Rajasthan

कचरे से कमाल! 10 टन प्लास्टिक से बना डालीं टेबल-कुर्सियां, CM भी पाली के ‘ग्रीन वॉरियर’ के हुए मुरीद

पाली. सोचिए… अगर आपके घर का प्लास्टिक कचरा, समाज के काम आने वाली खूबसूरत टेबल और कुर्सी बन जाए, तो कैसा रहेगा? जी हां, ऐसा कर दिखाया है राजस्थान के पाली जिले के रहने वाले एक ‘ग्रीन वॉरियर’ ने! आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं बीसलपुर के 35 वर्षीय कानाराम मेवाड़ा से. कानाराम ने पिछले दो साल में एक या दो किलो नहीं, बल्कि पूरे 10 टन प्लास्टिक और पॉलिथीन को इकट्ठा किया. लेकिन इसके पीछे का तरीका और भी दिलचस्प है. कानाराम ने लोगों से कचरा लेने के बदले उन्हें शक्कर और चायपत्ती बांटी, तो वहीं स्कूली बच्चों को प्लास्टिक की बोतलें लाने पर टॉफियां दीं.

इस कबाड़ को री-साइकिल कर उन्होंने शानदार टेबल और कुर्सियां तैयार की हैं, जिन्हें अब भामाशाहों की मदद से पार्कों, स्टेशनों और मंदिरों में लगाया जा रहा है. कानाराम के इस अनोखे और पर्यावरण-फ्रेंडली जज्बे की गूंज अब मुख्यमंत्री तक भी पहुंच चुकी है. सुमेरपुर में आयोजित एक सेवा शिविर के दौरान खुद सूबे के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कानाराम से मुलाकात की और उनके इस सराहनीय कार्य की जमकर पीठ थपथपाई.

मुख्यमंत्री भी कचरे से बने आइटम देख रह गए हैरान

कानाराम की इस अनूठी मुहिम का नतीजा है कि उन्हे आज ग्रीन वॉरियर के नाम से पहचाना जाने लगा है. पाली के बीसलपुर निवासी कानाराम मेवाड़ा से सीएम भजनलाल शर्मा ने सुमेरपुर में आयोजित सेवा शिविर के दौरान मुलाकात की. कानाराम प्लास्टिक के कचरे को री-साइकिल कर टेबल-कुर्सी बनाते हैं. कानाराम डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण करने वालों से प्लास्टिक लेते हैं. साथ ही स्कूल में जाकर बच्चों को प्लास्टिक की बोतल के बदले में टॉफी देकर प्लास्टिक इकट्ठा करते हैं. जब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पाली के सुमेरपुर में आयोजित शहरी सेवा शिविर में हिस्सा लेने पहुंचे तो इस दौरान सीएम, कानाराम की टेबल-कुर्सी की स्टॉल पर पहुंचकर उनके कार्यो की सराहना की.

सीएम ने भविष्य में मदद का दिलाया विश्वास

बाली के विधायक पुष्पेन्द्र सिंह ने एक-एक कर पूरे प्रोजेक्ट की जानकारी मुख्यमंत्री को दी. इस पर सीएम भजनलाल शर्मा ने कानाराम से प्लास्टिक इकट्ठा करने के साथ बनाने के पूरे प्रोसेस के बारे में जाना. मुख्यमंत्री ने स्वयं अपने मंत्रियों के साथ इस कुर्सी पर बैठकर भी देखा और इसकी मजबूती और काम की तारीफ की. साथ ही उन्हें आश्वासन दिया कि भविष्य में योजनाओं के जरिए उन्हें मदद की जाएगी. इसके बाद शिविर में प्रभारी मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने भी कानाराम की स्टॉल को देखा और उनके नवाचार के बारे में जाना.

अंग्रेजों की बात दिल में चुभ गई

कानाराम ने अपनी इस पूरी मुहिम के शुरू करने के पीछे का कारण बताते हुए कहा कि पाली के बीसलपुर गांव में मेरी छोटी सी चाय की दुकान है. पूरे गांव में करीब 400 मकान है. जवाई बांध क्षेत्र टूरिस्ट एरिया है. ऐसे में उस चाय की दुकान से ही उसकी रोजी रोटी चलती थी. साल 2022 में लॉकडाउन के बाद एक बार गांव की नाली प्लास्टिक थैलियों से जाम होने की वजह से गंदा पानी सड़क पर फैल गया. ऐसे में सैलानियों ने अपनी नाक बंद कर ली. साथ ही, अंग्रेजी में कहा कि ‘यहां कितनी गंदगी है.’ सैलानी की बात कानाराम के मन में चुभ गई. सोचा कि गंदगी से गांव की बदनामी हुई है. कुछ ऐसा किया जाए जिससे गांव में आने वाले मेहमान गांव की तारीफ करें.

5 साल में एकत्रित किया 10 टन कचरा

कानाराम को इस अभियान की शुरूआत किए 5 साल का समय पूरा हो चुका है. ऐसे में अब तक उन्होने 10 टन वेस्ट इकट्ठा कर चुके है. इसे लेकर उन्होंने बाली क्षेत्र के गांवों में अभियान चलाने का भी काम किया. जहां स्कूली बच्चे प्लास्टिक की बोतल और पॉलिथीन लेकर आ रहे हैं उन्हें उसके बदले पेन, पेंसिल और टॉफी आदि उनकी जरूरत का सामान देने का काम किया.

सामाजिक संगठनों की मदद से शुरू हुआ काम

पॉलीथिन को लेकर मुंबई में सामाजिक संस्था चलाने वाले बिसलपुर निवासी दिलीप कुमार जैन से मुलाकात हुई. दिलीप ने बताया कि प्लास्टिक जमीन को बंजर बनाता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है. इसलिए गांव को प्लास्टिक मुक्त करना होगा. इसके बाद जवाई क्षेत्र में आने वाले पर्यटकों को जागरुक कर उनसे प्लास्टिक की थैली और बोतल को इकट्ठा करना शुरू किया. वहीं प्लास्टिक के बदले दुकान से शक्कर देना और चाय पिलाना शुरु किया. ऐसे में कोई अच्छी आय नहीं थी. इस पर डीजेईडी फाउंडेशन के संस्थापक दिलीप जैन और नमोकार फाउंडेशन के संस्थापक अशोक मेहता ने पूरा सहयोग किया.

10 लाख से 25 लाख तक की मशीन

कानाराम ने अभियान की शुरूआत की बात करें तो वर्ष 2022 से लेकर 2024 तक प्लास्टिक का वेस्ट एकत्रित किया. इसके साथ ही ऑनलाइन रिसर्च करता रहा कि इसे कैसे अच्छी तरह री-साइकिल किया जाएगा. इस दौरान नोएडा में मिलने वाली एक 10 लाख रुपए की मशीन के बारे में पता चला. इसके बाद सामाजिक संस्थाओं की मदद से नोएड़ा से छोटी मशीन खरीदी और टेबल-कुर्सी बनाना शुरू किया. साथ ही सामाजिक संस्था और भामाशाहों की मदद से उन्हें लगवाना शुरू किया.

कानाराम ने बताया कि मशीन छोटी थी और दो साल में इकट्ठा किया गया वेस्ट ज्यादा था. ऐसे में बड़ी मशीन की जरूरत महसूस होने लगी. बाद में कानाराम को सीएएसआर द्वारा मदद मिली और फंड की मदद के बाद उन्होंने 25 लाख रूपए में वर्ष 2026 में बड़ी मशीन खरीदने के बाद निर्माण में तेजी लाने का काम किया.

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