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अनुपम खेर को हुआ मैनिक डिप्रेशन, अगर आपमें हैं ये लक्षण तो आप भी हो सकते हैं बायपोलर डिसॉर्डर के शिकार, अभी चेक करें

Manic Depression: डिप्रेशन या अवसाद भारत के आम जनमानस में बहुत ही कम सुना जाता है. अगर कोई डिप्रेशन में होता भी है तो उसे मालूम भी नहीं कि ये कोई मानसिक बीमारी है. मानसिक बीमारी के इलाज के लिए शारीरिक बीमारी का इलाज करने वाले डॉक्टर नहीं होते हैं बल्कि इसके लिए साइकेट्रिस्ट होते हैं. बहरहाल, एक्टर अनुपम खेर ने एक पुराने शब्द से अपनी एक मानसिक बीमारी का जिक्र किया है. इस बीमारी का नाम है मैनिक डिप्रेशन. आधुनिक डॉक्टरी भाषा में अब इसे बाइपोलर डिसऑर्डर कहा जाता है. अनुपम खेर को भी इस बात का पता नहीं था कि उन्हें यह बीमारी है. जब वे अपने डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने बताया कि उन्हें मैनिक डिप्रेशन है. अब सवाल उठता है कि ये मैनिक डिप्रेशन या बायपोलर डिसॉर्डर है क्या? इसे जानने के लिए हमने फोर्टिस अस्पताल में साइकेट्रिक डिपार्टमेंट की सीनियर कंसल्टेंट और एचओडी डॉ. नेहा अग्रवाल से बात की.

क्या है मैनिक डिप्रेशन

डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया कि बायपोलर डिसॉर्डर एक तरह का मूड डिसॉर्डर है. इसमें मरीज के दिमाग में कई तरह के आक्रामक परिवर्तन आ जाते हैं. इसे अगर आसान और सहज भाषा में कहें तो बायपोलर डिसॉर्डर में मरीज दो ध्रुवों वाला व्यवहार करता है. यानी एक उत्तर में दूसरा दक्षिण में. दोनों का एक दूसरे के साथ कोई सामंजस्य नहीं. इसमें इंसान का दिमाग सामान्य मूड पर टिकने के बजाय बहुत अत्यधिक हाई हो जाता है. दिमाग में भावनाओं को ज्वार उठता रहता है. व्यक्ति अत्यधिक उत्तेजना में रहता है. उसे सबसे सर्वश्रेष्ठ होने का गुमान हो जाता है. ऐसे में इंसान को नींद कम आती है लेकिन इसके बजाय वह हमेशा एनर्जी से भरपूर रहता है जो उसके व्यवहार में दिखता है.

कैसे समझें कि कोई बायपोलर डिसॉर्डर में है

डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि अगर आप सही से गौर करें तो ऐसे व्यक्ति को आसानी से पहचाना जा सकता है. हालांकि हर मामलों में आम लोग इसे नहीं समझ सकते हैं. इसलिए डॉक्टरों के पास लाना जरूरी है. अब यह समझिए कि बायपोलर डिसॉर्डर में व्यक्ति का व्यवहार किस तरह का हो जाता है. अगर किसी व्यक्ति में बायपोलर डिसॉर्डर है तो सबसे पहले वह व्यक्ति कम सोएगा. यानी रात में 3-4 घंटे ही सोएगा लेकिन उसमें जबर्दस्त एनर्जी रहेगी. उसका मूड हमेशा एलिवेटेड रहेगा. इसे मूड हाई कह सकते हैं. ऐसे व्यक्ति के व्यवहार में बहुत आक्रामक बदलाव आ जाता है. वह एक तरह से उदंड हो जाता है. उसे किसी चीज की परवाह नहीं होती. उसमें किसी बात को कहने में किसी तरह का संकोच या शर्म नहीं आती है. उसे लगता है कि वह बहुत ज्यादा महान है. इसके लिए वह दूसरों के सामने कुछ भी बोलने से नहीं घबराता. अक्सर बड़ी-बड़ी बातें करेगा जैसे कोई बहुत बड़ी सेलीब्रिटी या कोई मंत्री हो. वह हर तरह के रिस्क लेने के लिए तैयार हो जाता है. उसमें दिखावापन बहुत रहता है. डीगें हांकने में माहिर हो जाएगा. वह दुःसाहसी बनने लगता है. इसमें एक कम आक्रामक वाली बीमारी भी होती है, जिसे हाइपो मैनिया कहते हैं. यह मैनिया से थोड़ा कम आक्रामक होता है. हाइपोमैनिया में व्यक्ति की प्रोडक्टिविटी बढ़ जाती है. वह ज्यादा रिस्क लेने वाला व्यवहार करने लगता है. उसे लगता है कि वह कुछ भी कर सकता है. वह यह सोचे बिना कि आगे क्या होगा, हैरअंगेज काम करने लगता है. कभी वह बिना वजह किसी पर पैसे लुटा देगा तो कभी दिखाने के लिए बहुत अधिक शॉपिंग कर लेगा. मैनिया आसपास के लोगों को परेशान करता है. वह हमेशा दूसरों से बढ़-चढ़कर बात करता है. बड़ी-बड़ी बातें करता है जिसका वास्तविकता से कोई मललब नहीं है. सबको दिखाता है कि मेरे से ज्यादा अच्छा काम तुम्हारा कोई नहीं कर सकता. मैं सब कुछ कर सकता हूं. इसमें जबर्दस्ती किसी दूसरे का काम करने लगता. गाड़ी तेज चलाने लगता. खर्चा बहुत कम करने लगता है. इसमें नींद की जरूरत कम हो जाती. उसे लगता है कि हमारे जीवन से किसी का अच्छा जीवन नहीं है.

बायपोलर डिसॉर्डर का कारण क्या है

बायपोलर डिसॉर्डर के कई कारण हो सकते हैं. हालांकि सटीक कारण का पता नहीं चल पाता है. डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि बाइपोलर डिसऑर्डर सिर्फ मानसिक या भावनात्मक उतार-चढ़ाव नहीं है बल्कि यह न्यूरोबायोलॉजिकल समस्या भी है. इसमें दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर्स, हार्मोन और शारीरिक तंत्र में कई बड़े बदलाव आते हैं. मस्तिष्क के न्यूरॉन्स एक-दूसरे को संदेश भेजने के लिए केमिकल का उपयोग करते हैं. अक्सर नींद की कमी के कारण ऐसा होता है. कुछ लोगों में फैमिली हिस्ट्री भी होती है.

हार्मोन में भारी उतार-चढ़ाव

डॉ. नेहा अग्रवाल के मुताबिक जब किसी व्यक्ति को बायपोलर डिसॉर्डर होता है तो डोपामाइन हार्मोन का स्तर बहुत बढ़ जाता है. इसलिए बहुत ज्यादा एनर्जी फील होती है और नींद कम आती है. दिमाग में जोखिम भरे विचारों का तूफान आने लगता है. वहीं सेरोटोनिन का स्तर कम हो जाता है. सेरोटोनिन मूड बेहतर करके शरीर को आराम देता है जिसके बाद अंधेरा होने पर वही सेरोटोनिन मेलाटोनिन में बदलकर दिमाग को सोने का सिग्नल देता है. सेरोटोनिन कम होने से शरीर को आराम नहीं देता और नींद भी नहीं लाता. ऐसे लोगों के शरीर में इंफ्लेमेटरी मार्कर्स सी रिएक्टिव प्रोटीन का स्तर बढ़ जाता है. इससे शरीर में इंफ्लामेशन बढ़ता है और इम्यूनिटी कमजोर होती है. बायपोलर डिसॉर्डर वाले व्यक्ति के मस्तिष्क की संरचना और कामकाज में बदलाव आता है. दिमाग का वह हिस्सा जो भावनाओं जैसे कि डर, खुशी और गुस्सा को प्रोसेस करता है, वह अति सक्रिय हो जाता है जिससे भावनाएं नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं.

किन लोगों का ज्यादा खतरा

डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि जिन लोगों में नींद की कमी होती है, उनमें बायपोलर डिसॉर्डर का रिस्क ज्यादा रहता है. वैसे यह 15 से 25 की उम्र में ज्यादा होती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस उम्र के बाद बायपोलर डिसॉर्डर किसी को नहीं हो सकती. यह किसी भी उम्र में हो सकती है. ओल्ड एज में भी यह ज्यादा हो सकता है.

क्या इस बीमारी का इलाज है

जी हां, बिल्कुल इसका इलाज है. डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि बायपोलर डिसॉर्डर में शरीर में उत्साह और खुशी वाला हार्मोन बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. नींद वाला हार्मोन कम हो जाता है. इसलिए इस बीमारी के लिए शुरू में कंसल्टेशन या थेरेपी काम नहीं करती. इसमें सबसे पहले मेडिसीन दी जाती है. इस टाइम पर मरीज में रिसेप्टर नहीं होता. यानी किसी दूसरे की बातों को सुनने या समझने की क्षमता नहीं होती इसलिए हम मूड स्टैवलाइजर पर डाल देते हैं ताकि बार-बार मैनिया न हो. ऐसे मरीज में डोपामाइन का लेवल बढ़ जाता है. उसे ब्लॉक करने वाली दवा देते हैं ताकि बढ़ा हुआ डोपामाइन दिमाग पर असर न डाले और मरीज का दिमाग शांत हो सके. मूड स्टेबलाइजर पर इसलिए डालते हैं ताकि बार-बार मैनिया न हो. मूड स्टैबलाइजर दवा का काम दिमाग की विद्युत तरंगों और केमिकल्स को स्थिर रखना है ताकि भविष्य में मैनिया या डिप्रेशन के दौर दोबारा न आएं. शॉर्ट टर्म एजीटेशन यानी कई बार अचानक होने वाली अत्यधिक घबराहट, छटपटाहट, गुस्सा या बेचैनी को तुरंत कंट्रोल करने के लिए कई बार बेंजोडायजेपाइन या हल्की नींद की दवा दी जाती है. मूड स्टेबलाइजर दवाओं को पूरी तरह असर दिखाने में 1 से 2 हफ्ते का समय लगता है. इसलिए शुरुआती कुछ दिनों के लिए मरीज की अत्यधिक छटपटाहट और बेचैनी को तुरंत शांत करने के लिए यह दवा दी जाती है, जिसे बाद में बंद कर दिया जाता है. कभी-कभी इमरजेंसी स्थिति भी पैदा हो सकती है. इसमें इमरजेंसी दवा दी जाती है.

जागरुकता बहुत जरूरी

डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि हमारे यहां मानसिक बीमारी को लोग सही से समझ नहीं पाते हैं. ऐसे में जागरुकता बहुत जरूरी है. सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि मानसिक बीमारी पागलपन नहीं है. मन के व्यवहार में परिवर्तन मानसिक बीमारी हो सकती है और इसका इलाज भी है, इसलिए समाज में यह जागरुकता फैलनी चाहिए कि मूड में आक्रामक बदलाव या बहुत ज्यादा निराशा या उत्साह में कमी एक मानसिक बीमारी है और इसका इलाज कराना जरूरी है. जो लोग समाज में जिम्मेदार हैं, उन्हें पहल करनी चाहिए. उन्हें ऐसे लोगों को प्रोत्साहित कर डॉक्टर से दिखाना चाहिए.

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