रावण के पुतलों में दिखती हिंदू-मुस्लिम एकता, भीलवाड़ा में 4 पीढ़ियों से कायम है भाईचारे की परंपरा

Last Updated:October 17, 2026, 19:53 IST
Bhilwara Dussehra Festival: भीलवाड़ा में दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश भी देता है. यहां राजेश कुमार और समद भाई शोरगर के परिवार पिछले चार पीढ़ियों से मिलकर रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले बनाते आ रहे हैं. दोनों परिवारों की यह साझेदारी आपसी प्रेम, विश्वास और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है.
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भीलवाड़ा – दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा में दशहरे का त्योहार हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का भी संदेश दे रहा है. यहां राजेश कुमार और समद भाई शोरगर के परिवार पिछले 4 पीढ़ियों से मिलकर रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले बना रहे हैं. दोनों परिवारों की यह साझेदारी सिर्फ काम तक सीमित नहीं है, बल्कि आपसी प्रेम, विश्वास और गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत मिसाल भी है. राजेश कुमार और समद भाई शोरगर की साझेदारी सिर्फ एक काम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चले आ रहे आपसी विश्वास, सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम एकता की एक खूबसूरत मिसाल भी है.
रावण के पुतले बनाने वाले राजेश कुमार गांछा बताते हैं कि उनके पिता ग्यारसीलाल जी गांछा और सुलेमान जी शोरगर मित्र होने के साथ-सा लंबे समय से साथ मिलकर रावण के पुतले बनाने का काम करते थे. अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी शुरू की गई परंपरा को अगली पीढ़ी आगे बढ़ा रही है. हम पिछले करीब 50 वर्षों से सुलेमान जी शोरगर के परिवार के साथ मिलकर रावण के पुतले बनाने का काम कर रहे हैं. अब सुलेमान जी के बेटे समद भाई शोरगर के साथ हमारी साझेदारी है.
परंपरा अब चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुकीहमारे पिता और उनके पिता अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हम दोनों परिवार मिलकर इस काम को उसी तरह आगे बढ़ा रहे हैं. वह कहते हैं कि इस काम में उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं आई. दोनों परिवार हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के साथ मिलकर काम करते हैं और उनके बीच हमेशा आपसी प्रेम और सहयोग बना रहा है. यह परंपरा अब चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है और नई पीढ़ी भी उनके साथ मिलकर इस काम में हाथ बंटा रही है.
दो-दो पुतलों के साथ जानवरों के पुतले भी भेजे जातेराजेश कुमार के मुताबिक तेजाजी चौक पर 51 फीट ऊंचे रावण के साथ 35-35 फीट ऊंचे कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाए जाते हैं, जिनका दहन किया जाता है. इसके अलावा मजदूर कॉलोनी, लेबर कॉलोनी, सांगानेर, सालेरा और पुर सहित अन्य स्थानों पर भी पुतले भेजे जाते हैं. इन स्थानों पर दो-दो पुतलों के साथ जानवरों के पुतले भी भेजे जाते हैं.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Bhilwara,Rajasthan
First Published :
October 17, 2026, 19:53 IST



