुनना शुरू किया. उनके शासनकाल में 1908 में आई भीषण बाढ़ के बाद शहर को आधुनिक तरीके से बसाने की योजना यानी सिटी इम्प्रूवमेंट बोर्ड तैयार किया गया.

मीर उस्मान अली खान आसफ़ जाह सातवें (1911-1948) अंतिम निज़ाम थे, जिन्हें दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में गिना जाता था. इनके शासन को हैदराबाद का स्वर्ण युग कहा जाता है और इनकी सरकार को निज़ाम सरकार कहा जाता था. इनके शासनकाल में हैदराबाद दुनिया के सबसे आधुनिक राज्यों में शुमार हुआ. इन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय (1918) की स्थापना की, साथ ही निज़ाम सागर, हिमायत सागर और उस्मान सागर जैसे बांध बनवाकर शहर की पेयजल समस्या का समाधान किया. उन्होंने शिक्षा, उद्योग और स्वास्थ्य सेवाओं में रियासत को भारत में अग्रणी बनाया.

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April 27, 2026, 22:30 IST

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