कम पानी में तगड़ा मुनाफा! रेत में उग रहे ‘औषधीय सोने’ से बदल रही किसानों की जिंदगी, ग्लोबल मार्केट में भी हिट

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रेत में उग रहा ‘औषधीय सोना’, जालोर के किसानों की बदल रही जिंदगी
Last Updated:May 16, 2026, 18:12 IST
Jalore Isabgol Farming: जालोर में ईसबगोल की खेती किसानों के लिए “रेत में उगा औषधीय सोना” बन चुकी है. यह फसल कम पानी और कम लागत में अच्छी पैदावार देती है, जिससे किसान तेजी से इसकी खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. ईसबगोल के औषधीय गुणों के कारण इसकी मांग देश-विदेश में लगातार बढ़ रही है. अमेरिका, यूके, जर्मनी और यूएई जैसे देशों में जालोर का ईसबगोल बड़े पैमाने पर निर्यात किया जा रहा है. सरकार की योजनाओं और आधुनिक कृषि तकनीकों के सहयोग से यह फसल अब किसानों की समृद्धि और जालोर की नई पहचान बन गई है.
जालोर की भौगोलिक परिस्थितियां ईसबगोल की खेती के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती हैं. यहां की हल्की रेतीली और दोमट मिट्टी, कम नमी और ठंडी सर्दियों का मौसम इस फसल की बेहतर ग्रोथ में मदद करता है. यही कारण है कि यहां उत्पादित ईसबगोल की गुणवत्ता अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहतर मानी जाती है, जिसकी मांग देश-विदेश में लगातार बढ़ रही है. इसके अलावा यहां की जलवायु फसल को रोगों से भी काफी हद तक सुरक्षित रखती है. सही समय पर बुवाई और कटाई करने से किसानों को बेहतर उत्पादन और अच्छा मुनाफा मिलता है.
जालोर का ईसबगोल अब वैश्विक बाजार में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है. यहां से तैयार ईसबगोल का सबसे बड़ा निर्यात अमेरिका में होता है, जो कुल निर्यात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा माना जाता है. इसके अलावा जर्मनी, इटली, यूके और बेल्जियम जैसे यूरोपीय देशों में भी इसकी भारी मांग है. ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और खाड़ी देशों, खासकर यूएई में भी जालोर का ईसबगोल बड़े पैमाने पर भेजा जाता है. उच्च गुणवत्ता और औषधीय गुणों के कारण विदेशी बाजारों में इसकी खास पहचान बन चुकी है, जिससे जालोर को ईसबगोल का प्रमुख एक्सपोर्ट हब कहा जाने लगा है.
ईसबगोल के औषधीय गुण इसे और भी खास बनाते हैं. इसका उपयोग मुख्य रूप से पाचन संबंधी समस्याओं, जैसे कब्ज, गैस और बवासीर में किया जाता है. आयुर्वेद में इसे एक प्राकृतिक औषधि माना गया है, जो बिना किसी साइड इफेक्ट के पेट की सफाई में मदद करता है. आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. श्रीराम वैद्य के अनुसार, ईसबगोल एक बेहतरीन डाइटरी फाइबर है, जो आंतों की सफाई के साथ पाचन तंत्र को मजबूत करता है. इसके अलावा यह कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने और वजन संतुलित बनाए रखने में भी सहायक माना जाता है. नियमित सेवन से आंतों की सेहत बेहतर होती है और शरीर डिटॉक्स रखने में मदद मिलती है.
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राजस्थान का जालोर जिला आज ईसबगोल की खेती के लिए देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना चुका है. “घोड़ा जीरा” के नाम से प्रसिद्ध यह फसल यहां के किसानों की आय का एक मजबूत स्रोत बन गई है. रेतीली मिट्टी और शुष्क जलवायु वाले इस क्षेत्र में ईसबगोल की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, जिससे जालोर को एक कृषि हब के रूप में पहचान मिली है. इसके बढ़ते उत्पादन ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ाए हैं. किसान अब पारंपरिक खेती से हटकर इस नगदी फसल की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं.
ईसबगोल की खेती किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल साबित हो रही है. इस फसल में पानी की आवश्यकता कम होती है और यह कम समय में तैयार भी हो जाती है, जिससे किसानों को जल्दी आय मिलने लगती है. उन्नत किस्मों और आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग से किसान बेहतर उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है. ईसबगोल की खेती में जोखिम भी अन्य फसलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम माना जाता है. कम सिंचाई और सीमित देखभाल में भी यह फसल अच्छी पैदावार देती है, इसलिए किसान तेजी से इसकी खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं.
ईसबगोल की खेती जालोर के किसानों के लिए एक गेम चेंजर साबित हुई है. पहले जहां किसान पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे, वहीं अब ईसबगोल ने उनकी आय में कई गुना बढ़ोतरी की है. इसकी बुवाई रबी सीजन में की जाती है और कम पानी में भी यह अच्छी पैदावार देता है. फसल तैयार होने में ज्यादा समय नहीं लगता, जिससे किसान जल्दी मुनाफा कमा लेते हैं. बाजार में इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है, खासकर जब निर्यात की मांग बढ़ती है. कई किसान अब उन्नत बीजों और वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है.
किसान अब आधुनिक कृषि यंत्रों और नई तकनीकों का उपयोग करने लगे हैं, जिससे मेहनत कम और उत्पादन ज्यादा हो रहा है. ड्रिप सिंचाई और उन्नत बीजों के इस्तेमाल से फसल की गुणवत्ता भी बेहतर हो रही है. मंडियों में इसकी अच्छी मांग के चलते किसानों को तुरंत नकद आय मिलती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है. यही वजह है कि जालोर आज देश में ईसबगोल उत्पादन का प्रमुख केंद्र बन चुका है और यहां का “घोड़ा जीरा” विदेशों में भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है.
जालोर में ईसबगोल की खेती ने न केवल किसानों की आय बढ़ाई है, बल्कि पूरे क्षेत्र की पहचान को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. “रेत में उगा औषधीय सोना” कहलाने वाली यह फसल अब स्थानीय किसानों के लिए समृद्धि का मजबूत आधार बन चुकी है. कम लागत और बेहतर मुनाफे के कारण किसान तेजी से इसकी खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. सरकार भी ईसबगोल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है, जिससे किसानों को तकनीकी सहायता, उन्नत बीज और बाजार तक बेहतर पहुंच मिल रही है. इससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं.



