700 से 100 फीट पहुंचा जल स्तर! सीकर के दीपावास में लौटी हरियाली, ऐसे बना राजस्थान का मॉडल विलेज

सीकर. पहाड़ों की गोद में बसा सीकर जिले के नीमकाथाना क्षेत्र का दीपावास गांव कभी जल संकट की गंभीर समस्या से जूझ रहा था. करीब एक दशक पहले तक यहां के हालात इतने खराब थे कि ग्रामीणों के लिए पीने का पानी जुटाना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. यहां के लोगों के अनुसार, 2010 से पहले गांव का भूजल स्तर 700 फीट से भी नीचे चला गया था, जिससे कुएं और हैंडपंप सूख चुके थे. खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर थी, जिसके कारण हर साल फसल की पैदावार अच्छी होगी या नहीं यही समस्या रहती थी. पानी की कमी के चलते न केवल कृषि प्रभावित हुई, बल्कि पशुपालन भी लगभग ठप पड़ गया.
ऐसे हालात में रोजगार के साधन सीमित हो गए और बड़ी संख्या में ग्रामीणों को मजबूर होकर अन्य राज्यों की ओर पलायन करना पड़ा. गर्मियों के मौसम में स्थिति और भयावह हो जाती थी, जब पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता था. इससे बाद गांव के लोगों ने ही मिलकर इस समस्या के समाधान करने की ठानी. पीएचडी ग्रामीण विकास प्रतिष्ठान, नई दिल्ली के सहयोग से गांव में जल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई.
अविनाशी नदी पर छोटे बांध और एनीकट बनाए
ग्रामीणों ने श्रमदान कर अविनाशी नदी पर बरसाती पानी के बहाव को रोकने के लिए छोटे-छोटे बांध और एनीकट बनाने का कार्य शुरू किया. इस पहल में 25 प्रतिशत आर्थिक योगदान स्वयं ग्रामीणों ने दिया, जबकि 75 प्रतिशत राशि एनजीओ द्वारा वहन की गई. सामूहिक प्रयासों और जनसहभागिता ने इस योजना को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई. दीपावास, बूजीयाला और घाटागुवार गांवों में बनाए गए इन बांधों और एनीकटों ने वर्षा जल को रोककर उसे जमीन में भेजने का काम किया गया.
100 फीट तक आ गया भूजल स्तर
एनजीओ के फील्ड सुपरवाइजर दिनेश शर्मा के अनुसार, केवल दीपावास क्षेत्र में ही इन संरचनाओं के माध्यम से बरसात के दौरान 80 लाख क्यूबिक फीट से अधिक पानी का संचयन होने लगा. इससे भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ. हीरवाला बांध के आस-पास 500 मीटर के दायरे में भूजल स्तर घटकर मात्र 100 फीट तक आ गया, जो पहले 700 फीट से भी नीचे था.
अब हर मौसम में खेती कर रहे ग्रामीण
जल स्तर में सुधार के साथ ही गांव की अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटने लगी. जहां पहले खेती केवल मानसून पर निर्भर थी, वहीं अब किसान सालभर खेती करने लगे हैं. रबी और खरीफ फसलों के साथ-साथ सब्जियां, बागवानी और कपास जैसी नकदी फसलें भी उगाई जाने लगी हैं. पानी और चारे की उपलब्धता बढ़ने से पशुपालन को भी बढ़ावा मिला, जिससे ग्रामीणों की आय में वृद्धि हुई.
खेत में चारा भी उगा रहे किसान
गांव के किसान हिम्मत सिंह बताते हैं कि 2005 से पहले अनाज और पशुओं के लिए चारा तक खरीदना पड़ता था, लेकिन अब खेती से सालाना दो से तीन लाख रुपए तक की आय हो रही है. वहीं, मानसिंह के अनुसार, पहले पीने का पानी भी टैंकरों से मंगवाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में सालभर पानी की उपलब्धता बनी रहती है. आज दीपावास ग्राम पंचायत जल संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी का एक सफल उदाहरण बन चुका है. यहां के लोगों ने यह साबित कर दिया कि यदि सामूहिक प्रयास और सही दिशा में काम किया जाए, तो किसी भी समस्या का समाधान संभव है.



