जब लाल बहादुर शास्त्री ने उपवास की अपील की थी, खुद PM हाउस में शुरु कर दी थी खेती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से अपील की कि पश्चिम एशिया संकट के बीच एक वर्ष तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी टालें, ईंधन की बचत करें,वर्क फ्रॉम होम अपनाएं,अनावश्यक विदेश यात्राएं टाल दें. कुछ इस तरह की अपील 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान से जंग के समय भी की थी. उस दौर में, देश में अनाज का भयंकर संकट मंडरा रहा था. अमेरिका अनाज की आपूर्ति रोकने की धमकी दे रही थीं. ऐसे में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश को एक नारा दिया “जय जवान, जय किसान”. यह नारा सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि राष्ट्र के संकल्प का प्रतीक बन गया. उन्होंने अन्न बचाने का आह्वान किया और खुद इसकी शुरुआत अपने मोतीलाल नेहरू प्लेस वाले आवास से की थी. अब यहीं शास्त्री स्मारक है.
जय जवान जय किसान का नारा और दिल्ली में खेती“जय जवान, जय किसान” का नारा 19 अक्टूबर 1965 को इलाहाबाद के उरवा में दिया गया, लेकिन उसकी जड़ें दिल्ली के इसी आवास में थीं. जहां शास्त्री जी ने खुद हल चलाया. उनके अपने परिवार ने भूख सहकर देश को सबक दिया. युद्ध 22 दिन चला और भारत विजयी रहा. अन्न संकट के बावजूद देश ने आत्मनिर्भरता की राह पकड़ी, जो बाद में हरित क्रांति में बदल गई.
शास्त्री जी सपरिवार उसी सरकारी आवास में रहा करते थे,जिसमें से उनकी मृत्यु के बाद दो और बंगले निकले. आजकल उनमें से एक में सोनिया गांधी और दूसरे में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद रहते हैं.
ललिता शास्त्री ने बताया था –शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने इस लेखक को 1988 में एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि युद्ध के दिनों में घर का माहौल गंभीर लेकिन प्रेरणादायक था. सुबह-सुबह शास्त्री जी खुद हल चलाते हुए लॉन में गेहूं बोते. उनके हाथों में हल देखकर परिवार के सदस्य और स्टाफ हैरान रह जाते. ललिता शास्त्री जी और बच्चे भी इस काम में हाथ बंटाते.
शास्त्री जी के निधन के बाद ललिता जी ने उसी बोए गए गेहूं की फसल काटी. यह तस्वीर आज भी देश की सामूहिक स्मृति में जीवित है. आवास के लॉन पर उगते हरे-भरे खेत देखकर लगता कि पूरा घर एक छोटा-सा खेत बन गया था.
“शास्त्री ब्रत”शास्त्री जी ने देशवासियों से अपील की थी कि हफ्ते में कम से कम एक दिन एक वक्त का भोजन छोड़ दें, ताकि अन्न बच सके और जरूरतमंदों तक पहुंचे. लेकिन उन्होंने यह अपील करने से पहले खुद अपने परिवार पर अमल किया. एक दिन पूरे परिवार को दिनभर भूखा रखा गया. बच्चे भूख से कराहते, लेकिन शास्त्री जी की दृढ़ता देखकर सब चुपचाप सह लेते. ललिता जी रसोई में कम आग जलातीं, बचे हुए अन्न से नया भोजन बनातीं. घर में “शास्त्री व्रत” का माहौल था. कोई शिकायत नहीं, बस देश के प्रति समर्पण. स्टाफ के लोग भी प्रभावित होते. रसोईघर में हल्की-फुल्की चर्चाएं होतीं: “शास्त्री जी कह रहे हैं, हम भी मानें.” आवास के गलियारों में त्याग की हवा बहती.
युद्ध की खबरें आती रहतीं. रेडियो पर समाचार सुनने के लिए परिवार इकट्ठा होता. शास्त्री जी चश्मा लगाए, ध्यान से सुनते और फिर फैसले लेते. बच्चों को वे युद्ध की गंभीरता समझाते. आवास में मेहमान कम आते, लेकिन जो आते, उन्हें भी सादगी का पाठ मिलता. कोई भव्य डिनर नहीं, बस चाय और साधारण भोजन. शास्त्री जी वेतन लेना भी कई बार छोड़ देते. उनकी धोती फट जाती तो नई खरीदने की बजाय सिलवा लेते. यह सादगी पूरे घर को प्रभावित करती. ललिता जी घरेलू काम खुद करतीं, नौकरानी रखने से मना कर दिया गया था. बच्चे स्कूल जाते, लेकिन घर पर देशसेवा का मंत्र सुनते.
एक दिन रेस्टोरेंट भी बंद रहतेदिल्ली का पूरा माहौल उन दिनों तनावपूर्ण था. हवा में युद्ध की खबरें, लेकिन शास्त्री जी के आवास से निकलने वाली प्रेरणा ने राष्ट्र को जोड़ रखा था. लोग रेस्तरां में सोमवार को बंद रखते, घरों में उपवास रखते. शास्त्री जी के बंगले से निकलने वाली छोटी-छोटी खबरें – जैसे लॉन पर हल चलाना या परिवार का व्रत – अखबारों में छपतीं और देश भर में लहर पैदा करतीं. आवास के बाहर सुरक्षा बढ़ी हुई थी, लेकिन अंदर शांति और संकल्प का वातावरण. शाम को कभी-कभी बच्चे खेलते, लेकिन युद्ध की चर्चा से उनका बचपन भी प्रभावित था. शास्त्री जी उन्हें बताते, “अन्न बचाओ, देश बचाओ.”
शास्त्री जी के निजी चिकित्सक और राम मनोहर लोहिया अस्पताल के निदेशक डॉ आर.के. करौली बताते थे कि उन दिनों शास्त्री जी के घर में युद्ध की चिंता और किसानों की मेहनत का उत्साह का मिलाजुला माहौल था. रात देर तक शास्त्री जी काम करते, फाइलें देखते, मंत्रियों से बात करते. ललिता जी चुपचाप उनका साथ देतीं. परिवार में हंसी भी होती, लेकिन मितव्ययिता के साथ. कोई बिजली की बर्बादी नहीं, पानी का संरक्षण. यह माहौल देखकर स्टाफ के लोग भी प्रेरित होते. एक साधारण प्रधानमंत्री का घर देश के लिए आदर्श बन गया था.
ललिता शास्त्री उन दिनों अपने बंगले से तुगलक रोड पर स्थित हनुमान मंदिर में जाकर देश की युद्ध में विजय की प्रार्थना किया करती थी. यह जानकारी उन्होंने खुद इस लेखक को दी थी. ललिता जी अपने परिवार के साथ अपने जीवन के अंत तक यहीं रहीं. उनका 1993 में निधन हो गया था. बहरहाल, शास्त्री जी के चले जाने के बाद भी उनका नारा और त्याग आज भी प्रासंगिक है.



