सचिन पायलट को जन्मदिन से पहली मिली बड़ी जिम्मेदारी, क्या यह राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले उनका ‘लिटमस टेस्ट’ है?

जयपुर. आज सचिन पायलट का जन्मदिन है. कांग्रेस संगठन में 2 दिन पहले ही हुए बड़े फेरबदल में राजस्थान के दिग्गज युवा नेता सचिन पायलट को पंजाब प्रभारी की बड़ी और अहम जिम्मेदारी दी गई है. सचिन पायलट कांग्रेस के भरोसमंद, ‘ऊर्जावान’, ‘साफ सुथरी छवि वाले और युवाओं के बीच ‘लोकप्रिय’ नेता हैं. ‘क्राउड पुलर’ की छवि वाले सचिन पायलट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं. उनके पास इससे पहले छत्तीसगढ़ का प्रभार था. लेकिन अब उन्हें गुटबाजी की भेंट चढ़ रहे पंजाब का प्रभार दिया गया है. पायलट को पार्टी ने उनको यह जिम्मेदारी उनके 49वें जन्मदिन से 2 दिन पहले पार्टी की तरफ उनको बड़ा तोहफा है और बड़ी चुनौती दोनों हैं.
सचिन पायलट साल 2018 से राजस्थान में सीएम पद के तगड़े दावेदार रहे हैं. इसे चाहे किस्मत का खेल मानें या फिर सियासी समीकरण. पार्टी के सत्ता में आने के बाद भी साल 2018 में सीएम की कुर्सी उनके हाथ नहीं आई. राजनीति के जादूगर माने जाने वाले पार्टी के भीतर उनके प्रतिद्वंदी अशोक गहलोत की सियासी बिसात के आगे पायलट की एक नहीं चली. तमाम तरह की मशक्कत के बाद उनको अनमने होकर डिप्टी सीएम पद से संतोष करना पड़ा. लेकिन यह उनकी मंजिल नहीं थी. लिहाजा कुछ समय बाद ही वे कुर्सी का मोह का त्याग कर अपने समर्थक विधायकों के साथ मानेसर जा बैठे. उसके बाद जो हुआ पूरे देश ने देखा.
पायलट को पीसीसी चीफ और डिप्टी सीएम दोनों पदों से हाथ धोना पड़ा थागहलोत और पायलट की इस सियासी जंग में भी गहलोत बाजी मार ले गए. नतीजा यह हुआ कि पायलट को डिप्टी सीएम और प्रदेश अध्यक्ष दोनों पदों से हाथ धोना पड़ गया. राजस्थान में कांग्रेस पायलट के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए सत्ता में आई थी. पार्टी को सत्ता में लाने का श्रेय भी काफी हद तक उनको दिया गया लेकिन राजनीतिक समीकरणों ने उनका साथ नहीं दिया. हालांकि बाद में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व उनको सीएम की कुर्सी उनको सौंपने का मेगा प्लान बनाया था. लेकिन वह भी गहलोत की जादूगरी के आगे फेल हो गया.
हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन राजस्थान की सियासत की रवायत हैआखिरकार पार्टी ने पायलट की क्षमता और जनमानस पर पकड़ को देखते हुए फिर संगठन में बतौर राष्ट्रीय महासचिव मौका दिया. लेकिन जैसा कि राजस्थान की सियासत की रवायत है कि हर पांच साल में यहां सत्ता परिवर्तन होता है. वैसा ही 2023 के चुनावों में हुआ. कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और पायलट का इंतजार फिर बढ़ गया. इसकी वजह गहलोत और पायलट की राजनीतिक जंग को माना गया. लेकिन अब फिर राजस्थान विधानसभा चुनावों की तरफ बढ़ रहा है. बीजेपी की भजनलाल सरकार 32 महीने पूरे कर लिए हैं. राजस्थान की सियासी फितरत को देखते हुए कांग्रेस फिर से सत्ता में आने के सपने देख रही है. इस बात को कांग्रेस के नेता भी अपने भाषणों में कहते रहते हैं कि कुछ समय की बात है फिर सत्ता उनके हाथ में होगी.
कांग्रेस को पायलट की चुनौतियों को स्वीकार करने की क्षमता पर भरोसा है
इसी के मद्देनजर राजस्थान का सीएम कैसा हो ‘अशोक गहलोत’ और ‘सचिन पायलट’ जैसा हो के नारे फिजाओं में गूंजने लगे हैं. इन नारों पर गहलोत हल्की मुस्कान बिखरते हैं तो पायलट खफा होते हैं. राजस्थान के पड़ोसी राज्य पंजाब में कांग्रेस संगठन में गुटबाजी के हालात में पायलट को पार्टी ने उनको वहां का जिम्मा सौंपा गया है. पंजाब में अगले साल चुनाव होने हैं. उससे पहले पार्टी को वहां पटरी पर लाना है. ऐसे हालात में पंजाब की जिम्मेदारी पायलट को सौंपने के कई मायने हैं. यह पार्टी का पायलट के प्रति उसके गहरे ‘भरोसे’ को दिखाता है. यह पायलट की चुनौतियों को स्वीकार करने की क्षमता पर भरोसा है.
यह जिम्मेदारी पायलट को पार्टी के संकटमोचक के फ्रेम में भी ढालती हैराजनीति के जानकारों के अनुसार यह जिम्मेदारी पायलट को पार्टी के ‘संकटमोचक’ के फ्रेम में भी ढालती है. पार्टी का पायलट पर ‘ट्रस्ट’ उनके भविष्य की राह को खोलने वाला है. पायलट को यह दी गई राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पंजाब में संगठन को एकजुट करने की बड़ी चुनौती है. राजस्थान में भी कांग्रेस पंजाब की तरह गुटबाजी की शिकार है. भले ही कांग्रेस एकजुटता के लाख दावे करे लेकिन राजस्थान में आज भी कांग्रेस पायलट और गहलोत खेमों में बंटी हुई है. यह सब गाहे बगाहे सामने आता रहता है.
राजस्थान में उनकी तगड़ी दावेदारी के साथ ही वापसी के संकेत भी माना जा रहा हैराजनीतिक विश्लेषक पायलट को दी गई पंजाब की जिम्मेदारी को राजस्थान में उनकी तगड़ी दावेदारी के साथ ही वापसी के संकेत भी मान रहे हैं. पार्टी पंजाब के जरिये उनके राजनीतिक कौशल को फिर से परख का उनको उदाहरण के तौर पर संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच रखना चाह रही है. इसके साथ ही गहलोत गुट को भी सियासी संकेत दिए जा रहे हैं. पंजाब की जिम्मेदारी उनकी राजस्थान की राजनीति में नींव को और गहरा करने का प्रयास माना जा रहा है. यह दीगर बात है कि वक्त और हालात कैसे रहते हैं? पायलट पंजाब को पटरी पर लाकर सत्ता की रेस की शामिल कर पाते हैं या नहीं?
पायलट पूनिया के राजनीतिक दांव पेंच को अन्य नेताओं के मुकाबले बेहतर समझते हैंबीजेपी ने भी हाल ही में पंजाब की जिम्मेदारी राजस्थान बीजेपी के दिग्गज नेता सतीश पूनिया को सौंपी है. पूनिया भी राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं. एक समय था जब पायलट और पूनिया दोनों राजस्थान में अपनी-अपनी पार्टियों के अध्यक्ष थे. लिहाजा पायलट पूनिया के राजनीतिक दांव पेंच को अन्य नेताओं के मुकाबले बेहतर समझते हैं. अब फिर दोनों दिग्गज पंजाब में बतौर प्रभारी एक दूसरे के आमने-सामने हैं. ऐसे में दोनों के लिए पंजाब बड़ी चुनौती है. बहरहाल पायलट के लिए पंजाब एक चुनौती के साथ ही उनके रणनीतिक कौशल का परीक्षण भी है. इसका परिणाम क्या होगा यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है.



