Health

डॉक्‍टर से भी पहले, अब कुत्ते सूंघ लेंगे कैंसर? ताजा र‍िसर्च पर क्‍या कहते हैं वैज्ञानिक

कोई प्राकृति आपदा हो या फ‍िर कोई और खतरा, जानवर अक्‍सर इंसान से पहले खतरे को भांप लेते हैं. वहीं बात कुत्ते की करें तो उसकी सूंघने की शक्‍ति को देखते हुए ही उसे मिलेट्री और पुल‍िस में भर्ती क‍िया जाता है. लेकिन एक ताजा र‍िसर्च का दावा है कि कुत्ते स‍िर्फ चीजें ही नहीं बल्‍कि अब इंसान की बीमारी भी सूंघ सकते हैं. ये दावा है बेंगलुरु के पास एक रिसर्च सेंटर का, ज‍िनकी नई स्‍टडी यही दावा करती है.

सोच‍िए एक लैब में कुत्ते कुछ सैंपल सूंघ रहे हैं. तभी एक सैंपल को देखकर कुत्ता भौंकता है और डॉक्‍टर इसकी जांच करते हैं. इस लैब में लोगों के एक्‍सप्रेशन तब चेंज हो जाते हैं, जब डॉक्‍टर कहता है कि ‘हां, यही कैंसर वाला सेंपल है.’ सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है. लेकिन इस अध्‍ययन में ऐसा ही हुआ है. इसके पीछे का विज्ञान काफी दिलचस्प है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि कैंसर होने पर शरीर कुछ खास तरह के रासायनिक यौगिक छोड़ता है. इन्हें इंसानी नाक नहीं पहचान पाती. लेकिन कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों से कई गुना ज्यादा तेज होती है. इसल‍िए वे विस्फोटक, ड्रग्स और यहां तक कि कुछ बीमारियों के संकेत भी पकड़ सकते हैं. कई स्‍टडीज में पाया गया है कि प्रशिक्षित कुत्ते सांस, पसीने या मूत्र के नमूनों में मौजूद गंध के फर्क को पहचान सकते हैं.

(AI Generated Photo)

बेंगलुरु के स्‍टार्टअप ने क्‍या खोजा?

भारतीय स्टार्टअप Dognosis ने कुत्तों की सूंघने की क्षमता को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ जोड़ने की कोशिश की है. इस प्रोसेस में व्यक्ति करीब 10 मिनट तक एक कॉटन मास्क में सांस लेता है. फिर उस मास्क को लैब में भेजा जाता है. वहां प्रशिक्षित कुत्ते उस नमूने को सूंघते हैं. उनके शरीर की गतिविधियां, सांस लेने का तरीका और प्रतिक्रिया सेंसर की मदद से रिकॉर्ड की जाती है. बाद में AI इन स‍िग्‍नल्‍स को एनलाइज करता है. यानी छोटा सा मास्क, कुछ मिनट की सांस और फिर जांच शुरू.

ये र‍िसर्च तो बेहद काम की है, लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है. कंपनी का दावा है कि कर्नाटक के छह अस्पतालों में 1,500 से ज्यादा लोगों पर किए गए अध्ययन में इस तकनीक ने सात तरह के कैंसर की पहचान में 90 प्रतिशत से ज्यादा सटीकता दिखाई. आंकड़े तो कहते हैं कि इस तरह की र‍िसर्च पर काफी हद तक भरोसा क‍िया जा सकता है. हालांकि ये मानवीय जीवन और मेड‍िकल जांच से जुड़ा मामला है. ऐसे में इस व‍िषय पर और टेस्‍ट‍िंग की जरूरत है. क्योंकि शुरुआती नतीजे अच्छे होना और तकनीक का रोजमर्रा की मेडिकल जांच में इस्तेमाल होना, दोनों अलग बातें हैं.

लेकिन अगर इस तरह की र‍िसर्च सही साबित होती हैं, या ज्‍यादा प्रामाण‍िक होती हैं तो ये कल्‍पना की जा सकती है कि भविष्य में अस्पतालों में “कैंसर स्निफर डॉग” नजर आने लगें. विशेषज्ञों का कहना है कि कुत्तों की क्षमता बेहद दिलचस्प जरूर है, लेकिन उन्हें बड़े पैमाने पर मेडिकल स्क्रीनिंग सिस्टम में शामिल करना आसान नहीं होगा. ट्रेनिंग, देखभाल और लगातार एक जैसी सटीकता बनाए रखना बड़ी चुनौती है. लेकिन असल में ऐसी र‍िसर्च के जर‍िए वैज्ञानिक उन रासायनिक संकेतों को समझना चाहते हैं जिन्हें कुत्ते पहचान लेते हैं. अगर उन संकेतों की पहचान हो गई, तो भविष्य में ऐसी मशीनें बन सकती हैं जो कुत्तों जैसी संवेदनशीलता के साथ कैंसर का पता लगा सकें.

यानी कुत्ते कैंसर की गंध पहचान सकते हैं या नहीं, इसका जवाब अभी हां या न में तो नहीं द‍िया जा सकता, लेकिन ये र‍िसर्च इस जट‍िल बीमारी की स्‍क्रीनिंग में मददगार जरूर हो सकती है. यानी इंसानों का ये ‘बेस्‍ट फ्रेंड’ हो सकता है उनकी मेड‍िकल जर्नी में भी मददगार साबित हो.

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