Nana Patekar Tribute Article: ‘फोन नंबर ले ले और बता देना मुझे…’ नाना आपने कहा था फिर मिलेंगे

नई दिल्ली. जब सुबह-सुबह नाना पाटेकर के गुजर जाने की खबर मेरे मोबाइल स्क्रीन पर आई, तो एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे मेरी सांसें रुक गई हों. मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि अपनी दमदार आवाज और आंखों के इशारों से पूरे थिएटर को हिला देने वाला यह महान कलाकार अब इस दुनिया में नहीं रहा. एक पत्रकार और उनका पुराना फैन होने के नाते, यह खबर मेरे लिए किसी पर्सनल नुकसान से कम नहीं थी. दिसंबर 2024 का वह दिन आज भी मेरी यादों में ताजा है, जब मुझे एक इंटरव्यू के दौरान उनके साथ लगभग एक घंटा बिताने का मौका मिला था. इंटरव्यू के बाद जब हम निकल रहे थे, तो उन्होंने प्यार से मेरा कंधा थपथपाया और मुस्कुराते हुए कहा, ‘मेरा फोन नंबर ले लो… और अगली बार जब तुम मुंबई आओ, तो मुझे फोन करके बता देना. हम घर पर मिलेंगे और आराम से बैठकर बातें करेंगे.’
उस एक घंटे की बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे जो अपनापन दिया. उसने मुझे उनका और भी बड़ा फैन बना दिया. उसके बाद, मैं काम के सिलसिले में कई बार दिल्ली से मुंबई आया-गया, लेकिन हर बार समय की भागदौड़ की वजह से उनसे मिलने का समय नहीं मिल पाया. आज जब नाना हमें छोड़कर चले गए हैं, तो मेरे दिल में एक अफसोस की टीस है, काश मैंने उस दिन उनसे मिलने के लिए समय निकाला होता. अब मेरी यादों में सिर्फ उनका फोन नंबर और उनकी दमदार आवाज ही बची है.
जब भी हम बॉलीवुड में किसी ऐसे कलाकार की बात करते हैं, जिसने कभी किसी की चापलूसी नहीं की और हमेशा अपनी शर्तों पर जिया, तो नाना पाटेकर का नाम सबसे पहले आता है. वह कैमरे के पीछे भी उतने ही सीधे थे जितने कैमरे के सामने… पूरी तरह साफ और ईमानदार. पीठ पीछे बुराई करना या डिप्लोमेसी नाना के स्वभाव का हिस्सा कभी नहीं था. अगर उन्हें किसी में कुछ गलत लगता, तो वह तुरंत उसे डांट देते, चाहे जगह कोई भी हो या उस व्यक्ति का स्टेटस कुछ भी हो.
फिल्म इंडस्ट्री में यह बात मशहूर थी कि राज कुमार साहब के साथ काम करना हर किसी के बस की बात नहीं थी. राज साहब का अपना स्टाइल था. वह किसी को भी डांट सकते थे और बड़े से बड़े स्टार भी उनसे डरते थे. लेकिन, नाना पाटेकर के साथ राज कुमार की केमिस्ट्री और तालमेल कमाल का था. इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उन दोनों का स्वभाव एक जैसा था- दोनों ही स्वाभिमानी, बेबाक और साफ दिल के थे. उस इंटरव्यू में मैंने खास तौर पर नाना से पूछा कि क्या राज कुमार जैसे सख्त मिजाज वाले इंसान के साथ काम करना उनके लिए मुश्किल था. नाना के चेहरे पर मुस्कान आ गई. वे हंसे और बोले, ‘अरे नहीं, डियर! राज साहब बहुत अच्छे इंसान थे. हमारे बीच कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ, बल्कि हमारी बॉन्डिंग बहुत अच्छी थी.’
फिर नाना ने शूटिंग के दिनों का एक बहुत ही मजेदार किस्सा शेयर किया. उन्होंने कहा था, ‘एक बार हम सेट पर साथ में लंच कर रहे थे. उस दिन मेरी मां ने मेरे लिए केले के फूल की सूखी सब्जी बनाई थी. जब राज साहब ने मेरे टिफिन में वह सब्जी देखी, तो उन्होंने प्यार से मेरा टिफिन अपनी ओर खींचा और मुझे अपना खाना दिया. कुछ निवाले खाने के बाद, राज कुमार साहब ने अपनी जानी-पहचानी आवाज में कहा, ‘जानी! तुम्हारी मां ने यह कीमा बहुत अच्छा बनाया है!’ मैंने उनसे कहा, ‘राज साहब, यह कीमा नहीं है, यह केले के फूल की सब्जी है.’ लेकिन राज साहब कहां मानने वाले थे! उन्होंने मुझे पूरी तरह मना कर दिया और फिर उसी घमंड में बोले, ‘नहीं, जानी! यह सिर्फ कीमा है और बहुत अच्छा बना है!’…’ यह कहानी सुनाते हुए नाना खुद भी मुस्कुरा पड़े थे.
नाना पाटेकर ‘क्रांतिवीर’, ‘तिरंगा’, ‘परिंदा’ और ‘अपहरण’ जैसी फिल्मों में अपने गुस्सैल और अग्रेसिव एटीट्यूड के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उनके करियर में एक फिल्म ऐसी भी थी जिसने दुनिया को उनकी एक्टिंग के एक बिल्कुल अलग और सेंसिटिव पहलू से मिलवाया- ‘वनवास’. इस फिल्म में नाना ने एक बेबस और लाचार पिता का रोल किया था, जिसे उसके अपने बच्चे ही रिजेक्ट कर देते हैं. फिल्म की रिलीज से पहले जब नाना का इंटरव्यू लिया गया, तो उन्होंने कॉन्फिडेंस से कहा, ‘जब लोग थिएटर में यह फिल्म देख लेंगे, तो लाइट जलने के बाद भी वे 4-5 मिनट तक अपनी सीट से उठ नहीं पाएंगे. वे अपनी सीट से रोएंगे और भारी मन से जाएंगे.’
हालांकि ‘वनवास’ को बॉक्स ऑफिस पर वह कमर्शियल रिस्पॉन्स नहीं मिला जिसके वह हकदार थी, लेकिन नाना की कही हर एक बात पूरी तरह सच साबित हुई. जब मैंने खुद थिएटर में फिल्म का क्लाइमैक्स देखा, जहां नाना का कैरेक्टर मर जाता है, तो मेरी आंखों में आंसू आ गए. फिल्म खत्म होने के बाद, मैं काफी देर तक अपनी सीट पर सुन्न बैठा रहा, सोचता रहा कि क्या इस दुनिया में किसी पिता के साथ इतना बुरा बर्ताव हो सकता है? नाना ने उस सीन में एक्टिंग नहीं की, लेकिन उस पिता के दर्द को जिया.
जब मैंने पहली बार ‘क्रांतिवीर’ में उनका मशहूर डायलॉग सुना था- ‘यह मुस्लिम खून है, यह हिंदू खून है… बताओ कौन सा मुस्लिम है और कौन सा हिंदू?’ तब से लेकर 2026 में रिलीज हुई उनकी आखिरी फिल्म ‘सूबेदार’ तक, नाना ने बार-बार साबित किया कि एक्टिंग सिर्फ डायलॉग बोलने के बारे में नहीं है, बल्कि कैरेक्टर की आत्मा में उतरने के बारे में है. उस उम्र में भी जिस एनर्जी और गंभीरता के साथ उन्होंने ‘सूबेदार’ में एक्टिंग की, उसने नए लोगों के लिए एक मिसाल कायम की.
अब जब नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, तो हिंदी सिनेमा का एक सुनहरा चैप्टर खत्म हो गया है. उनकी जगह कोई नहीं ले पाया और न ही कोई ले पाएगा. वह एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने बॉलीवुड के बने-बनाए नियमों को तोड़ा और अपनी शर्तों पर स्टारडम हासिल किया. नाना भले ही अब इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनकी फिल्में, उनकी निडर पर्सनैलिटी और उनके कहे वे आखिरी शब्द हमेशा मेरे दिल में जिंदा रहेंगे. अलविदा, नाना… इंडस्ट्री और आपके फैंस आपको हमेशा याद करेंगे!



