वो क्रिकेटर, जो धर्म बदलकर भी बनाता रहा क्रॉस, 3 साल छिपाई मुस्लिम बनने की बात

नई दिल्ली. पाकिस्तान क्रिकेट का इतिहास जितना अपनी तेज गेंदबाजी और करिश्माई बल्लेबाजी के लिए जाना जाता है, उतना ही यह ड्रेसिंग रूम की राजनीति, गुटबाजी और धार्मिक चर्चाओं के विवादों से भी घिरा रहा है. दानिश कनेरिया जैसे खिलाड़ियों ने खुले तौर पर आरोप लगाए कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उनके साथ भेदभाव हुआ और दबाव का माहौल बना. हालांकि, इसी पृष्ठभूमि के बीच पाकिस्तान के सबसे कलात्मक और दिग्गज बल्लेबाजों में शुमार यूसुफ योहाना की कहानी बिल्कुल अलग और बेहद दिलचस्प मोड़ लेती है, जो आगे चलकर ‘मोहम्मद यूसुफ’ बने.
लाहौर के एक साधारण ईसाई परिवार में जन्मे यूसुफ योहाना (Yousuf Yohana) ने मार्च 1998 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जोहानिसबर्ग टेस्ट से इंटरनेशनल क्रिकेट में कदम रखा था. अपनी कलाई के जादू, गजब के टाइमिंग और धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी के दम पर वे बहुत जल्द पाकिस्तानी मिडिल ऑर्डर की मजबूत रीढ़ बन गए. वे पाकिस्तान क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व करने वाले गिने-चुने गैर-मुस्लिम खिलाड़ियों में से एक थे और मैदान पर अक्सर अपनी धार्मिक पहचान के तौर पर गले में क्रॉस पहने या शतक के बाद क्रॉस का निशान बनाते नजर आते थे.
मोहम्मद यूसुफ ने सईद अनवर के बहकावे में आकर इस्लाम कबूल किया.
सईद अनवर का प्रभाव और इस्लाम कबूलने का फैसलाइंटरनेशनल क्रिकेट में करीब 6 साल बिताने के बाद, साल 2004 में यूसुफ के जीवन में एक बड़ा मोड़ आया. टीम के पूर्व दिग्गज सलामी बल्लेबाज सईद अनवर (Saeed Anwar) , जो अपनी बेटी के निधन के बाद तबलीगी जमात से जुड़कर पूरी तरह धार्मिक जीवन की ओर मुड़ चुके थे, उनके जीवन से यूसुफ काफी प्रभावित हुए. यूसुफ ने बाद में स्पष्ट किया कि उन पर धर्म बदलने का कोई बाहरी दबाव नहीं था, बल्कि यह उनका अपना व्यक्तिगत निर्णय था. उन्होंने बताया कि सईद अनवर ने ही उन्हें कलमा पढ़वाया और इसके बाद उनकी मुलाकात मौलवी फहीम साहब से करवाई. इसके बाद यूसुफ योहाना ने अपना नाम बदलकर ‘मोहम्मद यूसुफ’ (Mohmmad Yousuf) कर लिया.
तीन साल तक दुनिया और परिवार से छिपा रहा सचयूसुफ के जीवन का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह रहा कि धर्म बदलने के बाद भी उन्होंने करीब तीन साल तक इस बात को दुनिया की नजरों से पूरी तरह छिपाए रखा. एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने खुलासा किया कि उन्होंने अपनी पत्नी, माता-पिता और करीबी रिश्तेदारों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी थी. लोकप्रिय क्रिकेटर होने के कारण वे खुलेआम मस्जिद में नमाज पढ़ने भी नहीं जा सकते थे, ताकि किसी को शक न हो. उन्हें सलाह दी गई थी कि सही वक्त आने से पहले इस बात का खुलासा न करें. यही वजह थी कि साल 2004 में इस्लाम कबूल करने के बावजूद वे मैदान पर सार्वजनिक रूप से पहले की तरह ही क्रॉस का निशान बनाते रहे.
जब बाद में यह सच सामने आया, तो शुरुआत में उनके माता-पिता काफी नाराज हुए और परिवार में गहरा तनाव पैदा हुआ. हालांकि, समय बीतने के साथ हालात बदले. उनकी पत्नी ने भी धार्मिक तालीम हासिल करने के बाद अपनी मर्जी से इस्लाम धर्म अपनाया. यूसुफ के मुताबिक, जब वे पहली बार हज यात्रा पर गए हुए थे, तब उनके पिता ने भी अपने देहांत से ठीक दस दिन पहले कलमा पढ़कर इस्लाम कबूल कर लिया था.
2006 में यूसुफ ने बनाया अटूट वर्ल्ड रिकॉर्डधार्मिक परिवर्तन के बाद मोहम्मद यूसुफ के बल्ले ने मैदान पर ऐसा तूफान खड़ा किया, जिसकी गूंज आज भी क्रिकेट रिकॉर्ड्स में सुनाई देती है. साल 2006 मोहम्मद यूसुफ के टेस्ट करियर का सबसे सुनहरा दौर साबित हुआ. इस एक कैलेंडर वर्ष में उन्होंने सिर्फ 11 टेस्ट मैचों में 99.33 की असाधारण औसत से 1788 रन ठोक डाले. इस दौरान उन्होंने 9 शतक और 3 अर्धशतक जमाए और वेस्टइंडीज के महान बल्लेबाज विवियन रिचर्ड्स (Vivian Richards) का 30 साल पुराना रिकॉर्ड (1710 रन) तोड़ दिया. एक कैलेंडर ईयर में सबसे ज्यादा टेस्ट रन बनाने का यह वर्ल्ड रिकॉर्ड आज तक कोई भी बल्लेबाज नहीं तोड़ पाया है.
शानदार आंकड़े, ड्रेसिंग रूम का विवाद और विदाईमैदान पर मोहम्मद यूसुफ का बल्ला जब भी बोला, रिकॉर्ड्स की झड़ी लग गई. अपने 90 मैचों के टेस्ट करियर में उन्होंने 52.29 की शानदार औसत से 7530 रन जुटाए, जिसमें 24 शतक और 33 अर्धशतक शामिल रहे. वहीं वनडे क्रिकेट के 288 मुकाबलों में उन्होंने 41.71 की औसत के साथ 9720 रन बनाए, जिसमें 15 शतक और 64 अर्धशतकीय पारियां दर्ज हुईं.
इतने शानदार रिकॉर्ड के बावजूद यूसुफ का करियर विवादों से अछूता नहीं रहा. मार्च 2010 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरे पर मिली करारी हार के बाद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने उन पर टीम में गुटबाजी करने और माहौल खराब करने का आरोप लगाते हुए अनिश्चितकाल के लिए बैन लगा दिया. आहत होकर यूसुफ ने इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास का ऐलान कर दिया. हालांकि, जुलाई 2010 में इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में पाकिस्तानी टीम की करारी शिकस्त के बाद पीसीबी ने उन्हें फिर से टीम में वापस बुलाया. 2010 के उसी इंग्लैंड दौरे पर मोहम्मद यूसुफ ने अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेला और इसके बाद क्रिकेट के इस महान और विवादित अध्याय पर हमेशा के लिए विराम लग गया.



