अशोक गहलोत के बयान की धांसू ‘टाइमिंग’ से संकट में आई कांग्रेस, बीजेपी मुस्कुराई

जयपुर. क्या राजस्थान के पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने कांग्रेस में नेताओं की कलह को उजागर कर जाने अनजाने में निकायों के मुखियाओं के चुनाव के गणित में बीजेपी की मदद कर दी है? गहलोत ने कहा कि अगर राजस्थान के सीएम भजनलाल शर्मा के रोड शो के जबाब में कांग्रेस भी रोड शो करती तो अच्छा रहता. प्रदेश कांग्रेस कमेटी कोई कार्यक्रम बनाती जिससे सभी नेता अगर सड़क पर निकलते तो कांग्रेस के पक्ष में अच्छे नतीजे आते. इस बयान ने कांग्रेस की अंदरुनी कलह और गुटबाजी उजागर हो गई. वही गहलोत के बयान की टाइमिंग से पार्टी के रणनीतिकारों के होश उड़ हुए हैं.
गहलोत ने बिना नाम लिए प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की चुनावी रणनीति और प्रबंधन को कटघरे में खड़ा कर दिया. हालांकि सचिन पायलट ने गहलोत के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि राजस्थान में प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने बढ़िया काम किया और सभी नेताओं को टास्क दिया था. लेकिन बीजेपी नेताओं को लगता है कि कांग्रेस की इस कलह से गुटों में बंटी कांग्रेस के पार्षद उन निकायों में बीजेपी के पाले में आ सकते हैं जहां बहुमत के लिए कुछ ही पार्षद चाहिए. बीजेपी ने कहा कि गहलोत ने इस सच को स्वीकार किया कि सीएम भजनलाल शर्मा के रोड शो और बीजेपी के बेहतर मैनेजमेंट से चुनाव जीती.
गहलोत के बयान से राजस्थान में कांग्रेस सदमे में हैराजस्थान में 21 सितंबर को नगर निगमों के मेयर, नगर परिषदों के सभापति और नगर पालिका अध्यक्षों के चुनाव के लिए मतदान होगा. 309 निकायों में अपनी पार्टी का बोर्ड प्रमुख बनाने के लिए कांग्रेस और बीजेपी ने पूरी ताकत झौंक रखी है. अपने विधायकों को बाड़ेबंदी में रख रखा है. निर्दलीयों और एक दूसरे के पार्षद तोड़कर अपने पाले मे लाने का जतन जारी हैं. इस बीच अशोक गहलोत के एक बयान से राजस्थान में कांग्रेस सदमे में है. गहलोत ने न सिर्फ ये मान लिया कि राजस्थान में कांग्रेस हारी बल्कि उन्होंने पार्टी के अंदर की कलह को भी सड़क पर ला दिया है
गहलोत के बयान से रणनीतिकारों को है डरगहलोत ने कहा कि अगर प्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ऐसी रणनीति बनाते कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो के जबाब में कांग्रेस भी पार्षदों के मतदान से पहले रोड शो करती. अगर कांग्रेस के सभी नेता एक साथ निकलते तो कांग्रेस ज्यादा सीट जीत पाती और नतीजे बेहतर होते. गहलोत ने इस बयान के जरिए परोक्ष रुप से डोटासरा पर निशाना साधा कि उनका चुनाव प्रबंधन और रणनीति कमजोर थी जिससे कांग्रेस हारी. लेकिन इससे भी बड़ी बात है गहलोत के बयान की टाइमिंग. निकायों के प्रमुखों के लिए मतदान से पहले गहलोत के बयान से कांग्रेस के रणनीतिकारों को डर है कि कांग्रेस पार्षद खेमों में बंट सकते हैं. इसका फायदा बीजेपी उठा सकती है खासकर उन निकायों में जहां उसके पास बहुमत नहीं है.
पायलट ने पलटवार कर डेमैज कंट्रोल की कोशिश की हैहालांकि सचिन पायलट ने गहलोत का बिना नाम लिए पलटवार कर डेमैज कंट्रोल की कोशिश की है. पायलट ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने अच्छा काम किया. सभी नेताओं को अपने अपने क्षेत्र में काम करने की जिम्मेदारी दी. पायलट ने गहलोत के रोड शो वाले बयान पर भी कहा कि सरकार में अलग तरह के संसाधन होते हैं. लेकिन हमने डोर टू डोर चुनाव प्रचार किया. पायलट ने कहा कि टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार और प्रभारियों ने सभी ने अच्छा काम किया.
बीजेपी को है गहलोत बयान से इसलिए खुश हैबीजेपी गहलोत के बयान से खुश है. बीजेपी को लगता है कांग्रेस की कलह का फायदा उसे निकायों में बोर्ड बनाने में मिलेगा. बीजपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने कहा कि आखिरकार अशोक गहलोत के बयान से कंग्रेस ने यह तो मान लिया कि सीएम के रोड और बीजेपी नेताओं के बेहतर चुनाव प्रबंधन से बीजेपी जीती न कि किसी धांधली से.
गहलोत काफी समय से गोविंद डोटासरा से खफा हैं
राजस्थान में अशोक गहलोत काफी समय से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद डोटासरा से खफा हैं. एक महीने पहले जब गहलोत के घर पर उनके सामने चौथी बार सीएम के नारे लगे तब डोटासरा ने पलटवार कर गहलोत पर पार्टी के बजाय खुद की ब्रांडिग का आरोप लगाया था. डोटासरा ने कहा था कि गहलोत के तीन बार सीएम रहते कांग्रेस हारी थी. तब से डोटासरा और गहलोत आमने सामने हैं. गहलोत समर्थक शांति धारीवाल समेत कुछ गहलोत समर्थकों ने तो कह दिया था कि राजस्थान में तो गहलोत ही कांग्रेस है. दिल्ली का कांग्रेस का हाईकमान अलग है. उसके बाद ही गांधी परिवार भी गहलोत से खफा है. अब इस बयानबाजी से कांग्रेस में कलह और बढ़ सकती है.
बयान की टाइमिंग से पार्टी के समीकरण बिगड़ सकते हैंहालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि अशोक गहलोत की पीड़ा कुछ और है. पूरे निकाय चुनाव में गहलोत एक तरह से ‘किनारे’ पर ही रहे. रणनीति में उनकी कोई भूमिका नजर आई नहीं है. गहलोत को इस बात की टीस भी है और हताशा भी. यही वजह कि उन्होंने अपनी बात पार्टी के प्लेटफॉर्म की बजाय पब्लिकली कही. इससे गहलोत के मन का बोझ तो हल्का हो गया लेकिन यह पार्टी के लिए संकट बन सकता है. हालांकि आगे गहलोत के बयान की समीक्षा किस तरह की जाती है यह अलग बात है. लेकिन बयान की टाइमिंग से पार्टी के समीकरण बिगड़ सकते हैं.



