75 मीटर चौड़ी नहर पर 100 मिनट में पुल तैयार, भारत के टैंकों अब कोई नदी नहीं रोक सकती, जानें क्या है ‘सर्वत्र’

नई दिल्ली: युद्ध के मैदान में एक पुराना नियम चलता है कि जमीन ही रणनीति तय करती है. दुश्मन की सीमाओं में घुसते वक्त सबसे बड़ी चुनौती पानी की रुकावटें होती हैं. जब भारी टैंक आगे बढ़ते हैं, तब गहरी नदियां और चौड़ी नहरें उनकी रफ्तार छीन लेती हैं. दुश्मन हमेशा इन जल बाधाओं के पीछे तोपें लगाकर बैठता है. अगर सेना वहां फंस गई, तो उसे भारी नुकसान उठाना पड़ता है. भारतीय सेना ने अपनी बख्तरबंद ब्रिगेड की रफ्तार बनाए रखने के लिए सर्वत्र ब्रिज सिस्टम को मैदान में उतारा है. यह सिस्टम मिनटों में विशाल नदियों और पक्की नहरों पर मजबूत पुल तैयार कर देता है. इससे टी-90 और अर्जुन जैसे 70 टन वजनी टैंक बिना रुके सीधे आगे निकल जाते हैं.
इतिहास गवाह है कि किसी भी जंग का रुख वहां का भूगोल तय करता है. जब 1971 का युद्ध शुरू हुआ, तब पूर्वी मोर्चे पर बांग्लादेश की जमीन भारतीय सेना के लिए बहुत मुश्किल थी. वहां चारों तरफ फैली नदियां किसी सुरक्षा दीवार की तरह खड़ी थीं. इन नदियों को पार करना आसान नहीं था. भारतीय सेना ने बहुत कम दिनों में ढाका तक अपनी दौड़ पूरी की. यह सब सिर्फ सटीक प्लानिंग और तेज रफ्तार मूवमेंट की वजह से संभव हुआ. भारतीय सैनिकों ने तब हेलिकॉप्टरों की मदद से नदियों को हवा में ही लांघ लिया था. इसके अलावा पीटी-76 एंफिबियस टैंकों ने पानी में तैरकर दुश्मन के होश उड़ा दिए थे.
प्राकृतिक बनावट को हमेशा एक ताकत बढ़ाने वाले हथियार की तरह देखा जाता है. जब ग्रीक राजा लियोनिडास ने थर्मोपाइली के संकरे दर्रे में जंग लड़ी थी, तब छोटी सी सेना ने लाखों की फारसी फौज को रोके रखा था. यह करिश्मा सिर्फ उस संकरी जमीन की वजह से हुआ था. दुनिया भर की सेनाओं में इसी वजह से कॉम्बैट इंजीनियर्स की एक खास टुकड़ी होती है. यह टुकड़ी दुश्मन के रास्ते में रोड़े अटकाती है. वहीं अपनी सेना के लिए मुश्किल रास्तों को आसान बना देती है.
बख्तरबंद टुकड़ियों की तूफानी रफ्तार दुश्मन को कैसे घुटनों पर लाती है?
सैन्य रणनीति में गतिशीलता ही सबसे बड़ा हथियार मानी जाती है. पुराने जमाने में जो काम घोड़ों की टुकड़ियां करती थीं, आज वही काम बख्तरबंद टैंक करते हैं. जब टैंक तेजी से दुश्मन के इलाके में घुसते हैं, तब दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता. दूसरे विश्व युद्ध के शुरुआती दौर में जर्मनी के ब्लिट्जक्रीग ने इसी रफ्तार से तहलका मचाया था. जर्मन सेना ने पोलैंड और फ्रांस के बड़े इलाकों को देखते ही देखते अपने कब्जे में ले लिया था. हाल के दशकों में हुए खाड़ी युद्धों में भी यही ताकत दिखी थी. अमेरिकी सेना के टैंकों ने रेगिस्तान में तेज रफ्तार से आगे बढ़कर इराकी मोर्चों को पूरी तरह तबाह कर दिया था. जब टैंक तेजी से आगे बढ़ते हैं, तो वे दुश्मन की सप्लाई लाइन काट देते हैं.
दुश्मन सेना की चाल बिगाड़ने के लिए रुकावटें कैसे रची जाती हैं?
सैन्य बाधाएं मुख्य रूप से दो तरह की होती हैं. पहली कुदरती रुकावटें और दूसरी इंसानों द्वारा बनाई गई बाधाएं. इन रुकावटों का मकसद विरोधी सेना की रफ्तार को धीमा करना या उसे पूरी तरह रोकना होता है. कॉम्बैट इंजीनियर्स यानी सैपर्स इन रुकावटों को बहुत सोच-समझकर डिजाइन करते हैं. वे इन्फैंट्री और तोपखाने के साथ मिलकर ऐसा जाल बिछाते हैं, जिससे दुश्मन सीधे उनके निशाने पर आ जाए.
रणनीतिक तौर पर बाधाओं के चार बड़े मकसद होते हैं.
पहला मकसद होता है डिसरप्ट करना. इसमें आगे बढ़ रही दुश्मन सेना की बनावट बिखर जाती है. बिखरी हुई टुकड़ियों को अलग-अलग करके मारना बहुत आसान हो जाता है.
दूसरा मकसद फिक्स करना होता है. दुश्मन की रफ्तार धीमी पड़ जाती है, जिससे तोपखाना उस पर सटीक गोले बरसा सके.
तीसरा मकसद टर्न करना होता है. दुश्मन को एक ऐसे रास्ते पर मोड़ा जाता है, जहां पहले से घात लगाकर हमारे हथियार तैनात होते हैं.
चौथा मकसद ब्लॉक करना होता है. इस रास्ते पर आगे बढ़ने का कोई चांस नहीं बचता. इन चारों तरीकों से मिलकर एक ऐसा घेरा बनता है, जिसे तोड़ना लगभग नामुमकिन होता है.
पानी की बाधाएं इतिहास के सबसे बड़े जनरलों के लिए सिरदर्द क्यों बनीं?
इतिहास में पानी की रुकावटों ने बड़े-बड़े अभियानों का दम निकाला है. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों ने ऑपरेशन मार्केट गार्डन शुरू किया था. उनका मकसद राइन नदी पर बने पुलों पर कब्जा करना था. अगर वे इन पुलों को पार कर लेते, तो युद्ध महीनों पहले खत्म हो जाता. लेकिन आर्नहेम के आखिरी पुल पर कब्जा नहीं हो सका. नतीजा यह हुआ कि मित्र देशों को राइन नदी पार करने में छह महीने और लग गए. तब तक जर्मनी बुरी तरह कमजोर हो चुका था, फिर भी पानी की बाधा ने सेना को रोक दिया था.
इसके उलट 1973 के योम किप्पुर युद्ध में मिस्र की सेना ने कमाल कर दिखाया था. इजरायल ने स्वेज नहर के किनारे बार-लेव नाम की बहुत ऊंची बालू की दीवार बना रखी थी. मिस्र के सैनिकों ने हाई प्रेशर वॉटर कैनन से उस दीवार को कुछ ही घंटों में बहा दिया. यह इतिहास का सबसे साहसी वाटर क्रॉसिंग ऑपरेशन माना जाता है. भारत ने भी 1971 में मेघना नदी को सीधे हेलिकॉप्टर से पार किया था. सैनिकों को सीधे नदी के पार उतार दिया गया, जिससे दुश्मन की सारी प्लानिंग धरी रह गई.
पंजाब और जम्मू बॉर्डर पर भारत के सामने कैसी चुनौतियां हैं?
अगर हम भारत की सीमाओं की बात करें, तो पंजाब और जम्मू का इलाका नहरों और नदियों से भरा पड़ा है. यहां दुश्मन ने पानी की बाधाओं के आसपास मजबूत डिफेंस सिस्टम बना रखा है. पाकिस्तान की तरफ बमबांवाली-रावी-बेदियां यानी इचोगिल नहर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यह नहर लगभग 45 मीटर चौड़ी है और सीधे लाहौर की रक्षा करती है. इस नहर तक पहुंचने से पहले हमारी सेना को बारूदी सुरंगों के घने जाल से निपटना होगा. सुरंगों को पार करने के बाद पानी की चौड़ी रुकावट सामने खड़ी होती है.
इस पानी के पार दुश्मन बंकरों में तोपें लेकर तैनात रहता है. जब कोई सेना पानी पार करने की कोशिश करती है, तो उसे एक संकरे पॉइंट पर जमा होना पड़ता है. इसे बॉटलनेक कहा जाता है. इस संकरे रास्ते पर दुश्मन के लिए हमला करना बहुत आसान हो जाता है. वह अपने इलाके में बैठा होता है, इसलिए तुरंत अतिरिक्त कुमक बुला सकता है. ऐसे में हमला करने वाली सेना के लिए समय बहुत कीमती होता है. अगर पुल बनाने में देरी हुई, तो पूरा हमला नाकाम हो सकता है. इसलिए सेना को ऐसी तकनीक चाहिए, जो पलक झपकते ही नहर पर मजबूत पुल खड़ा कर दे.
सर्वत्र ब्रिज सिस्टम किस तरह भारतीय सेना का सबसे बड़ा मददगार बना?
भारतीय सेना की इस गंभीर जरूरत को पूरा करने के लिए स्वदेशी सर्वत्र ब्रिज सिस्टम बनाया गया है. यह पूरी तरह भारत में बना एक मोबाइल मल्टी-स्पैन ब्रिज सिस्टम है. इसे बीईएमएल के 8×8 हेवी मोबिलिटी व्हीकल पर माउंट किया गया है. इसका मतलब यह है कि यह भारी गाड़ी कच्चे, पथरीले और दलदली रास्तों पर भी आसानी से दौड़ सकती है. युद्ध के मैदान में टैंकों के साथ कदमताल मिलाने के लिए इसका तेज होना बेहद जरूरी था.
सर्वत्र ब्रिज की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबाई और जोड़ने का तरीका है. यह 15 मीटर के हिस्सों में आगे बढ़ता है. इसके पांच हिस्सों को जोड़कर 75 मीटर लंबा पुल बनाया जा सकता है. पूरे 75 मीटर लंबे पुल को तैयार करने में मुश्किल से 100 मिनट का वक्त लगता है. अगर सिर्फ 15 मीटर का एक हिस्सा लगाना हो, तो यह काम महज 20 मिनट में पूरा हो जाता है. इचोगिल जैसी 45 मीटर चौड़ी नहर पर पुल बनाने के लिए इसके तीन हिस्से ही काफी हैं. इसका मतलब यह हुआ कि भारतीय सेना एक घंटे के अंदर उस नहर पर पुल खड़ा कर सकती है.
क्या यह स्वदेशी पुल हमारे सबसे भारी अर्जुन टैंक का वजन झेल पाएगा?
सर्वत्र ब्रिज की ताकत का अंदाजा इसकी लोड कैपेसिटी से लगाया जा सकता है. इसे 70 टन क्लास के ट्रैफिक के लिए डिजाइन किया गया है. भारतीय सेना का मुख्य युद्धक टैंक टी-90 भी इसके ऊपर से पूरी रफ्तार में निकल सकता है. यही नहीं, सेना में शामिल होने जा रहा सबसे भारी अर्जुन एमके-1ए टैंक भी इस पर आसानी से दौड़ सकता है. अर्जुन टैंक का वजन करीब 68 टन है. दुनिया के बहुत कम मोबाइल ब्रिज ऐसे हैं, जो 68 टन के भारी भरकम टैंक का वजन सह सकें.
इस सिस्टम में बहुत आधुनिक हाइड्रोलिक्स का इस्तेमाल किया गया है. इसमें मल्टी-स्टेज टेलीस्कोपिक लेग्स लगे हैं, जो पानी के भीतर किसी भी गहराई पर खुद लॉक हो जाते हैं. इसके डबल ए-शेप वाले ढांचे की वजह से पुल पानी के तेज बहाव में भी मजबूती से टिका रहता है. इसके पिछले केबिन में डुअल ड्राइव कंट्रोल दिए गए हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे असेंबल करने के लिए बहुत कम जवानों की जरूरत पड़ती है. खतरे वाले इलाके में कम से कम जवानों को खतरे में डालकर पूरा पुल तैयार हो जाता है.
बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं में यह तकनीक कैसे जान बचाती है?
सर्वत्र सिर्फ युद्ध के समय ही काम नहीं आता, बल्कि शांति काल में भी यह देश की बड़ी ताकत है. जब देश में भयानक बाढ़ आती है और पक्के पुल बह जाते हैं, तब लोगों तक मदद पहुंचाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे समय में सर्वत्र ब्रिज को तुरंत मौके पर भेजा जा सकता है. यह सिस्टम कुछ ही घंटों में टूट चुके रास्तों को जोड़ देता है. भारी राहत सामग्री, एम्बुलेंस और राहत दल इस पुल के जरिए आसानी से प्रभावित इलाकों में पहुंच जाते हैं.
भूकंप के दौरान जब जमीन धंस जाती है, तब भी यह मोबाइल ब्रिज रास्तों को बहाल करने में सबसे आगे रहता है. अपनी बेहतरीन मोबिलिटी के चलते यह सिस्टम देश के किसी भी कोने में कम समय में पहुंच सकता है.



