सिगरेट पीने वालों की याददाश्त हो रही खराब? स्मोकिंग से डिमेंशिया पर क्या कह रही लेटेस्ट स्टडी

जो सिगरेट पीते हैं, वैसे तो उनको धूम्रपान करने के तमाम नुकसान पता होते हैं. उन्हें सबसे पहले तो ये ही पता होता है कि सिगरेट के धुएं से लंग कैंसर सबसे ज्यादा होता है, लेकिन क्या आपको ये पता है कि सिगरेट पीने से आपकी याददाश्त भी खराब हो सकती है? आप ऐसी बीमारी के शिकार हो सकते हैं, जिसमें आपको याद ही नहीं रहेगा कि आपने खाना भी खाया है या नहीं? कुछ देर पहले आपसे कौन मिला और आपके घर का रास्ता किस तरफ है?
स्मोकिंग को लेकर आए नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि सिगरेट पीने से सिर्फ फेफड़े ही खराब नहीं होते बल्कि यह दिमाग की याददाश्त को भी जल्दी खराब कर देता है. एक बड़े अमेरिकी अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जो लोग सिगरेट नहीं पीते और जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज नहीं होती, वे उन लोगों से लगभग 13 साल ज्यादा समय तक डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) से बचे रहते हैं, जो सिगरेट पीते हैं और बीपी-शुगर के मरीज हैं.
इस स्टडी में पाया गया कि 55 साल की उम्र के बाद 30 साल तक यानि करीब 85 साल की उम्र तक उन लोगों में डिमेंशिया या भूलने की बीमारी के कोई भी लक्षण दिखाई नहीं दिए जिन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी और जिन्हें हाई बीपी और डायबिटीज की परेशानी नहीं थी. जबकि दूसरी ओर जो स्मोकिंग करते थे और बीपी-शुगर या इनमें से किसी भी बीमारी से ग्रस्त से उनमें भूलने की बीमारी से बचने रहने की अवधि बस 17.5 साल ही थी. यानि उनके मुकाबले करीब आधी.
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक यह नतीजा अमेरिका के एक लंबे अध्ययन से निकला है, जिसमें 12,409 लोगों की 26 साल से ज्यादा समय तक मॉनिटरिंग की क्लोज गई. शोधकर्ताओं ने पाया कि सिर्फ धूम्रपान और बीपी-शुगर ही नहीं बल्कि जोखिम जितने ज्यादा होंगे, डिमेंशिया उतनी ही जल्दी मरीज को घेरेगा. इस दौरान बिना रिस्क वालों में 30 साल, सिर्फ एक जोखिम वाले लोगों में 26 साल, दो जोखिम वाले में 21 साल और तीनों वाले में सिर्फ 17.5 साल का औसत देखा गया.
उम्र बढ़ने पर बढ़ रही मुश्किल स्टडी में पता चला कि सिगरेट पीने वाले और तीनों जोखिम रखने वाले लोगों में डिमेंशिया होने का खतरा लगभग 2.7 गुना ज्यादा पाया गया. उम्र बढ़ने के साथ यह फर्क और बढ़ जाता है. 85 साल की उम्र तक बिना किसी जोखिम वाले 35 प्रतिशत लोग अभी भी डिमेंशिया से मुक्त थे, जबकि तीनों जोखिम वाले सिर्फ 7 प्रतिशत ही बचे थे.
WHO भी देता है सलाह विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कहता है कि हाई बीपी, डायबिटीज, सिगरेट और आलस जैसी आदतों को सुधारकर डिमेंशिया के लगभग 45 प्रतिशत खतरे को रोका जा सकता है या उसमें देरी लाई जा सकती है.
वहीं इस बारे में एम्स के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, न्यूरोलॉजी की चीफ प्रोफेसर मंजरी त्रिपाठी कहती हैं कि 40 की उम्र से ही ब्लड प्रेशर और शुगर कंट्रोल रखने की सलाह दी जाती है. लोगों को चाहिए कि वे सिगरेट और ज्यादा शराब से दूर रहें, वजन संतुलित रखें और रोज थोड़ा व्यायाम करें, इस दौरान योग निद्रा और कई प्राणायाम बेहतर असर दिखाते हैं. उन्होंने कहा कि अध्ययन साफ बताता है कि सिगरेट जैसी आदत को जल्दी छोड़ने से दिमाग लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है.



