Agriculture: रेगिस्तान में अब मौसम का इंतजार नहीं, लैब में तैयार होंगे पौधे, प्रोफेसर और छात्रों की मेहनत रंग लाई

बीकानेर. रेगिस्तान में अब पौधे तैयार करने के लिए मौसम का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. ऐसे में स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों की करीब तीन साल की मेहनत रंग लाई है. विश्वविद्यालय की प्लांट टिश्यू कल्चर लैब में नियंत्रित वातावरण के बीच शहतूत और नींबू के रोगमुक्त पौधे सफलतापूर्वक तैयार किए गए हैं. वहीं गुलाब और पश्चिमी राजस्थान के महत्वपूर्ण पौधे पीलू पर भी उत्साहजनक काम चल रहा है. नियंत्रित वातावरण में तैयार किए जा रहे ये पौधे रोगमुक्त होने के साथ तेजी से बढ़ने की क्षमता रखते हैं.
छोटे से स्थान में एक बार में 500 से 700 पौधे तैयार करने वाली यह तकनीक भविष्य में किसानों और नर्सरी संचालकों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है. असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विकास शर्मा ने बताया कि टिश्यू कल्चर यानी ऊतक संवर्धन एक ऐसी तकनीक है, जिसमें पौधे के बहुत छोटे हिस्से से नया पौधा तैयार किया जाता है. इसके लिए पौधे की जड़, पत्ती, तने अथवा कली का एक छोटा हिस्सा लिया जाता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘एक्सप्लांट’ कहते हैं. इस छोटे से हिस्से को कृत्रिम पोषक माध्यम में रखकर धीरे-धीरे पूर्ण पौधे के रूप में विकसित किया जाता है.
कांच के जार में विकसित होता है पौधा
डॉ. शर्मा ने बताया कि पौधे के छोटे हिस्से को कृत्रिम माध्यम में रखने से पहले पूरी प्रक्रिया को संक्रमणमुक्त बनाया जाता है. लैब में इस्तेमाल होने वाले माध्यम और उपकरणों को ऑटोक्लेव मशीन की सहायता से स्टरलाइज किया जाता है. इसके बाद एक्सप्लांट को भी संक्रमणमुक्त कर छोटे कांच के जार में स्थानांतरित किया जाता है. कांच के जार में एमएस मीडिया नामक कृत्रिम माध्यम होता है. इसमें वे सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद रहते हैं, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में पौधा मिट्टी से प्राप्त करता है. इसी पोषक माध्यम की सहायता से पौधा बिना मिट्टी के भी लैब के नियंत्रित वातावरण में वृद्धि करने लगता है.
लैब में ही सूर्य जैसी रोशनी की व्यवस्था
पौधे को बढ़ने के लिए पोषक तत्वों के साथ प्रकाश की भी आवश्यकता होती है. सामान्य परिस्थितियों में पौधे सूर्य के प्रकाश से प्रकाश संश्लेषण करते हैं. टिश्यू कल्चर लैब में इसके लिए विशेष कृत्रिम रोशनी की व्यवस्था की गई है. इस रोशनी के माध्यम से पौधे लैब के भीतर ही प्रकाश संश्लेषण कर वृद्धि करते हैं. कृत्रिम माध्यम में रखने के बाद एक्सप्लांट से सबसे पहले छोटी-छोटी कलियां निकलती हैं. इसके बाद धीरे-धीरे पत्तियां और तना विकसित होने लगते हैं. पौधे का पर्याप्त आकार होने पर उसे दूसरे पोषक माध्यम में स्थानांतरित किया जाता है.
जड़ें विकसित होने के बाद ग्रीन हाउस में जाएंगे पौधे
पौधे की शुरुआती वृद्धि के बाद उसे ‘रूटिंग मीडिया’ में स्थानांतरित किया जाता है. इस माध्यम में पौधे की जड़ें विकसित होती हैं. जड़ें बनने के बाद ही पौधा मिट्टी से पोषक तत्व लेने और बाहरी वातावरण में जीवित रहने योग्य बनता है. डॉ. शर्मा ने बताया कि कुछ पौधों में मजबूत और तेजी से बढ़ने वाली जड़ें विकसित हुई हैं. ये जड़ें मिट्टी में नमी की कमी होने पर पौधे को जीवित रहने में मदद कर सकती हैं. इसके साथ ही मिट्टी से पोषक तत्व ग्रहण करने की क्षमता भी बेहतर होती है. लैब में तैयार पौधों को सीधे खेत अथवा नर्सरी में नहीं लगाया जाएगा. सबसे पहले इन्हें ग्रीन हाउस में ले जाकर बाहरी वातावरण के अनुकूल बनाया जाएगा. इस प्रक्रिया को हार्डनिंग कहा जाता है. पौधे जब सामान्य वातावरण में रहने योग्य हो जाएंगे, तब उन्हें नर्सरी अथवा खेत में स्थानांतरित किया जाएगा.
चार से छह महीने में तैयार होता है पौधा
टिश्यू कल्चर तकनीक से एक पौधे को तैयार होने में करीब चार से छह महीने का समय लगता है. नई प्रजातियों पर काम शुरू करने और पौधे को पूरी तरह विकसित करने में छह से सात महीने भी लग सकते हैं. इसकी विशेषता यह है कि लैब के नियंत्रित वातावरण में पूरे साल पौधे तैयार किए जा सकते हैं. एक छोटे से स्थान में बड़ी संख्या में पौधे तैयार करना भी इस तकनीक का प्रमुख लाभ है. विश्वविद्यालय की लैब में फिलहाल एक बार में लगभग 500 से 700 पौधे तैयार किए जा रहे हैं. आने वाले समय में इस क्षमता को और बढ़ाने की योजना है.
कई बार आईं परेशानियां, लेकिन जारी रखा प्रयोग
विश्वविद्यालय में टिश्यू कल्चर से पौधे तैयार करने का प्रयोग करीब तीन साल पहले शुरू किया गया था. शुरुआती दौर में वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों को संक्रमण सहित कई तकनीकी परेशानियों का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद प्रयोग जारी रखा गया. लगातार प्रयासों के बाद अब शहतूत और नींबू सहित साइट्रस वर्ग के पौधों में सफलता मिली है. गुलाब और पीलू के पौधों पर भी बेहतर काम चल रहा है. नियंत्रित और संक्रमणमुक्त वातावरण में तैयार होने के कारण ये पौधे शुरुआती अवस्था में रोगमुक्त रहते हैं. इससे उनकी वृद्धि बेहतर होने की संभावना रहती है. हालांकि, नर्सरी अथवा खेत में स्थानांतरित करने के बाद इनकी नियमित देखभाल आवश्यक होगी.
पश्चिमी राजस्थान की प्रजातियों को बचाने की तैयारी
डॉ. शर्मा ने बताया कि अभी विश्वविद्यालय अपने स्तर पर इस दिशा में काम कर रहा है. आगामी समय में राज्य और केंद्र सरकार के सहयोग से इसे बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने की योजना है. पश्चिमी राजस्थान में कई ऐसी विशेष पौध प्रजातियां हैं, जिनकी वृद्धि धीमी है अथवा जिनके अस्तित्व पर खतरा बना हुआ है. इन प्रजातियों को टिश्यू कल्चर तकनीक से विकसित और संरक्षित करने के लिए विश्वविद्यालय परियोजना तैयार कर सरकार को भेजेगा. सरकार से सहयोग मिलने पर लैब की क्षमता बढ़ाई जाएगी और अधिक प्रजातियों पर काम शुरू किया जाएगा. सफल परीक्षण और आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ये पौधे किसानों, नर्सरी संचालकों और आम लोगों को उपलब्ध करवाए जा सकेंगे. इससे कम स्थान में बड़ी संख्या में स्वस्थ एवं गुणवत्तापूर्ण पौधे तैयार करने का रास्ता खुलेगा.



