Ajab Gajab: 200 साल पुराना अनोखा मंदिर…संत की जीवित समाधि पर विराजमान हैं महादेव, गुंबद में छिपा है बड़ा रहस्य

Last Updated:August 11, 2026, 11:47 IST
नागौर के गिनाणी तालाब किनारे स्थित देवलपति महादेव मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और करीब 200 साल पुराने इतिहास के लिए खास पहचान रखता है. यहां भगवान शिव का शिवलिंग किसी सामान्य गर्भगृह में नहीं, बल्कि संत खेम भारती की जीवित समाधि के ऊपर स्थापित है. मंदिर में कल्कि के घोड़े देवदत्त की दुर्लभ प्रतिमा, बिना गारे के विशेष लॉकिंग सिस्टम से जुड़ी पत्थर की संरचना और गुंबद से शिवलिंग उतारे जाने की रोचक कहानी भी श्रद्धालुओं को हैरान करती है.
नागौर. राजस्थान की धरती पर ऐसे कई मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी आस्था सदियों पुरानी है लेकिन नागौर के गिनाणी तालाब के किनारे स्थित देवलपति महादेव मंदिर की कहानी कुछ अलग है. यहां भगवान शिव का शिवलिंग किसी सामान्य गर्भगृह में स्थापित नहीं, बल्कि एक संत की जीवित समाधि के ऊपर विराजमान है. यही विशेषता इस मंदिर को प्रदेश के अन्य शिव मंदिरों से अलग पहचान देती है. करीब 200 साल पुराने इस मंदिर की दीवारों, गुंबद और पत्थरों में इतिहास के साथ कई रोचक रहस्य भी समाए हैं.
संतों की समाधि पर शिवलिंग स्थापित करने की परंपरा शैव और नाथ संप्रदाय की साधना परंपराओं से जुड़ी मानी जाती है. इतिहासकार जेएल शास्त्री के अनुसार इसकी धार्मिक जड़ें करीब 10वीं-11वीं शताब्दी और उससे भी पहले की शैव साधना परंपराओं तक जोड़ी जाती हैं. मान्यता है कि शिव साधना में लीन संत देह त्याग के बाद भी शिव तत्व में ही लीन रहते हैं. इसी भाव से कुछ संतों की समाधि पर शिवलिंग स्थापित किया जाता था. हालांकि आम व्यक्ति की समाधि पर शिवलिंग स्थापित करना सामान्य परंपरा नहीं रही है.
एक हार… फिर जीत और उसके बाद संत की समाधि
देवलपति मंदिर की कहानी जोधपुर के राजा मानसिंह और संत खेम भारती से जुड़ी हुई है. एक युद्ध में राजा मानसिंह को हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद वे मेड़ता पहुंचे और खेम भारती बाबा से मिले. राजा ने संत को अपनी हार के बारे में बताया, कहा जाता है कि संत उनके साथ युद्ध में गए और अगली लड़ाई में राजा को विजय मिली. इसके बाद खेम भारती बाबा ने नागौर में जीवित समाधि ले ली. संत के प्रति श्रद्धा के भाव से राजा मानसिंह ने उनकी समाधि पर मंदिर का निर्माण करवाया. इसी समाधि के ऊपर शिवलिंग स्थापित किया गया, जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है.
मंदिर में सिर्फ महादेव नहीं, कल्कि के घोड़े के भी दर्शन
देवलपति महादेव मंदिर की खासियत केवल समाधि पर स्थापित शिवलिंग तक सीमित नहीं है. यहां कल्कि अवतार के देवदत्त नामक घोड़े की करीब 200 वर्ष पुरानी दुर्लभ प्रतिमा भी स्थापित है. धार्मिक मान्यता के अनुसार कलियुग के अंत में भगवान विष्णु कल्कि अवतार लेकर देवदत्त घोड़े पर सवार होकर आएंगे और अधर्म का अंत कर धर्म की पुनः स्थापना करेंगे. श्रद्धालु महादेव के दर्शन के साथ इस प्रतिमा की भी पूजा करते हैं.
पत्थरों में छिपी है कारीगरी की अनोखी कहानी
मंदिर की स्थापत्य कला भी अपने आप में बहुत खास है, यहां पत्थरों को सामान्य तरीके से गारे से जोड़ने के बजाय विशेष लॉकिंग सिस्टम से जोड़ा गया है. मंदिर का गुंबद बारीक कलाकृतियों से सजा है, चारों दिशाओं में भगवान ब्रह्मा के स्वरूप दिखाई देते हैं, जबकि गुंबद के भीतर चार महिलाओं की कलात्मक आकृतियां हैं. किसी के हाथ में ढोलक, किसी के हाथ में एकतारा, किसी के हाथ में शिला और बच्चा तो किसी के हाथ में अलगोजा दिखाई देता है. गोलाकार हिस्से में हाथियों पर सवार सेनाओं के युद्ध दृश्य भी उकेरे गए हैं. मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक बात यह भी बताई जाती है कि शिवलिंग को मुख्य द्वार से गर्भगृह में नहीं लाया गया था. पुजारी नौरतन भारती के अनुसार इसे ऊपर बने बड़े गुंबद के एक हिस्से में मौजूद छोटे दरवाजे से नीचे उतारकर निज मंदिर में स्थापित किया गया था.
About the AuthorMonali Paul
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
और पढ़ेंLocation :
Nagaur,Rajasthan
First Published :
August 11, 2026, 11:47 IST



