बहन आज भी शहीद भाई की प्रतिमा पर बांधती है राखी, कारगिल के वीर गणपत सिंह की वो कहानी जो आंखें नम कर दे

सीकर. कारगिल युद्ध की कहानी जब भी सामने आती है, तब देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों का जिक्र जरूर होता है. ऐसी ही वीरगाथा सीकर जिले के सिहोट छोटी गांव के शहीद गणपत सिंह ढाका की है. किसान परिवार में जन्मे गणपत सिंह ने बचपन से ही भारतीय सेना में जाने का सपना देखा था. 30 जुलाई 1993 को वे भारतीय सेना की 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन में भर्ती हुए, इसके बाद साल 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने दुश्मनों से लड़ते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.
साल 1999 में पाकिस्तान की सेना और घुसपैठियों ने भारतीय सीमा क्षेत्र में आने वाली कई ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था. इन चोटियों पर दुश्मन की मौजूदगी भारतीय सेना के लिए बड़ी चुनौती थी. खासकर बटालिक सेक्टर की ऊंची चोटियां रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इनसे श्रीनगर को लेह से जोड़ने वाले NH-1A मार्ग पर नजर रखी जा सकती थी. यह रास्ता लद्दाख तक सेना के लिए मदद, हथियार और जरूरी सामान पहुंचाने के लिहाज से बेहद अहम था. दुश्मन को इन चोटियों से खदेड़ने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया. इसी अभियान के दौरान 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन को जिम्मेदारी सौंपी गई. गणपत सिंह ढाका को अपनी बटालियन के साथ नियंत्रण रेखा के समीप प्वाइंट 5363 पर कब्जा करने का काम मिला.
जवानों को देखते ही पोस्ट छोड़कर भागे दुश्मन
गणपत सिंह और उनके साथियों ने दुर्गम पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू की, भारतीय जवानों के अदम्य साहस के सामने दुश्मन के हौसले पस्त होने लगे और वे अपनी पोस्ट छोड़कर पीछे हट गए, लेकिन लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई. 25 जुलाई की सुबह करीब 250 पाकिस्तानी सैनिकों और कमांडो ने पलटवार किया. इसके बाद दोनों ओर से भीषण संघर्ष हुआ, गोलियों की बौछार के बीच गणपत सिंह ने अपने साथियों के साथ मोर्चा संभाले रखा वे आखिरी सांस तक दुश्मन का मुकाबला करते रहे, इसी लड़ाई में वे शहीद हो गए. देश की रक्षा करते हुए गणपत सिंह ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए और हमेशा के लिए अमर हो गए.
किसान परिवार में जन्मे, बचपन से था फौज में जाने का सपना
गणपत सिंह का जन्म रतन लाल ढाका और देबू देवी के घर हुआ था, वे किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे. गांव के माहौल में पले-बढ़े गणपत सिंह के मन में बचपन से ही सेना में जाने का जुनून था. शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाया और भारतीय सेना का हिस्सा बने, उनकी शहादत के समय परिवार ने अपना जवान बेटा खो दिया. वे अपने पीछे पत्नी वीरांगना मंजू देवी और पुत्र नरेंद्र ढाका को छोड़ गए. आज परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी है, उनका एक पेट्रोल पंप है पुत्र नरेंद्र ढाका कलेक्ट्रेट में एलडीसी के पद पर कार्यरत हैं, जबकि पुत्रवधू प्रियंका मेडिकल कॉलेज में लैब टेक्नीशियन हैं.
गांव में बना शहीद स्मारक, स्कूल का नाम भी शहीद के नाम
गणपत सिंह की शहादत के बाद सिहोट छोटी गांव में उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए कई काम हुए. गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का नामकरण शहीद गणपत सिंह ढाका के नाम पर किया गया है. गांव में उनका शहीद स्मारक भी बनाया गया है, वे गांव के इकलौते शहीद हैं. गांव में खेल स्टेडियम बनाने की घोषणा भी हो चुकी है, लेकिन अभी तक स्टेडियम का निर्माण नहीं हो पाया है. वहीं ग्राम पंचायत की ओर से सेना भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए गांव में ट्रैक तैयार कराया गया है. गांव के सूबेदार और सरपंच झाबर ओला बताते हैं कि गणपत सिंह की शहादत के बाद गांव के युवाओं में सेना में जाने का जज्बा और मजबूत हुआ. गांव में करीब 28 सेवानिवृत्त सैनिक हैं, आज भी युवा सेना में भर्ती होने के लिए मेहनत करते हैं और शहीद गणपत सिंह को अपना आइडल मानते हैं. गांव में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस सहित कई मौकों पर शहीद गणपत सिंह को श्रद्धांजलि दी जाती है, उनके नाम से खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं.
शादी से पहले बहन ने प्रतिमा को बांधी राखी
गणपत सिंह की शहादत से जुड़ी एक भावुक परंपरा आज भी परिवार में कायम है. उनकी बहन जब शादी के बंधन में बंधने जा रही थीं, तब उन्होंने सबसे पहले अपने शहीद भाई की प्रतिमा के पास पहुंचकर तिलक किया और राखी बांधी. आज भी रक्षाबंधन के अवसर पर बहन अपने शहीद भाई की प्रतिमा पर पहुंचती हैं और राखी बांधकर भाई के प्रति अपना प्रेम और सम्मान व्यक्त करती हैं. परिवार में आज भी कोई बड़ा कार्यक्रम होता है तो सबसे पहले शहीद गणपत सिंह ढाका की प्रतिमा के सामने निमंत्रण पत्र रखा जाता है.



