हिरोशिमा न्यूक्लियर अटैक: 6 अगस्त 1945 की वो सुबह, जिसने हमेशा के लिए दुनिया बदल दी

Last Updated:August 06, 2026, 15:45 IST
यह कहानी आज से ठीक 81 साल पहले 6 अगस्त 1945 की है. द्वितीय विश्व युद्ध अपने अंतिम दौर पर पहुंच चुका था. अमेरिका की तमाम कोशिशों के बावजूद जापान आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार नहीं था. बौखलाए अमेरिका ने जापान को झुकाने के लिए एक ऐसा फैसला लिया, जिसने 6 अगस्त 1945 की तारीख को मानव इतिहास के सबसे भयावह दिनों में दर्ज कर दिया. अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर में ‘लिटिल बॉय’ नाम का यह यूरेनियम बेस्ड बम गिराने की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए थे. 6 अगस्त 1945 की सुबह करीब 8:15 बजे अमेरिकी B-29 बॉम्बर जेट ‘एनोला गे’ से बम गिराया गया. बम गिरने के कुछ ही सेकेंड बाद सब कुछ तबाह हो गया. धमाका इतना भयावह था कि शहर का बड़ा हिस्सा पलभर में राख बन गया. क्या है हिरोशिमा में परमाणु हमले की पूरी कहानी, आइए आपको बताते हैं एक बात…
6 अगस्त 1945 की सुबह हिरोशिमा में सब कुछ सामान्य था. लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त थे. तभी आसमान में एक अमेरिकी विमान दिखाई दिया. कुछ ही सेकंड बाद इतनी तेज चमक हुई कि लोगों की आंखें चौंधिया गईं. इसके बाद हुए विस्फोट ने इस तारीख को इतिहास में सबसे भयावह त्रासदियों में दर्ज कर दिया. एक पल में पूरा शहर तबाही की आग में समा गया.
1945 तक जर्मनी हार चुका था, लेकिन जापान अभी भी मित्र राष्ट्रों के खिलाफ लड़ाई जारी रखे हुए था. अमेरिका को डर था कि जापान पर जमीनी हमला करने में उसके लाखों सैनिक मारे जा सकते हैं. इसी बीच अमेरिका का सीक्रेट ‘मैनहैटन प्रोजेक्ट’ सफल हो चुका था और दुनिया का पहला परमाणु बम तैयार था. इसके इस्तेमाल पर अंतिम फैसला लिया गया.
1939 में वैज्ञानिकों ने परमाणु ऊर्जा से हथियार बनने की संभावना जताई थी. इसके बाद अमेरिका ने ब्रिटेन और कनाडा के सहयोग से मैनहैटन प्रोजेक्ट शुरू किया. करीब दो अरब डॉलर की लागत से हजारों वैज्ञानिकों ने इस सीक्रेट मिशन पर काम किया. जुलाई 1945 में न्यू मैक्सिको में पहला सफल परमाणु परीक्षण किया गया, जिसे ‘ट्रिनिटी टेस्ट’ कहा गया.
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अमेरिका ने कई शहरों का अध्ययन किया, लेकिन आखिरकार हिरोशिमा को निशाना बनाया गया. इसकी वजह यह थी कि यहां जापानी सेना का बड़ा मुख्यालय था और शहर पहले बमबारी से काफी हद तक बचा हुआ था. अमेरिका चाहता था कि परमाणु बम का वास्तविक प्रभाव पूरी दुनिया देख सके. इसलिए हिरोशिमा को प्राथमिक लक्ष्य बनाया गया.
6 अगस्त 1945 की सुबह अमेरिकी B-29 बॉम्बर जेट एनोला गे टिनियन द्वीप से उड़ान भरकर जापान पहुंचा. विमान के पायलट कर्नल पॉल टिब्बेट्स थे. विमान में ‘लिटिल बॉय’ नाम का करीब चार टन वजनी यूरेनियम आधारित परमाणु बम रखा गया था. पूरे मिशन को बेहद गोपनीय रखा गया था ताकि जापान को इसकी भनक तक न लगे.
सुबह 8 बजकर 15 मिनट पर बम गिराया गया. जमीन पर पहुंचने से पहले करीब 600 मीटर की ऊंचाई पर इसका विस्फोट हुआ. सिर्फ 43 सेकंड में तेज रोशनी, भीषण गर्मी और धमाके की लहर ने पूरे शहर को तबाह कर दिया. हजारों इमारतें ढह गईं, आग फैल गई और लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला.
विस्फोट के तुरंत बाद करीब 70 से 80 हजार लोगों की मौत हो गई. कई लोग इतनी तेज गर्मी में जल गए कि उनकी पहचान तक नहीं हो सकी. हजारों लोग मलबे के नीचे दब गए. पूरे शहर में चीख-पुकार मच गई. अस्पताल भी तबाह हो चुके थे, इसलिए घायलों का इलाज करना लगभग असंभव हो गया था.
जो लोग विस्फोट से बच गए, उन्हें बाद में रेडिएशन का सामना करना पड़ा. हजारों लोगों को कैंसर, ल्यूकेमिया और दूसरी गंभीर बीमारियां हुईं. कई बच्चों में जन्मजात विकार देखे गए. रेडिएशन का इफेक्ट कई सालों तक बना रहा. पीड़ितों की अगली पीढ़ियों में भी इसका असर महसूस किया गया.
हिरोशिमा पर हमले के बाद भी जापान ने तुरंत आत्मसमर्पण नहीं किया. इसके बाद 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने नागासाकी पर ‘फैट मैन’ नाम का दूसरा परमाणु बम गिराया. इस हमले में भी हजारों लोग मारे गए. लगातार दो परमाणु हमलों ने जापान की सैन्य और राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह हिला दिया.
15 अगस्त 1945 को जापान के सम्राट हिरोहितो ने रेडियो प्रसारण के जरिए आत्मसमर्पण की घोषणा की. इसके बाद 2 सितंबर 1945 को औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए और दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो गया. हालांकि युद्ध खत्म हो गया, लेकिन हिरोशिमा और नागासाकी की तबाही मानव इतिहास की सबसे दर्दनाक याद बनकर रह गई.
आज हिरोशिमा फिर से बस चुका है और आधुनिक शहर के रूप में दुनिया के सामने खड़ा है. लेकिन वहां का पीस मेमोरियल, एटॉमिक बॉम्ब डोम और संग्रहालय हर साल लाखों लोगों को उस भयावह दिन की याद दिलाते हैं.
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August 06, 2026, 15:45 IST



