बीकानेर का अद्भुत ‘स्वर्ण ताजिया’! पूरे ताजिये पर चढ़ी है सोने की परत, 22 साल की मेहनत ने रची अनमोल विरासत

Last Updated:June 25, 2026, 14:32 IST
Golden Taziya Bikaner: बीकानेर में स्थित ‘स्वर्ण ताजिया’ अपनी अनूठी भव्यता और कलात्मक सौंदर्य के कारण विशेष पहचान रखता है. इस ताजिये की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी सतह पर सोने की परत चढ़ाई गई है, जो इसे सामान्य ताजियों से अलग और बेहद आकर्षक बनाती है. यह कृति बीकानेर की प्रसिद्ध उस्ता कला का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है. स्थानीय कलाकारों और शिल्पकारों ने लगभग 22 वर्षों की मेहनत और समर्पण से इस अनमोल विरासत को संजोकर रखा है. स्वर्ण ताजिया केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और हस्तशिल्प परंपरा का भी जीवंत दस्तावेज है. मुहर्रम के दौरान इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं.
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बीकानेर. मुहर्रम के अवसर पर देशभर में विभिन्न प्रकार के ताजिये बनाए और निकाले जाते हैं, लेकिन बीकानेर का एक ताजिया अपनी अनूठी कला और भव्यता के कारण सबसे अलग पहचान रखता है. शहर के मोहल्ला उस्तान में तैयार किया जाने वाला यह विशेष ताजिया पूरी तरह सोने की परत और उस्ता कला की बारीक नक्काशी से सुसज्जित है. यही वजह है कि इसे देखने के लिए हर वर्ष न केवल बीकानेर बल्कि राजस्थान और देश के अन्य हिस्सों से भी लोग पहुंचते हैं. बीकानेर में मुहर्रम के दौरान सूखे मेवे, मोम, कांच, मिट्टी, रूई, लोहे और चूड़ियों से बने ताजिये भी देखने को मिलते हैं, लेकिन पूरे ताजिये पर सोने की परत और उस्ता कला की नक्काशी वाला यह स्वर्ण ताजिया अपनी तरह का अनूठा उदाहरण है.
करीब 12 फीट ऊंचे और 6 फीट चौड़े इस ताजिये की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके ऊपर से लेकर नीचे तक उस्ता कला की सुनहरी कलम का काम किया गया है. कलाकारों के अनुसार इस ताजिये पर लगभग एक किलो सोने का उपयोग किया गया है. सोने की परत से सजे इस ताजिये की कीमत लाखों रुपये में आंकी जाती है. इसकी भव्यता और कलात्मकता इसे भारत के सबसे अनूठे ताजियों में शामिल करती है.
ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन अरबी और उर्दू भाषाताजिये पर पवित्र कुरान की आयतें तथा कर्बला की ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन अरबी और उर्दू भाषा में सुंदर ढंग से अंकित किया गया है. उस्ता कला की बारीक नक्काशी के कारण ताजिये का प्रत्येक हिस्सा किसी कलाकृति की तरह दिखाई देता है. रातभर की सजावट और अंतिम तैयारियों के बाद जब इसे मोहल्ले में लोगों के दर्शन के लिए रखा जाता है तो इसकी सुनहरी चमक हर किसी को आकर्षित करती है.
सुनहरी कलम का कार्य शुरू किया गयाउस्ता कलाकार मोहम्मद हनीफ उस्ता बताते हैं कि पहले मोहल्ला उस्तान में हर वर्ष गत्ते का ताजिया बनाया जाता था. समय के साथ मोहल्ले के बुजुर्गों और कलाकारों ने विचार किया कि जब यहां विश्वप्रसिद्ध उस्ता कला के कलाकार मौजूद हैं तो ताजिये को भी इसी कला से स्थायी स्वरूप दिया जाए. इसके बाद लगभग 22 वर्ष पहले इस ताजिये पर सुनहरी कलम का कार्य शुरू किया गया. तब से लेकर आज तक हर वर्ष इसकी देखरेख, मरम्मत और सौंदर्य संवर्धन का काम जारी है.
उस्ता कला की पारंपरिक तकनीक का उपयोगइस ताजिये को बनाने में उस्ता कला की पारंपरिक तकनीक का उपयोग किया गया है. सबसे पहले मिट्टी से उभरा हुआ (एम्बोस) कार्य किया जाता है, जिसके बाद उस पर सोने के वर्क चिपकाए जाते हैं. यह प्रक्रिया बेहद जटिल और समय लेने वाली होती है. कलाकारों के अनुसार इस प्रकार के ताजिये को तैयार करने में कई वर्षों का समय लग जाता है, जबकि हर वर्ष इसकी सजावट और रखरखाव में भी लंबा समय लगता है.
हाथ से बनाई गई नई कागजी जालियां लगाईताजिये की डिजाइन ईराक के पवित्र शहर कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के रौजे से प्रेरित है. कलाकारों ने उस पवित्र स्थल की वास्तुकला को ध्यान में रखते हुए इसकी संरचना तैयार की है. यही कारण है कि यह ताजिया श्रद्धा और कला का अद्भुत संगम माना जाता है. इस स्थायी ताजिये की एक और खास बात यह है कि हर वर्ष इस पर हाथ से बनाई गई नई कागजी जालियां लगाई जाती हैं. इन जालियों को कलाकार स्वयं काटकर तैयार करते हैं और हर बार नया डिजाइन देते हैं. रंगों और सजावट में बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान को भी विशेष रूप से उभारा जाता है.
About the AuthorJagriti Dubey
Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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Bikaner,Rajasthan



