Children health : क्या आपका बच्चा भी पढ़ाई में कमजोर, जानिए छोटे परिवारों में क्यों बढ़ रही ये दिक्कत?

Last Updated:August 18, 2026, 19:00 IST
Children learning tips : एकल परिवारों में बच्चों की मुसीबत बढ़ती जा रही है. पहले घर में दादा-दादी, चाचा-चाची और परिवार के दूसरे सदस्य बच्चों के साथ समय बिताते थे. छोटी फैमिली में ऐसा नहीं हो पा रहा है. कई घरों में माता-पिता और बच्चे ही रह गए हैं. इसका असर कई बार बच्चों के व्यवहार, भावनात्मक विकास और पढ़ाई पर भी दिखाई देने लगा है. जौनपुर की मनोवैज्ञानिक डॉ. साधना मौर्या लोकल 18 से बताती हैं कि अगर आपका बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं है तो इसका मतलब ये नहीं कि वह मानसिक रूप से कमजोर है. जब बच्चे परिवार और समाज के दूसरे लोगों से कम मिलते-जुलते हैं तो उनके अनुभवों का दायरा भी सीमित हो सकता है. बच्चों के विकास के लिए केवल किताबें और स्कूल पर्याप्त नहीं हैं.
जौनपुर. एकल परिवार और बदलती जीवनशैली ने बच्चों की दुनिया भी बदल दी है. पहले घर में दादा-दादी, चाचा-चाची और परिवार के दूसरे सदस्य बच्चों के साथ समय बिताते थे. उनसे बच्चे बातें करते, कहानियां सुनते और रोजमर्रा की जिंदगी से बहुत कुछ सीखते थे. अब कई घरों में माता-पिता और बच्चे ही रह गए हैं. ऐसे में बच्चों का सामाजिक मेलजोल और परिवार के बुजुर्गों से संवाद कम होता जा रहा है. इसका असर कई बार उनके व्यवहार, भावनात्मक विकास और पढ़ाई पर भी दिखाई देने लगा है. जौनपुर की पुनर्वास मनोवैज्ञानिक डॉ. साधना मौर्या लोकल 18 से बताती हैं कि किसी बच्चे का पढ़ाई में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाना हमेशा उसके मानसिक रूप से कमजोर होने का संकेत नहीं होता. इसके पीछे ध्यान की कमी, एकाग्रता, सामाजिक व्यवहार, सीखने की कठिनाई, भावनात्मक परेशानी और पारिवारिक परिस्थितियां जैसे कई कारण हो सकते हैं.
नहीं कर पाते व्यक्त
डॉ. साधना मौर्या कहती हैं कि कुछ बच्चों में इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी होती है, जिसमें उनकी समझने की क्षमता और रोजमर्रा की जीवनशैली से जुड़ी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं. लेकिन सामान्य बच्चों में पढ़ाई कमजोर होने के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं. किसी बच्चे का अटेंशन स्पैन, यानी कितनी देर तक वह किसी चीज पर ध्यान लगा सकता है, कम हो सकता है. किसी बच्चे को गणित समझने में परेशानी होती है तो किसी को सुनकर समझने या अपनी बात लिखकर व्यक्त करने में कठिनाई होती है. कुछ बच्चे जानते बहुत कुछ हैं, लेकिन परीक्षा में उसे ठीक से लिख या व्यक्त नहीं कर पाते.
परिवार से दूरी भी घातक
मनोवैज्ञानिक डॉ. साधना मौर्या के मुताबिक बच्चों के विकास में सोशल फंक्शनिंग यानी सामाजिक मेलजोल की बड़ी भूमिका होती है. जब बच्चे परिवार और समाज के दूसरे लोगों से कम मिलते-जुलते हैं तो उनके अनुभवों का दायरा भी सीमित हो सकता है. पहले दादा-दादी और परिवार के बड़े बच्चों के साथ समय बिताते थे. कहानियां, संस्कार, अनुभव और जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी बातें बच्चों तक स्वाभाविक रूप से पहुंचती थीं. अब कई बच्चों को यह अनुभव कम मिल रहा है. इसका असर उनके सामाजिक और भावनात्मक विकास पर पड़ सकता है. डॉ. साधना मौर्या का कहना है कि बच्चों के विकास के लिए केवल किताबें और स्कूल पर्याप्त नहीं हैं. परिवार के साथ संवाद, सामाजिक वातावरण और भावनात्मक जुड़ाव भी जरूरी है. बच्चों को अपनी बात कहने, सवाल पूछने और अपनी परेशानी साझा करने का अवसर मिलना चाहिए.
सिर्फ नंबरों से न करें तय
डॉ. साधना कहती हैं कि परिवार में अलग-अलग पीढ़ियों के बीच तालमेल बेहद जरूरी है. बुजुर्गों को बच्चों की सोच समझनी चाहिए और बच्चों को भी बुजुर्गों के अनुभव और नजरिए को समझने का प्रयास करना चाहिए. दोनों पीढ़ियों के बीच संवाद बेहतर होगा तो परिवार का माहौल भी बेहतर बनेगा. अगर बच्चा अचानक पढ़ाई से दूर होने लगे, किसी से बात न करे, लगातार चिड़चिड़ा रहे, ध्यान लगाने में परेशानी हो या अपनी बात व्यक्त करने में कठिनाई महसूस करे तो उसे सिर्फ डांटने के बजाय उसके व्यवहार का कारण समझने की कोशिश करें. जरूरत पड़ने पर शिक्षक, मनोवैज्ञानिक या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है. डॉ. साधना कहती हैं कि बच्चे को सिर्फ नंबरों से नहीं, उसके व्यवहार और भावनाओं से भी समझना जरूरी है.
About the AuthorPriyanshu Gupta
प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…
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Jaunpur,Uttar Pradesh
First Published :
August 18, 2026, 19:00 IST



