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Animal Care Tips: सितंबर में गाय-भैंसों को इन बीमारियों का खतरा, दूध उत्पादन घटने से पहले पशुपालक कर लें ये काम

Last Updated:September 12, 2026, 21:01 IST

How To Increse Animal Milak Production : सितंबर में पशुओं में पेट के कीड़े, चिचड़ी-किलनी व संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ता है. डीवॉर्मिंग, टीकाकरण व साफ-सफाई से दूध उत्पादन व स्वास्थ्य को बचाया जा सकता है. पशुपालक बाड़े में दवा का छिड़काव और पशुओं के शरीर पर उचित उपचार करें. इससे पशुओं को परजीवियों से बचाने में मदद मिलेगी. इसके अलावा इस मौसम में गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों का खतरा रहता है. अगर मानसून से पहले पशुओं का टीकाकरण नहीं हुआ है तो पशुपालकों को अब इसमें देरी नहीं करनी चाहिए.

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Animal Husbandry: बदलता मौसम सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि गाय-भैंस जैसे दुधारू पशुओं के लिए भी कई बदलाव लेकर आता है. सितंबर में मौसम बदलने के साथ पशुओं में पेट के कीड़े, चिचड़ी-किलनी और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसका सीधा असर पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर पड़ता है. पशु चिकित्सक विनोद चौधरी के अनुसार, इस समय पशुपालक थोड़ी सावधानी बरतें तो पशुओं को स्वस्थ रखने के साथ दूध उत्पादन में होने वाली गिरावट को भी रोका जा सकता है.

पशुओं के पेट में कीड़े होने पर वे चारा तो खाते हैं, लेकिन उसका पूरा पोषण शरीर को नहीं मिल पाता. इससे पशु कमजोर होने लगता है और दूध उत्पादन भी घट सकता है. इसलिए इस मौसम में पशुओं की डीवॉर्मिंग यानी पेट के कीड़े मारने की दवा देना जरूरी है. हालांकि, गाभिन और खाली पशुओं के लिए दवा अलग हो सकती है. ऐसे में पशुपालक बिना सलाह दवा देने के बजाय पशु चिकित्सक से परामर्श लेकर ही डीवॉर्मिंग करवाएं.

चिचड़ी-किलनी भी बन सकती है परेशानीपशु चिकित्सक ने बताया कि पशुओं के शरीर पर चिपकी चिचड़ी और किलनी उनका खून चूसकर उन्हें कमजोर करती हैं. इसके अलावा बाड़े में मच्छरों की संख्या बढ़ने से भी पशुओं को परेशानी हो सकती है. ऐसे में पशुपालक बाड़े में दवा का छिड़काव और पशुओं के शरीर पर उचित उपचार करें. इससे पशुओं को परजीवियों से बचाने में मदद मिलेगी. इसके अलावा इस मौसम में गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों का खतरा रहता है. अगर मानसून से पहले पशुओं का टीकाकरण नहीं हुआ है तो पशुपालकों को अब इसमें देरी नहीं करनी चाहिए. समय पर टीका लगने से पशुओं को गंभीर संक्रामक बीमारियों से बचाने में मदद मिलती है.

सितंबर में बचा लें हरा चारासितंबर के बाद ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे खरीफ के हरे चारे की उपलब्धता कम होने लगती है. वहीं, बरसीम और जई जैसे सर्दी के चारे की शुरुआत होने में समय रहता है. इस बीच चारे की कमी से दूध उत्पादन प्रभावित हो सकता है. खेत में ज्वार, बाजरा या मक्का खड़ा है तो उसे काटकर साइलेज बनाकर सुरक्षित रखें. यह सर्दियों में हरे चारे की कमी के दौरान पशुओं के लिए उपयोगी रहेगा. इसी महीने के अंत तक बरसीम, जई और रिजका की बुवाई के लिए खेत तैयार कर लेना चाहिए.

हीट में आते ही 12 से 18 घंटे का समय अहमपशु चिकित्सक डॉ. विनोद चौधरी के अनुसार, सर्दियों का मौसम गाय-भैंसों में प्रजनन के लिए अनुकूल माना जाता है. पशुपालकों को पशुओं के हीट में आने के संकेतों पर नजर रखनी चाहिए. हीट में आने के करीब 12 से 18 घंटे के अंदर कृत्रिम गर्भाधान करवाना बेहतर रहता है. इसके अलावा उन्नत नस्ल के झोटे या सांड से क्रॉस कराने का विकल्प भी पशुपालक अपना सकते हैं. दुधारू पशुओं को थनैला रोग से बचाने के लिए पशुशाला की साफ-सफाई बेहद जरूरी है. बाड़े का फर्श गीला न रहने दें और जरूरत के अनुसार चूने का पाउडर छिड़कें. पशुशाला में हवा के आवागमन की उचित व्यवस्था रखें.

About the Authorआनंद पाण्डेयContent Producer

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अ…

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Nagaur,Nagaur,Rajasthan

First Published :

September 12, 2026, 21:01 IST

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