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12वीं में ग्रेस मार्क्स से पास होने वाला ऋषि बिवाल पेपर खरीदकर बनने चला था डॉक्टर

Last Updated:May 15, 2026, 08:42 IST

NEET Paper Leak: नीट परीक्षा में 23 लाख बच्चों की मेहनत को दरकिनार कर पेपर खरीदने वाले गिरोह का पर्दाफाश हुआ है. आरोपी ऋषि बिवाल का रिकॉर्ड चौंकाने वाला है; वह 10वीं में मात्र 43% लाया था और 12वीं में ग्रेस मार्क्स से पास हुआ था. ऐसे अयोग्य छात्र पेपर लीक के दम पर मेधावियों का हक छीनकर डॉक्टर बनने की कगार पर थे. यह खुलासा उन लाखों ईमानदार छात्रों के भविष्य के साथ हुए बड़े खिलवाड़ को उजागर करता है जो दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं.

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12वीं में ग्रेस मार्क्स से पास होने वाला ऋषि पेपर खरीदकर बनने चला था डॉक्टरZoomNeet Paper Leak: 23 लाख बच्चों के भविष्य से खिलवाड़!

NEET Paper Leak: देश के सबसे प्रतिष्ठित एग्जाम नीट (NEET) में बैठने वाले 23 लाख से ज्यादा छात्रों के लिए यह सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि सालों की तपस्या होती है. तपती गर्मी में लाइब्रेरी में घंटों बैठकर पसीना बहाने वाले उन बच्चों के भविष्य के साथ जो खिलवाड़ ‘बिवाल परिवार’ जैसे लोगों ने किया है, वह रूह कंपा देने वाला है. एक तरफ वो छात्र हैं जो एक-एक नंबर के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, और दूसरी तरफ ऋषि बिवाल जैसे लोग हैं जो केवल नोटों के दम पर डॉक्टर की सफेद कोट पहनने का ख्वाब देख रहे थे.

सीबीआई की जांच में जो खुलासा हुआ है, वह काबिलियत का मजाक उड़ाने जैसा है. विकास बिवाल ने जिस चचेरे भाई ऋषि बिवाल के लिए नीट का पेपर खरीदा था, उसका शैक्षणिक रिकॉर्ड शर्मनाक है.

10वीं का रिकॉर्ड: ऋषि के 10वीं कक्षा में महज 43.67 फीसदी अंक आए थे.
12वीं का रिकॉर्ड: 12वीं में भी ऋषि की हालत इतनी खराब थी कि वह जैसे-तैसे ‘ग्रेस मार्क्स’ (कृपांक) लेकर पास हुआ और बमुश्किल 50 फीसदी नंबर जुटा पाया.सोचिए, जो छात्र स्कूली स्तर की परीक्षाओं में ठीक से पास नहीं हो सका, वह पेपर लीक के दम पर देश के टॉप मेडिकल कॉलेज में सीट कब्जाने वाला था. यदि इस महाघोटाले का भंडाफोड़ नहीं होता, तो आज ऋषि बिवाल जैसा ‘अयोग्य’ उम्मीदवार एक मेधावी छात्र का हक मारकर डॉक्टर बन चुका होता.

23 लाख परिवारों के भरोसे का कत्लयह केवल एक पेपर लीक नहीं है, बल्कि उन 23 लाख परिवारों के भरोसे का कत्ल है जो अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगा देते हैं. जब विकास बिवाल जैसे लोग लाखों रुपये फेंककर पेपर खरीदते हैं, तो वे केवल एक शीट नहीं खरीदते, बल्कि उस गरीब और मध्यम वर्गीय छात्र की उम्मीदें तोड़ते हैं जो बिना किसी जुगाड़ के केवल अपनी मेहनत के भरोसे एग्जाम हॉल में बैठता है.

सिस्टम के मुंह पर तमाचाग्रेस मार्क्स से पास होने वाले और औसत से भी कम दिमाग वाले छात्रों का नीट क्लियर कर लेना हमारे एजुकेशन सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है. जांच में साफ है कि अगर यह खुलासा नहीं होता, तो ऋषि का चयन तय था. सवाल यह है कि ऐसे ‘खरीदे हुए डॉक्टर’ कल को समाज का क्या भला करेंगे? 23 लाख बच्चों की चीख आज न्याय मांग रही है कि आखिर कब तक मेहनत की रोटी खाने वालों पर नोटों की गद्दी भारी पड़ती रहेगी.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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