10 दिनों तक हर दिन नया रूप धारण करते हैं भगवान, जैन मंदिरों में होने वाली आंगी सजावट है खास

Last Updated:September 12, 2026, 15:35 IST
Jain Mandir News: पर्युषण पर्व जैन समाज का प्रमुख धार्मिक पर्व है, जिसमें मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और भगवान का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है. इस दौरान कई जैन मंदिरों में रोजाना अलग-अलग थीम और सामग्री से आंगी सजाई जाती है. भगवान की प्रतिमा को फूलों, वस्त्रों और अन्य सजावटी सामग्री से नया रूप दिया जाता है. आंगी की यह परंपरा श्रद्धा, कला और धार्मिक भावनाओं का सुंदर संगम मानी जाती है.
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जालौर: पर्युषण पर्व जैन धर्म का प्रमुख पर्व माना जाता है. आठ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में जैन मंदिरों में पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों के साथ भगवान की प्रतिमाओं की विशेष अंगरचना यानी आंगी भी की जाती है. इन आठ दिनों में भगवान को हर दिन अलग-अलग आंगी से सजाया जाता है. यही वजह है कि पर्युषण के दौरान मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को हर दिन भगवान का नया स्वरूप देखने को मिलता है.
भगवान की आंगी तैयार करने की प्रक्रिया भी अपने आप में खास होती है। कई जगहों पर आंगी को सोने और चांदी से सजाया जाता है. वहीं कई मंदिरों में भगवान की प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए आंगी सीधे प्रतिमा पर तैयार नहीं की जाती, बल्कि पहले चांदी के ढांचे पर इसकी रचना की जाती है. इस ढांचे पर चंदन के बुरादे से आधार तैयार किया जाता है. इसके बाद बेहद बारीकी से मोती, चांदी और सोने की बर्फ जैसी सजावटी सामग्री से आंगी को सजाया जाता है. आंगी की सबसे खास बात इसकी अनोखी परंपरा है. आठ दिनों में जिस दिन जो आंगी बनाई जाती है, उसे दोबारा उसी रूप में रिपीट नहीं किया जाता. यानी हर दिन की अंगरचना अपने आप में अलग होती है. एक बार इस्तेमाल की गई सजावटी सामग्री को भी दोबारा उपयोग में नहीं लिया जाता.
पुरानी कला और कारीगरी को भी दर्शातीसंगीतकार सुजल मेहता ने लोकल18 को जानकारी देते हुए बताया कि पर्युषण पर्व के दौरान भगवान की अलग-अलग आंगी देखने को मिलती है. इसकी सबसे खास बात यह है कि हर दिन की अंगरचना अलग होती है और एक बार जो श्रृंगार हो जाता है, उसे दोबारा उसी तरह नहीं बनाया जाता. सोने-चांदी, मोतियों और दूसरी सजावटी सामग्री से की गई यह रचना देखने में बेहद सुंदर लगती है. यह परंपरा श्रद्धा के साथ-साथ हमारी पुरानी कला और कारीगरी को भी दर्शाती है.
भगवान के आठ अलग-अलग स्वरूपआंगी तैयार करते समय प्रतिमा की सुरक्षा का भी विशेष ध्यान रखा जाता है. चांदी के ढांचे पर अंगरचना तैयार करने का उद्देश्य यही होता है कि आंगी को प्रतिमा पर आसानी से लगाया और हटाया जा सके तथा भगवान की प्रतिमा को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे. पर्युषण के आठ दिनों में हर दिन बदलता भगवान का श्रृंगार श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है. एक दिन की आंगी हटने के बाद अगले दिन फिर नई अंगरचना तैयार होती है. इस तरह आठ दिनों में भगवान के आठ अलग-अलग स्वरूप नजर आते हैं.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Jalor,Rajasthan
First Published :
September 12, 2026, 15:35 IST



