Antarctica 20 Lakh sq km Sea Ice Loss | Global Warming | Science News Hindi | अंटार्कटिका में पिघली 20 लाख स्क्वायर किमी बर्फ, मंडराया तबाही का खतरा

होमदुनियाअन्य देश
महाविनाश का अलार्म! अंटार्कटिका से अचानक गायब हो गई 20 लाख स्क्वायर किमी बर्फ
Last Updated:July 04, 2026, 20:11 IST
अंटार्कटिका में 20 लाख स्क्वायर किलोमीटर समुद्री बर्फ गायब हो चुकी है. यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन की नई रिसर्च के अनुसार इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. बर्फ कम होने से समुद्र ज्यादा गर्मी सोख रहा है और बादल बदलने लगे हैं. इससे ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार बहुत तेज हो सकती है. साल 2100 तक समुद्र का वाटर लेवल उम्मीद से ज्यादा बढ़ने का खतरा है.ग्लोबल वार्मिंग का सबसे खतरनाक रूप: अंटार्कटिका की बर्फ गायब होने से मचेगी तबाही. (AI Photo)
नई दिल्ली: अंटार्कटिका महाद्वीप भले ही हमसे बहुत दूर है. मगर वहां हो रहे बदलाव पूरी दुनिया के लिए खतरनाक संकेत दे रहे हैं. यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन यानी ईजीयू की एक नई रिसर्च ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है. इस रिसर्च के मुताबिक अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ का ग्लोबल वार्मिंग से बहुत गहरा कनेक्शन है. सितंबर 2025 में अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ अपने रिकॉर्ड स्तर से बहुत कम पाई गई है. इस इलाके में तापमान सामान्य से 25 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया. यह गर्मी लगभग एक महीने तक लगातार बनी रही. फ्यूचर साइंस की रिपोर्ट में कहा गया, ‘ऐतिहासिक एवरेज की तुलना में इस बार करीब 20 लाख स्क्वायर किलोमीटर समुद्री बर्फ गायब है.’ इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ का पिघलना धरती के क्लाइमेट सिस्टम में बड़े बदलाव का इशारा है. यह स्थिति पूरी दुनिया में तबाही ला सकती है.
समुद्री बर्फ गायब होने से दुनिया पर क्या असर होगा?
समुद्री बर्फ सिर्फ जमा हुआ पानी नहीं है. यह सूरज की किरणों को रिफ्लेक्ट करके धरती का तापमान कंट्रोल करती है. जब बर्फ कम होती है तो समुद्र ज्यादा हीट सोखने लगता है. हमारा समुद्र पहले से ही 90 परसेंट से ज्यादा एक्स्ट्रा हीट सोख रहा है. अगर समुद्र इस गर्मी को न सोखे तो धरती का तापमान बहुत तेजी से बढ़ जाएगा.
मगर ज्यादा गर्मी सोखने के गंभीर परिणाम होते हैं. गर्म होने पर समुद्र का पानी फैलता है जिससे वाटर लेवल बढ़ता है. इससे भयानक तूफान आ सकते हैं. इसके साथ ही मरीन इकोसिस्टम पूरी तरह तबाह हो सकता है. अंटार्कटिका का यह नुकसान लोकल नहीं बल्कि ग्लोबल है.
बादलों और बर्फ का अजीब कनेक्शन
ईजीयू की रिसर्च में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका की बर्फ और बादलों के बीच गहरा कनेक्शन पाया है. अभी तक के क्लाइमेट मॉडल में इस कनेक्शन को बहुत कम करके आंका गया था. बादल अपने प्रकार और ऊंचाई के हिसाब से गर्मी को रोकते या रिफ्लेक्ट करते हैं.
अंटार्कटिका के हालात बहुत दूर मौजूद बादलों के पैटर्न को भी बदल रहे हैं. इसका मतलब है कि यह महाद्वीप पूरी दुनिया के मौसम को तय कर रहा है. पुराने क्लाइमेट मॉडल में कम समय का डेटा यूज किया गया था. इसी वजह से वैज्ञानिक समुद्र की हीट सोखने की क्षमता को ठीक से नहीं समझ पाए थे.
क्या साल 2100 तक तबाही आने वाली है?
रिसर्च के आंकड़े सचमुच बहुत डराने वाले हैं. रिपोर्ट के अनुसार साल 2100 तक समुद्र का वाटर लेवल हमारी सोच से कहीं ज्यादा बढ़ सकता है. धरती अब ग्रीनहाउस गैसों के प्रति ज्यादा सेंसिटिव हो चुकी है. इसका मतलब है कि ग्लोबल वार्मिंग अब और तेजी से अपना असर दिखाएगी.
अंटार्कटिका में आए इन हालिया बदलावों को हम इस तरह समझ सकते हैं:
रिकॉर्ड गिरावट: सितंबर 2025 में बर्फ का लेवल सबसे निचले स्तर पर पहुंचा.
असामान्य तापमान: एक महीने तक तापमान सामान्य से 25 डिग्री ज्यादा रहा.
भारी नुकसान: 20 लाख स्क्वायर किलोमीटर समुद्री बर्फ पूरी तरह गायब हुई.
प्री-इंडस्ट्रियल पीरियड में जब महासागर ज्यादा ठंडे थे तब बादलों का फॉर्मेशन अलग था. मगर अब इंसानी एक्टिविटीज के कारण क्लाइमेट सिस्टम पूरी तरह बिगड़ चुका है. अंटार्कटिका को एक अलग-थलग हिस्सा समझना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी. अगर बर्फ ऐसे ही सिकुड़ती रही तो आने वाले समय में बाढ़ और हीटवेव का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा.
About the Authorदीपक वर्माDeputy News Editor
<strong>दीपक वर्मा</strong> (<em>Deepak Verma</em>) की गिनती हिंदी डिजिटल मीडिया के तेजी से उभरते चेहरों में होती है. वह <strong>हिंदी</strong> के साथ <strong>डिप्टी न्यूज़ एडिटर</strong> की भूमिका में ज…और पढ़ें
अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज
खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में
सबमिट करें
Location :
New Delhi,Delhi



