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BRICS का पावरफुल मोमेंट, पीएम मोदी ने ऐसे थामा पेजेशकियान का हाथ, ट्रंप के दिल में जाकर चुभेगी ये तस्वीर

ब्रिक्स से ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है. इस वायरल फ्रेम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान का हाथ बड़े ही गर्मजोशी से थामकर आगे बढ़ रहे हैं. उनके ठीक बगल में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा भी कंधे से कंधा मिलाकर चलते नजर आ रहे हैं. ये तस्वीर सिर्फ एक दोस्ताना मुलाकात भर नहीं है, बल्कि जंग के मैदान पर अमेरिका का जवाब है. जिस ईरान को अमेरिका अलग-थलग करने की कोशिश में लगा है और जिस ब्रिक्स संगठन ट्रंप टैरिफ वॉर की चेतावनी दे रहे थे, उसी मंच पर भारत ने ईरान का हाथ थामकर दुनिया को तगड़ा मैसेज दिया है.

ब्रिक्स का वो खास पल: जब पीएम मोदी ने थामा ईरान के राष्ट्रपति का हाथ

ब्रिक्स भारत 2026 के ऑफिशियल बैकड्रॉप के सामने खींची गई ये तस्वीर इस वक्त सोशल मीडिया से लेकर इंटरनेशनल मीडिया में छाई हुई है. फोटो में साफ देखा जा सकता है कि पीएम मोदी बेहद सहज अंदाज में मुस्कुराते हुए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान का हाथ अपने हाथ में थामे हुए हैं. पेजेशकियान के चेहरे पर भी एक बड़ी सी मुस्कान है.

डिप्लोमेसी की दुनिया में बॉडी लैंग्वेज का बहुत बड़ा मतलब होता है. जब दो बड़े देशों के नेता इस तरह खुलेआम हाथ में हाथ डालकर चलते हैं, तो ये दिखाता है कि उनके बीच का रिश्ता सिर्फ औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं है. ये भरोसा और गहरी पर्सनल केमिस्ट्री का प्रतीक है. दुनिया को ये संदेश जा चुका है कि भारत अपने दोस्तों के साथ हर स्थिति में मजबूती से खड़ा रहता है.

वाशिंगटन से लेकर ट्रंप तक मचेगी खलबली: क्यों चुभेगा ये फ्रेम?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि जो भी देश ब्रिक्स का हिस्सा बनकर डॉलर को चुनौती देंगे या अमेरिका विरोधी रुख अपनाएंगे, उन पर 100 फीसदी का कड़ा टैरिफ लगाया जाएगा. इतना ही नहीं, जंग के बीच अमेरिका और पश्चिमी देश लगातार ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसे पूरी तरह अलग-थलग करने में जुटे हैं.

ऐसे में दिल्ली के मंच से आई ये तस्वीर वाशिंगटन के नीति निर्माताओं और ट्रंप कैंप के लिए एक बड़ा झटका है. पीएम मोदी का ईरान के राष्ट्रपति का हाथ थामना ये दिखाता है कि भारत किसी भी तीसरे देश के दबाव या धमकी में आकर अपने रिश्ते तय नहीं करता. अमेरिका चाहे जितना दबाव बना ले, भारत अपनी जरूरत और अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से अपने फैसले खुद लेता है.

पुतिन, रामाफोसा और मोदी की वॉक: नए ग्लोबल ऑर्डर की पावरफुल झलक

तस्वीर में सिर्फ मोदी और पेजेशकियान ही नहीं, बल्कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा का अंदाज भी देखने लायक है. ब्लैक सूट में पुतिन मुस्कुराते हुए पीएम मोदी और रामाफोसा की तरफ देख रहे हैं. चारों बड़े नेता एक साथ एक ही फ्रेम में आगे बढ़ रहे हैं.

ये वॉक ‘ग्लोबल साउथ’ और उभरती हुई नई वैश्विक ताकतों के एकजुट होने का सबसे बड़ा सबूत है. ब्रिक्स का ये पावरफुल मोमेंट दिखाता है कि अब दुनिया का पावर सेंटर बदल रहा है. पश्चिमी देशों का जो एकतरफा दबदबा अब तक चला आ रहा था, उसे ये तस्वीर सीधे तौर पर चुनौती दे रही है.

चाबहार पोर्ट से लेकर INSTC तक: भारत और ईरान के रिश्तों की नई इबारत

भारत और ईरान के बीच की ये नजदीकी हवा में नहीं है, बल्कि इसके पीछे बहुत बड़े रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं. ईरान भारत के लिए मध्य एशिया और रूस तक पहुंचने का सबसे बड़ा दरवाजा है.

चाबहार पोर्ट का मास्टरप्लान: भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है. इसके जरिए भारत बिना पाकिस्तान गए सीधे अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक अपना सामान भेज सकता है.
INSTC कॉरिडोर: 7,200 किलोमीटर लंबा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत को समंदर और रेल नेटवर्क के जरिए सीधे रूस से जोड़ता है. इस पूरे रास्ते में ईरान सबसे अहम कड़ी है.
सस्ते तेल और गैस की सप्लाई: ईरान के साथ बेहतर रिश्ते भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बेहद जरूरी हैं.
जब लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे समुद्री रास्तों पर युद्ध का तनाव बना हुआ है, तब ईरान के साथ भारत की ये पार्टनरशिप व्यापार को सुरक्षित और आसान बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हो जाती है.

टैरिफ वॉर और पाबंदियों के बीच ब्रिक्स का कड़ा संदेश

पश्चिमी देश अक्सर रूस और ईरान को अलग-थलग करने के लिए नए-नए बैन लगाते रहते हैं. लेकिन ब्रिक्स का ये मंच साबित कर रहा है कि इन पाबंदियों का असर अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है.

ब्रिक्स देश अब आपस में अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार करने पर जोर दे रहे हैं. इसके अलावा, डिजिटल करेंसी और फास्ट पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने पर काम चल रहा है. जब भारत, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे बड़े देश एक साथ मिलकर अपनी-अपनी करेंसी में व्यापार करेंगे, तो अमेरिका के डॉलर की दादागीरी अपने आप कमजोर होने लगेगी. यही बात अमेरिका और उसके सहयोगियों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है.

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