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इस पेड़ की छाल से बनाई जाती है मलेरिया की दवा, इन देशों में पाए जाते हैं ये पेड़, भारत में होती है खेती

Last Updated:June 25, 2026, 18:18 IST

Cinchona and Anti-Malaria Drugs: मलेरिया का इलाज करने वाले दवा क्विनीन (quinine) बनाने के लिए सिनकोना नामक पेड़ की छाल का इस्तेमाल किया जाता है. यह पेड़ मूल रूप से दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है, लेकिन भारत समेत कई देशों में इसकी खेती भी की जाती है. सिनकोना के पेड़ में औषधीय विशेषताएं होती हैं, जो इसे बेहद खास बना देती हैं.इस पेड़ की छाल से बनाई जाती है मलेरिया की दवा, इन देशों में पाए जाते हैं पेड़Zoomसिनकोना की छाल से मलेरिया की दवा क्विनीन बनाई जाती है. (Image- AI)

Cinchona Tree Medicinal Facts: अधिकतर लोगों को लगता है कि आयुर्वेद में ही पेड़-पौधों से दवाएं बनाई जाती हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. एलोपैथी की करीब 25% दवाओं में प्लांट कंपाउंड इस्तेमाल किए जाते हैं. पिछले कई दशकों तक मलेरिया ठीक करने के लिए क्विनीन दवा यूज की जा रही है और यह बेहद पावरफुल दवा एक पेड़ की छाल से बनाई जाती है. ऐसा ही एक औषधीय पेड़ सिनकोना (Cinchona) है, जिसकी छाल से प्राप्त होने वाला क्विनीन (Quinine) मलेरिया के इलाज में ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. एक समय ऐसा था जब मलेरिया के खिलाफ क्विनीन ही सबसे प्रभावी दवा मानी जाती थी और इसने लाखों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई थी.

ब्रिटानिका की रिपोर्ट के मुताबिक सिनकोना रूबिएसी फैमिली का एक सदाबहार पेड़ है, जो मूल रूप से दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है. इसकी कई प्रजातियों की छाल में क्विनीन और अन्य औषधीय एल्कलॉइड पाए जाते हैं. इन सभी तत्वों का उपयोग लंबे समय तक मलेरिया के ट्रीटमेंट में किया जाता रहा है. अब मलेरिया की कई एडवांस दवाएं भी बन चुकी हैं, लेकिन एक जमाने में क्विनीन ही एकमात्र दवा थी, जो मलेरिया होने पर लोगों की जिंदगी बचाती थी. सिनकोना नामक पेड़ की बदौलत ही मलेरिया के ट्रीटमेंट में ऐतिहासिक सफलता मिली थी. आज भी यह दवा असरदार मानी जाती है.

छाल से कैसे बनती है मलेरिया की दवा?

सिनकोना की छाल में मौजूद क्विनीन नामक प्राकृतिक यौगिक मलेरिया पैदा करने वाले पैरासाइट की ग्रोथ रोकने में मदद करता है. 19वीं सदी में वैज्ञानिकों ने पहली बार इस छाल से शुद्ध क्विनीन को अलग किया था. इसके बाद क्विनीन मलेरिया ट्रीटमेंट की प्रमुख दवा बन गई. आज भले ही कई आधुनिक एंटी-मलेरियल दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन क्विनीन का उपयोग अब भी कुछ विशेष परिस्थितियों में किया जाता है. यह आज भी भरोसेमंद और असरदार दवा मानी जाती है.

किन देशों में पाए जाते हैं ये पेड़?

सिनकोना के पेड़ मूल रूप से पेरू, इक्वाडोर, कोलंबिया और बोलिविया जैसे दक्षिण अमेरिकी देशों के पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं. बाद में इसकी खेती एशिया और अफ्रीका के कई देशों में भी शुरू की गई. ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि इसकी व्यावसायिक खेती भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया और कुछ अफ्रीकी क्षेत्रों में भी की जाती है. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में सिनकोना की खेती शुरू की गई थी. विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और कलिम्पोंग क्षेत्र और दक्षिण भारत की कुछ पहाड़ी जगहों पर इसके बागान लगाए गए थे. भारत में इसका मुख्य उद्देश्य क्विनीन का उत्पादन करना था, ताकि मलेरिया जैसी गंभीर बीमारी से निपटा जा सके. मलेरिया मच्छरों से फैलने वाली गंभीर बीमारी है, जिसका प्रकोप अब भी है.

क्यों खास है सिनकोना का पेड़?

सिनकोना को चिकित्सा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण पेड़ों में गिना जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार 17वीं से 20वीं सदी तक मलेरिया के खिलाफ यह सबसे प्रभावी प्राकृतिक उपचारों में से एक था. क्विनीन को संक्रामक रोग के इलाज में इस्तेमाल होने वाले शुरुआती सफल औषधीय यौगिकों में भी गिना जाता है. हालांकि आधुनिक चिकित्सा में कई नई एंटी-मलेरियल दवाएं आ चुकी हैं, फिर भी क्विनीन का ऐतिहासिक और औषधीय महत्व बना हुआ है. यही कारण है कि सिनकोना का पेड़ आज भी औषधीय पौधों की सूची में एक विशेष स्थान रखता है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.About the Authorअमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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