OPINION: राजद्रोह के आरोप में 6 साल से जेल में बंद उमर खालिद राष्ट्रवादी कैसे हो गया?

दिल्ली दंगों की गहरी साजिश रचने और यूएपीए जैसे संगीन आतंकी कानूनों के तहत पिछले छह साल से जेल की सलाखों के पीछे बंद उमर खालिद को कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद द्वारा ‘राष्ट्रवादी’ करार दिया जाना देश की संप्रभुता और न्यायिक प्रक्रिया के मुंह पर करारा तमाचा है. जब देश की राजधानी में 53 मासूमों की जान लेने वाले और सैकड़ों लोगों के घर-दुकानें खाक करने वाले दंगों के कथित सूत्रधार को राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए देशभक्ति का प्रमाण पत्र थमाया जाए, तो यह साफ हो जाता है कि वोट बैंक की खातिर कांग्रेस किस हद तक गिर सकती है. यह केवल एक नेता का गैर-जिम्मेदाराना बयान नहीं, बल्कि उस खतरनाक तुष्टिकरण की राजनीति की खुली नुमाइश है जो देशद्रोह और हिंसा के आरोपियों को रातोंरात शहीद और राष्ट्रवादी बनाने पर आमादा है. यह बुनियादी सवाल सीधे कांग्रेस के चेहरे पर चस्पा होता है कि जिस शख्स के दामन पर दिल्ली को आग में झोंकने के छींटे हों, वह अचानक उनके लिए राष्ट्रवाद का प्रतीक कैसे बन गया?
राजद्रोह का आरोपी, पर कांग्रेस को दिखा ‘मसीहा’: बीके हरिप्रसाद और उनकी पार्टी को यह कड़वी हकीकत समझनी चाहिए कि न्याय व्यवस्था बयानों से नहीं, बल्कि पुख्ता सबूतों और कानूनी दस्तावेजों से चलती है. उमर खालिद पिछले छह साल से किसी राजनीतिक विद्वेष के चलते जेल में नहीं है, बल्कि देश की शीर्ष अदालतों ने बार-बार उसके खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता को माना है.
ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक फटकार: दिल्ली की निचली अदालत और दिल्ली हाईकोर्ट ने उमर खालिद की जमानत याचिकाओं को खारिज करते हुए रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर माना था कि वह दंगों की एक पूर्व-नियोजित और बड़ी साजिश का सक्रिय हिस्सा था.
सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं मिली राहत: देश की सर्वोच्च अदालत से भी उमर खालिद को कोई फौरी राहत नहीं मिल सकी और उसे अपनी याचिकाएं वापस तक लेनी पड़ीं. जिस मामले में संवैधानिक अदालतों ने यह देखा हो कि आरोपी पर लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं, वहां कांग्रेस नेता का उसे राष्ट्रवादी घोषित करना न्यायपालिका की गरिमा को सरेआम ललकारना है.
दिल्ली को सुलगाने की साजिश और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का अतीत: उमर खालिद का अतीत किसी से छिपा नहीं है. जेएनयू के उस कुख्यात दौर से लेकर, जहां ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं’ जैसे देशविरोधी नारों की गूंज सुनाई दी थी, उमर खालिद लगातार विवादों के केंद्र में रहा.
सीएए और एनआरसी के विरोध के नाम पर जिस तरह से उत्तर-पूर्वी दिल्ली में एक सोची-समझी रणनीति के तहत चक्का जाम किया गया, भाषणों के जरिए एक वर्ग विशेष को उकसाया गया और अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को बदनाम करने की पटकथा लिखी गई, जांच एजेंसियों की चार्जशीट उसके पन्नों-पन्नों में उमर खालिद की संदिग्ध भूमिका को रेखांकित करती है. पुलिस के पास मौजूद कॉल रिकॉर्ड्स, खुफिया बैठकों के ब्योरे और गवाहों के बयान यह बताते हैं कि दिल्ली की सड़कों पर बहा खून किसी अचानक भड़की हिंसा का नतीजा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र था.
क्या देश को दंगों की आग में झोंकने की साजिश रचना ही कांग्रेस के नए शब्दकोश में ‘राष्ट्रवाद’ कहलाता है? सितंबर 2020 में गिरफ्तार किए गए खालिद पर फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के ‘मुख्य साजिशकर्ताओं’ में से एक होने के आरोप में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे.
तुष्टिकरण की अंधी दौड़ में सुरक्षा दांव परकांग्रेस का यह रुख कोई नया नहीं है. बाटला हाउस एनकाउंटर पर आंसू बहाने से लेकर जेएनयू के विवादास्पद तत्वों के समर्थन में खड़े होने तक, पार्टी ने बार-बार साबित किया है कि उसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से कहीं ज्यादा जरूरी चंद कट्टरपंथी वोटों का ध्रुवीकरण है. बीके हरिप्रसाद का यह बयान उसी पुरानी और घातक मानसिकता का विस्तार है.
जब एक राष्ट्रीय पार्टी खुलेआम उस व्यक्ति का महिमामंडन करने लगे जिस पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) जैसी सख्त धाराओं में मुकदमा चल रहा हो, तो वह उन पुलिसकर्मियों और बेकस नागरिकों के बलिदान का अपमान करती है जो दंगाइयों की गोलियों और पेट्रोल बमों का शिकार बने थे. दंगों में शहीद हुए हेड कांस्टेबल रतन लाल और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के परिजनों के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए जब कांग्रेस उमर खालिद जैसे लोगों को ‘राष्ट्रवादी’ बताती है, तो यह देश की आंतरिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ से कम नहीं है.
राष्ट्रवाद का पैमाना इतना सस्ता नहींराष्ट्रवाद कोई ऐसा मुखौटा नहीं है जिसे अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार जब चाहा ओढ़ लिया और जब चाहा उतार दिया. तिरंगे और संविधान की दुहाई देकर पर्दे के पीछे अराजकता की पटकथा लिखने वालों को जनता कभी देशभक्त नहीं मान सकती. छह साल से जेल में बंद उमर खालिद को क्लीन चिट देकर कांग्रेस ने खुद को एक बार फिर देशविरोधी ताकतों के साथ खड़ा कर लिया है.
दंगों की साजिश के आरोपी को राष्ट्रवादी बताने का यह दुस्साहस केवल कांग्रेस के नैतिक दिवालियापन को दर्शाता है. देश की जागरूक जनता यह अच्छी तरह देख और समझ रही है कि कौन संविधान की रक्षा कर रहा है और कौन दंगाइयों की पैरवी कर भारत की संप्रभुता पर चोट करने वालों की ढाल बन रहा है.



