35 साल बाद भारत में मिला नया दुर्लभ सांप! बीकानेर में दिखा रेगिस्तान का दुर्लभ रहस्यमयी ‘दोमुंहा’ बोआ

बीकानेर. थार के रेगिस्तान बीकानेर की जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व में मिले एक दुर्लभ सांप की पहचान सिसतान सैंड बोआ (Eryx sistanensis) के रूप में हुई है. वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत में इस प्रजाति की यह पहली आधिकारिक उपस्थिति है. इससे पहले वर्ष 1991 में व्हिटेकर बोआ को भारतीय सर्प सूची में शामिल किया गया था. करीब 35 साल बाद किसी नई बोआ प्रजाति के भारत में मिलने की पुष्टि हुई है. राजकीय डूंगर महाविद्यालय के जूलॉजी विभागाध्यक्ष एवं प्रो. डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि स्थानीय भाषा में इस सांप को आमतौर पर “दोमुंहा सांप” कहा जाता है.
इसकी विशेष बनावट के कारण लोग अक्सर भ्रमित हो जाते हैं. इस प्रजाति की पहली पहचान ईरान के सिस्तान क्षेत्र में हुई थी, इसलिए इसका नाम सिसतान सैंड बोआ रखा गया. अब इसका अस्तित्व राजस्थान के बीकानेर, चूरू और सीकर क्षेत्रों में भी दर्ज किया गया है. डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि जोड़बीड़ क्षेत्र में करीब डेढ़-दो वर्ष पहले इस सांप के कुछ फोटो लिए गए थे. उस समय इसकी सटीक पहचान नहीं हो पाई थी. बाद में वन्यजीव विशेषज्ञ विवेक शर्मा ने तस्वीरों का अध्ययन कर इसकी पहचान सिसतान सैंड बोआ के रूप में की. इससे यह भी संकेत मिलता है कि जोड़बीड़ क्षेत्र में इस प्रजाति का अच्छा विचरण है.
सिसतान सैंड बोआ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी पूंछ है
इस सांप की सबसे रोचक विशेषता इसकी पूंछ है. इसकी आंखें बेहद छोटी होती हैं और आसानी से दिखाई नहीं देतीं, जबकि पूंछ का आकार सिर और मुंह जैसा प्रतीत होता है. जब कोई शिकारी इस पर हमला करता है तो यह अपना वास्तविक सिर छिपाकर पूंछ की दिशा में हरकत करने लगता है. इससे परभक्षी भ्रमित होकर पूंछ पर हमला करता है और सांप सुरक्षित निकल जाता है. प्रो. डॉ. प्रताप सिंह के अनुसार, यह सांप जहरीला नहीं होता और मुख्य रूप से चूहों का शिकार करता है. यही कारण है कि इसे किसान मित्र प्रजाति माना जाता है. खेतों में चूहों की संख्या नियंत्रित कर यह फसलों की रक्षा करने में मदद करता है. हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसे खतरनाक समझकर मार दिया जाता है, जबकि वास्तव में यह मनुष्यों के लिए नुकसानदेह नहीं है.
वन्यजीव विशेषज्ञ विवेक शर्मा और धर्मेंद्र खंडाल ने किया अध्ययन
इस महत्वपूर्ण खोज की पुष्टि वन्यजीव विशेषज्ञ विवेक शर्मा और धर्मेंद्र खंडाल द्वारा किए गए अध्ययन में हुई है, जो 26 मई को प्रकाशित जर्नल ऑफ थ्रेटन्ड टैक्सा में प्रकाशित हुआ. अध्ययन के दौरान सीकर जिले की रामगढ़ शेखावाटी तहसील के खेतों और बाहरी क्षेत्रों से तीन सिसतान सैंड बोआ, जिसमें एक शिशु, एक किशोर और एक वयस्क दर्ज किए गए. चूरू जिले से भी इस प्रजाति के प्रमाण मिले हैं. वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर डॉ. जितु सोलंकी ने बताया कि जुलाई 2025 में जोड़बीड़ में रात्रिकालीन भ्रमण के दौरान यह सांप दिखाई दिया था. इसकी कुंद पूंछ, छोटा सिर और रेतीला रंग सामान्य सैंड बोआ से अलग लग रहा था, लेकिन उस समय वैज्ञानिक सत्यापन नहीं हो पाया. अब शोध पत्र प्रकाशित होने के बाद तस्वीरों के मिलान से इसकी पहचान की पुष्टि हो गई है.
इस प्रजाति की सुरक्षा और संरक्षण के लिए के लिए होंगे अध्ययन
वन्यजीव विशेषज्ञ विवेक शर्मा का मानना है कि ईरान से लगभग 2200 किलोमीटर दूर राजस्थान में इस प्रजाति का मिलना पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह खोज न केवल थार मरुस्थल की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है, बल्कि जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व को गिद्धों के साथ-साथ दुर्लभ सरीसृपों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास के रूप में स्थापित करती है. वन्यजीव वैज्ञानिकों का कहना है कि इस प्रजाति की सुरक्षा और संरक्षण के लिए आगे और विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है.



