Success Story: कभी पहनने को चप्पल तक नहीं थे, आज एक हजार से ज्यादा परिवारों के रोजगार का सहारा हैं सुमेर सिंह

Last Updated:August 17, 2026, 12:42 IST
कभी स्कूल की ड्रेस और चप्पल तक के लिए संघर्ष करने वाले झुंझुनूं के सुमेर सिंह सैनी ने गरीबी को अपनी कमजोरी नहीं, ताकत बनाया. सब्जी बेचने से लेकर शिक्षक और सेल्समैन बनने तक कई मुश्किलों का सामना किया, फिर उधार लेकर रियल एस्टेट कारोबार शुरू किया. आज उनकी कंपनी 1000 से अधिक लोगों को रोजगार दे रही है. सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं भुलाया और गांव में पानी, शिक्षा व सामाजिक विकास के लिए करोड़ों रुपये के काम करवाए.
कभी स्कूल की ड्रेस सिलवाने तक के पैसे नहीं थे और पैरों में पहनने के लिए चप्पल भी नसीब नहीं होती थी. किसान परिवार में जन्मे झुंझुनू के किशोरपुरा के सुमेर सिंह सैनी ने गरीबी को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि संघर्ष की ताकत बनाया. पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरी नहीं मिली तो सब्जी, आइसक्रीम और गन्ना बेचकर परिवार का सहारा बने. यहीं से शुरू हुआ उनका संघर्ष आगे चलकर सफलता की ऐसी कहानी बनी, जो आज हजारों लोगों की जिंदगी के लिए प्रेरणा बन रही है.
सुमेर सिंह ने करीब दो साल तक सब्जी और अन्य छोटे-मोटे काम कर अपना जीवन चलाया. इसके बाद निजी स्कूल में शिक्षक की नौकरी की, लेकिन आमदनी कम होने के कारण परिवार का खर्च चलाना मुश्किल रहा. उन्होंने फिर सेल्स और मार्केटिंग का रुख किया. इंश्योरेंस कंपनी में नौकरी के पहले ही दिन तीन पॉलिसी बेचकर 3 हजार रुपए कमाए. चार साल तक काम करने के बाद कंपनी बंद हो गई, लेकिन सुमेर सिंह ने हार मानने के बजाय नई राह तलाश ली.
कंपनी बंद होने के बाद उन्होंने दोस्तों से पैसे उधार लिए और रियल एस्टेट कारोबार में कदम रखा. जोखिम भरे इस फैसले ने उनकी जिंदगी बदल दी. लगातार मेहनत और भरोसे के साथ कारोबार को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2021 में उन्होंने रियासत ग्रुप की नींव रखी. आज कंपनी से 1000 से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है. यानी जिस व्यक्ति ने कभी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष किया, वही आज दूसरों के परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया बन रहा है.
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सफलता मिलने के बाद सुमेर सिंह अपने गांव को नहीं भूले. किशोरपुरा और आसपास के क्षेत्रों में पानी की समस्या को देखते हुए उन्होंने करीब 22 लाख रुपए की लागत से तीन नए बोरिंग करवाए और दो पुराने बोरिंग को गहरा करवाया. नेवरी ग्राम पंचायत में भी 10 लाख रुपए की लागत से दो बोरिंग करवाए गए. वर्ष 2025 की भीषण गर्मी में ग्रामीणों की प्यास बुझाने के लिए उन्होंने 575 पानी के टैंकर निःशुल्क भिजवाए. अब गांव में एक और पानी की टंकी और बोरिंग बनवाने की तैयारी है.
जिस स्कूल में बैठकर सुमेर सिंह ने अपने सपनों को उड़ान दी, अब उसी स्कूल की तस्वीर बदलने में जुटे हैं. किशोरपुरा के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में करीब डेढ़ करोड़ रुपए के विकास कार्य उन्होंने शुरू करवाए हैं. यह सिर्फ भवन और सुविधाओं पर खर्च नहीं, बल्कि उस जगह के प्रति उनका कर्ज चुकाने जैसा है, जहां से उनके संघर्ष की कहानी शुरू हुई थी. शिक्षा को गांव के बच्चों के भविष्य की सबसे मजबूत नींव मानते हुए वे स्कूल के विकास में लगातार योगदान दे रहे हैं.
सुमेर सिंह सैनी की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सफलता से ज्यादा संघर्ष दिखाई देता है. कभी चप्पल और स्कूल की ड्रेस के लिए पैसे जुटाना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को अपने सपनों के रास्ते में नहीं आने दिया. सब्जी बेचने से लेकर शिक्षक बनने, इंश्योरेंस की पॉलिसी बेचने और फिर रियल एस्टेट कारोबार खड़ा करने तक का सफर बताता है कि मुश्किल हालात इंसान को रोक नहीं सकते, अगर हौसला और मेहनत कायम रहे. आज उनकी कामयाबी सिर्फ उनकी अपनी नहीं.
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August 17, 2026, 12:42 IST



