“उसकी किस्मत में मरना लिखा था”, भरत तिवारी एनकाउंटर पर एक पुलिस अधिकारी का यह वाक्य क्यों परेशान करता है?

Last Updated:June 21, 2026, 14:01 IST
Bhojpur Encounter SHO Rajesh Malakar Statement: “उसकी किस्मत में मरना लिखा था”… यह बयान उस पुलिसवाले का जिसके नेतृत्व में पुलिस टीम ने भरत तिवारी का कथित तौर पर एनकाउंटर किया था. अगर भरत तिवारी ने वास्तव में पुलिस पर फायरिंग की थी, जैसा कि पुलिस का दावा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. लेकिन अगर घटना का कोई वीडियो सामने आता है, जिसमें वह आत्मसमर्पण करता हुआ दिखाई देता है, तो उसके बाद क्या हुआ, यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. यही वह बिंदु है, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. मगर चिंता पुलिसकर्मी की भाषा और उसकी संवेदनहीनता को लेकर है. भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण में पुलिस की संवेदनशीलता, जवाबदेही और कानून के शासन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर, निलंबित थानाध्यक्ष राजेश मालकार के बयान से बवाल
आरा. बिहार के भोजपुर जिले के भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में एक ऐसा सनसनीखेज खुलासा हुआ है, जिसने पुलिसिया संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दी हैं. इस कथित मुठभेड़ को अंजाम देने वाले शाहपुर के तत्कालीन थानाध्यक्ष राजेश मालाकार ने बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार से बातचीत के दौरान एक बेहद हैरान करने वाला बयान दिया है. राजेश मालाकार ने दोटूक लहजे में कहा, “भरत की किस्मत में मरना लिखा था.” खास बात यह कि यह बात कहते वक्त थानाध्यक्ष के चेहरे पर न तो कोई शिकन थी, न कोई दुख और न ही एक बेदाग युवक को मौत के घाट उतारने का कोई पछतावा. थानाध्यक्ष ने दावा किया कि भरत ने उनके जवानों पर गोलियां चलाई थीं, जिसके जवाब में वह मारा गया. हालांकि, उनका यह दावा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे सरेंडर वाले वीडियो और आम कट्टों और पिस्तौल की तकनीकी क्षमता के सामने पूरी तरह सवालों के घेरे में आ गया है.
थानाध्यक्ष की संवेदनहीनता, चेहरे पर न पछतावा, न कोई मलाल
जब वरिष्ठ पत्रकार थानेदार से सवाल जवाब कर रहे थे तो इसमें सबसे विचलित करने वाला पहलू थानाध्यक्ष राजेश मालाकार का बर्ताव था. उनका अहंकार साफ तौर पर दिखा रहा था और राज्य में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार कानून के राज और मानवाधिकारों की रक्षा का दावा की खिल्ली उड़ाता हुआ दिख रहा था. मूल बात यह कि ऊपर के स्तर पर सरकार जो भी दावे करे, लेकिन जमीनी स्तर पर खाकी के रक्षक ही भक्षक बने नजर आ रहे हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार के सामने बेहद सामान्य तरीके से यह कह देना कि “उसकी (भरत तिवारी) किस्मत में मरना लिखा था”, यह साफ बताता है कि कई पुलिसकर्मियों के भीतर कानून और मानव जीवन के प्रति कोई सम्मान शेष नहीं रह गया है. स्पष्ट है कि पुलिसवालों की संवेदनहीनता ही इस एनकाउंटर की पूरी थ्योरी को एक सुनियोजित हत्या की श्रेणी में लाकर खड़ा करती है.
15 राउंड फायरिंग का संदेहास्पद दावा, पिस्टल का तकनीकी सच
वरिष्ठ पत्रकार से इस बातचीत में अपनी आत्मरक्षा की कहानी को सही साबित करने के लिए थानाध्यक्ष राजेश मालाकार ने दावा किया है कि भरत तिवारी की ओर से पुलिस टीम पर पूरे 15 राउंड फायरिंग की गई थी. ऐसे में भोजपुर पुलिस कप्तान और जांच टीम के सामने अब यह एक बड़ा तकनीकी सवाल बन चुका है कि क्या एक साधारण या प्रतिबंधित बोर की सिंगल पिस्तौल से एक बार में 15 राउंड फायरिंग संभव है? जबकि, तथ्य यह है कि एक आम पिस्तौल की मैगजीन की क्षमता अमूमन 6 से 8 कारतूस की होती है. ऐसे में 15 राउंड गोली चलाने के दावे पर खुद रक्षा विशेषज्ञ भी सकते में हैं.
गायब खोखे खोल रहे हैं पुलिसिया स्क्रिप्ट की पोल
हालांकि, अगर पुलिस के इस दावे को एक पल के लिए सच मान भी लिया जाए कि भरत ने 15 राउंड गोलियां दागी थीं, तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि वे 15 खोखे कहां हैं जो भरत की पिस्तौल से निकले थे? एनकाउंटर साइट से पुलिस की खोजी टीम को भरत की पिस्तौल से चली गोलियों के खोखे क्यों नहीं मिले? अगर खोखे मौके से बरामद हुए हैं, तो पुलिस सामने आकर बताए, और अगर नहीं तो यह साफ है कि 15 राउंड फायरिंग की यह पूरी कहानी कागजी और मनगढ़ंत है, जिसे सिर्फ अपनी चमड़ी और वर्दी को बचाने के लिए थाने में बैठकर बुना गया है.
वायरल वीडियो बनाम खाकी की कहानी, अब जांच पर टिकी नजरें
थानाध्यक्ष राजेश मालाकार की यह पूरी कहानी फर्जी लगती है, जब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे लाइव वीडियो को देखा जाता है. वीडियो में साफ और स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है कि भरत भूषण तिवारी ने पुलिस के सामने अपने हथियार डाल दिए थे और वह पूरी तरह आत्मसमर्पण कर चुका था. कानून के जानकार कहते हैं कि एक निहत्थे और सरेंडर कर चुके व्यक्ति पर चार-चार गोलियां दागना मुठभेड़ नहीं बल्कि ‘कस्टोडियल किलिंग’ का सीधा मामला बनता है. कानून के जानकार कहते हैं कि पुलिस की वर्दी सिर्फ शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि संयम और संवेदनशीलता का भी प्रतीक होती है. एक जिम्मेदार अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह जांच पूरी होने तक तथ्यों पर ही बात करे, न कि ऐसे बयान दे जो निष्पक्षता पर सवाल खड़े करें.
सबसे बड़ा सवाल कानून के शासन की है…
भरत तिवारी की मौत एनकाउंटर थी या कुछ और, इसका फैसला मीडिया, सोशल मीडिया या पुलिस नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया करेगी. लेकिन इतना जरूर है कि जब किसी एनकाउंटर पर सवाल उठ रहे हों, तब पुलिस के हर शब्द का महत्व बढ़ जाता है. इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गोली किसने चलाई, बल्कि यह भी है कि क्या कानून के शासन में किसी पुलिस अधिकारी को यह कहने का नैतिक अधिकार है कि “उसकी किस्मत में मरना लिखा था.” लोकतंत्र में किसी नागरिक की किस्मत का फैसला कानून करता है, न कि किसी वर्दीधारी की धारणा.
About the AuthorVijay jha
पत्रकारिता क्षेत्र में 22 वर्षों से कार्यरत. प्रिंट, इलेट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन. नेटवर्क 18, ईटीवी, मौर्य टीवी, फोकस टीवी, न्यूज वर्ल्ड इंडिया, हमार टीवी, ब्लूक्राफ्ट डिजिट…और पढ़ें
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