करौली का पटवा परिवार चार पीढ़ियों से संजोए है परंपरा, रक्षाबंधन पर तैयार होती हैं करोड़ों ‘सोना सरवन’ राखियां

Last Updated:August 21, 2026, 10:56 IST
Karauli Sona Sarvan Rakhi Patwa Family: करौली का पटवा परिवार चार पीढ़ियों से हाथ से ‘सोना सरवन’ या ‘बामन राखी’ बनाने की परंपरा को जिंदा रखे हुए है. यह राखी भाई के बजाय भगवान ठाकुरजी को चढ़ाने और पंडितों को बांधने के काम आती है. रक्षाबंधन से दो महीने पहले रुई और धागों से परिवार के सदस्य करोड़ों की संख्या में ये राखियां तैयार करते हैं. 10 रुपये प्रति लच्छा मिलने वाली यह राखी न सिर्फ करौली की धार्मिक आस्था का हिस्सा है बल्कि परिवार के लिए रोजगार का मुख्य जरिया भी है.
रक्षाबंधन के त्योहार के करीब आते ही बाजार रंग-बिरंगी और आकर्षक राखियों से सज जाते हैं. बाजार में आधुनिक डिजाइन और कई तरह की राखियां लोगों का ध्यान खींचती हैं, लेकिन राजस्थान की धार्मिक नगरी करौली में आज भी एक अनोखी पारंपरिक राखी की परंपरा जीवंत है. इस राखी का संबंध फैशन या आधुनिक चलन से नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा हुआ है. करौली में इस पारंपरिक राखी को ‘सोना सरवन’ या ‘बामन राखी’ के नाम से जाना जाता है. खास बात यह है कि इसे भाई की कलाई पर बांधने के बजाय भगवान की कलाई पर अर्पित किया जाता है. सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखती है और रक्षाबंधन के अवसर पर करौली की धार्मिक पहचान को और खास बना देती है.
करौली की इस पारंपरिक राखी को तैयार करने का काम एक पटवा परिवार करीब चार पीढ़ियों से करता आ रहा है. परिवार के सदस्य रक्षाबंधन से लगभग दो महीने पहले ही राखियां बनाने की तैयारी शुरू कर देते हैं. पर्व नजदीक आने तक परिवार दिन-रात मेहनत कर बड़ी संख्या में ‘सोना सरवन’ और ‘बामन राखी’ तैयार करता है. तैयार होने के बाद इन राखियों की करौली के स्थानीय बाजारों के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी आपूर्ति की जाती है. पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा न केवल परिवार की आजीविका का माध्यम बनी हुई है, बल्कि करौली की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़ी हुई है.
करौली में रक्षाबंधन के अवसर पर ‘सोना सरवन’ या ‘बामन राखी’ का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. इस पारंपरिक राखी का इस्तेमाल घरों के मंदिरों से लेकर विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिरों तक किया जाता है. श्रद्धालु इसे भगवान को अर्पित कर अपनी आस्था प्रकट करते हैं. स्थानीय परंपरा के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन इस राखी को पंडितों को भी बांधा जाता है. धार्मिक मान्यता और वर्षों पुरानी परंपरा के कारण त्योहार के दौरान इसकी मांग काफी बढ़ जाती है. यही वजह है कि रक्षाबंधन से पहले करौली में इस विशेष राखी को तैयार करने और बाजार तक पहुंचाने का काम तेज हो जाता है.
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पटवा परिवार के विष्णु पटवा बताते हैं कि उनके पूर्वज भी लंबे समय से इस पारंपरिक राखी को तैयार करते आ रहे हैं. उनके अनुसार, ‘सोना सरवन’ या ‘बामन राखी’ सामान्य राखियों से अलग है. इसका सीधा संबंध पूजा-पाठ, धार्मिक आस्था और वर्षों पुरानी परंपराओं से है. विष्णु पटवा के मुताबिक, करौली में आज भी बड़ी संख्या में परिवार रक्षाबंधन के अवसर पर अपने घरों में स्थापित देवी-देवताओं को यही राखी अर्पित करते हैं. पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा के चलते इस राखी की अपनी अलग पहचान बनी हुई है. आधुनिक दौर में राखियों के डिजाइन भले ही बदल गए हों, लेकिन करौली में धार्मिक आस्था से जुड़ी यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है.
‘सोना सरवन’ या ‘बामन राखी’ को तैयार करने की प्रक्रिया भी इसे दूसरी राखियों से अलग बनाती है. इसे मशीनों की मदद से नहीं, बल्कि रुई और धागे से हाथों से तैयार किया जाता है. राखी का आधार तैयार होने के बाद इसकी रंगाई की जाती है और फिर इन्हें अलग-अलग लच्छों के रूप में व्यवस्थित कर बाजार में बिक्री और आपूर्ति के लिए भेजा जाता है. पटवा परिवार के अनुसार, इस पारंपरिक राखी को तैयार करने में काफी मेहनत और समय लगता है. यही कारण है कि रक्षाबंधन से करीब दो महीने पहले ही इसका उत्पादन शुरू कर दिया जाता है. परिवार के कई सदस्य मिलकर लगातार राखियां तैयार करने में जुटे रहते हैं, ताकि त्योहार के समय बढ़ने वाली बाजार की मांग को समय पर पूरा किया जा सके. हाथों से तैयार होने और धार्मिक परंपरा से जुड़े होने के कारण इस राखी की अपनी अलग पहचान है. आधुनिक राखियों के बीच भी करौली की यह पारंपरिक राखी आज अपनी पुरानी पहचान और आस्था को बनाए हुए है.
विष्णु पटवा के अनुसार, उनके परिवार की ओर से हर साल ‘सोना सरवन’ या ‘बामन राखी’ का उत्पादन करोड़ों की संख्या में किया जाता है. करौली के घरों और मंदिरों में बड़े पैमाने पर इसके इस्तेमाल के चलते रक्षाबंधन का पर्व नजदीक आते ही इसकी मांग तेजी से बढ़ जाती है. रक्षाबंधन के आसपास इस पारंपरिक राखी की मांग लाखों की संख्या तक पहुंच जाती है. धार्मिक आस्था और वर्षों पुरानी परंपरा से जुड़ी होने के कारण करौली में आज भी बड़ी संख्या में लोग भगवान और पंडितों को यही राखी अर्पित करते हैं. यही वजह है कि पटवा परिवार के लिए रक्षाबंधन का सीजन सबसे व्यस्त समय में से एक होता है.
पटवा परिवार के मुताबिक, ‘सोना सरवन’ या ‘बामन राखी’ को बाजार में करीब 10 रुपये प्रति लच्छा के हिसाब से भेजा जाता है. वहीं, खुदरा बाजार में इसका एक पैकेट करीब 15 से 20 रुपये तक की कीमत में उपलब्ध होता है. कम कीमत में बिकने वाली इस पारंपरिक राखी की मांग रक्षाबंधन के दौरान काफी बढ़ जाती है. बड़ी संख्या में बिक्री होने के कारण यह पारंपरिक काम पटवा परिवार के लिए आज भी रोजगार का एक महत्वपूर्ण जरिया बना हुआ है. चार पीढ़ियों से चली आ रही इस कला और कारोबार को परिवार के सदस्य मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं. आधुनिक राखियों के बढ़ते चलन के बावजूद धार्मिक आस्था से जुड़ी इस राखी की मांग आज भी बनी हुई है.
पटवा परिवार की शकुंतला देवी बताती हैं कि इस पारंपरिक राखी को स्थानीय स्तर पर ‘बामन राखी’ के नाम से भी जाना जाता है. करौली में इसका इस्तेमाल खास तौर पर ठाकुरजी को अर्पित करने और रक्षाबंधन के अवसर पर पंडितों को बांधने के लिए किया जाता है. धार्मिक परंपरा से जुड़ी होने के कारण स्थानीय लोगों के बीच इसकी विशेष मान्यता है. शकुंतला देवी के अनुसार, इस राखी को तैयार करने में काफी मेहनत और समय लगता है. हर राखी को हाथों से तैयार किया जाता है, जिसके चलते इसके उत्पादन में परिवार के सभी सदस्यों की भूमिका रहती है. परिवार की महिलाएं भी इस पारंपरिक काम में बराबर सहयोग करती हैं और रक्षाबंधन से पहले बड़ी संख्या में राखियां तैयार करने में जुट जाती हैं. पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी परिवार के सदस्यों को रोजगार देने के साथ करौली की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.
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August 21, 2026, 10:56 IST



