Rajasthan

मोबाइल गेम्स और रील्स के दौर में भी कायम है इस देसी खेल का जलवा, करौली में आज भी बच्चों के बीच जबरदस्त क्रेज

Last Updated:August 19, 2026, 17:42 IST

Karauli Hindi News: आज जब बच्चों के मनोरंजन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे में तान-चक्कर जैसे खेल करौली की पुरानी खेल संस्कृति की याद दिलाते हैं. इस खेल में न इंटरनेट चाहिए, न बैटरी और न ही महंगे उपकरण. बस जुगाड़, थोड़ी जगह और खेलने का उत्साह चाहिए. यही कारण है कि करौली में तान-चक्कर केवल एक पुराना खेल नहीं, बल्कि एक ऐसी देसी परंपरा है.

आज के दौर में बच्चों के हाथों में मोबाइल है और मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन ऑनलाइन गेम्स, वीडियो और रील्स बन चुके हैं. पबजी जैसे आधुनिक गेम्स ने बच्चों के खेलने का अंदाज पूरी तरह बदल दिया है. ऐसे समय में पुराने जमाने के कई देसी खेल धीरे-धीरे लोगों की यादों से भी गायब हो चुके हैं. कभी गांवों की गलियों, चौपालों और घरों के आंगन में दिखाई देने वाले ये खेल अब सिर्फ बुजुर्गों के किस्सों में सुनाई देते हैं.

लेकिन राजस्थान के करौली में आज भी तस्वीर थोड़ी अलग है. यहां आज भी एक ऐसा देसी और जुगाड़ से तैयार होने वाला खेल है, जिसने आधुनिक मोबाइल गेम्स के दौर में भी अपनी जगह बनाए रखी है. खास बात यह है कि इस खेल को खेलने के लिए न किसी महंगे खिलौने की जरूरत होती है और न ही मोबाइल की. थोड़े से जुगाड़ से तैयार होने वाला यह खेल बच्चों को घंटों तक अपने साथ जोड़े रखता है. इसे स्थानीय लोग ‘तान-चक्कर’ के नाम से जानते हैं.

करौली के ग्रामीण इलाकों में आज भी कई जगह बच्चे तान-चक्कर खेलते दिखाई दे जाते हैं. हाथ में लोहे की पतली छड़ी और जमीन पर दौड़ता हुआ चक्कर देखकर राह चलते बड़े-बुजुर्ग भी कुछ पल के लिए अपने बचपन में लौट जाते हैं. यह खेल देखने में जितना साधारण लगता है, इसे सही तरीके से चलाना उतना ही आसान नहीं है.

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इस जुगाडू खेल में बच्चों को लोहे की पतली छड़ी यानी ‘तान’ के सहारे चक्कर को संतुलित करते हुए आगे बढ़ाना होता है. जो बच्चा चक्कर को बिना गिराए सबसे ज्यादा दूर तक और तेजी से चला लेता है, उसे इस खेल में माहिर माना जाता है.

तान-चक्कर का खेल सिर्फ खेलने का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के बीच एक तरह की प्रतियोगिता भी बन जाता है. कौन अपने चक्कर को ज्यादा दूर तक ले जाएगा, कौन उसे ज्यादा देर तक बिना गिराए चलाएगा और किसका चक्कर सबसे तेज दौड़ेगा, इसे लेकर बच्चों में खूब उत्साह रहता है.

बचपन में खुद इस खेल के दीवाने रहे स्थानीय अध्यापक तुलसीदास मुद्गल बताते हैं कि तान-चक्कर करौली में आज से करीब 30-40 साल पहले बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ करता था. उस समय मनोरंजन के साधन बहुत सीमित थे, इसलिए बच्चे घंटों तक इसी तरह के देसी खेलों में अपना समय बिताते थे.

वह बताते हैं कि इस खेल में बच्चों को इतना आनंद आता था कि खेलते-खेलते समय कब निकल जाता था, इसका पता ही नहीं चलता था. आज मोबाइल और इंटरनेट के दौर में यह खेल नई पीढ़ी के बच्चों के लिए भले ही किसी अजूबे से कम लगे, लेकिन करौली के ग्रामीण अंचल में तान-चक्कर आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

इस देसी खेल की सबसे खास बात इसका जुगाड़ है. इसे खेलने में लगभग कोई खर्च नहीं आता. लोहे की पतली छड़ और चक्कर से ही पूरा खेल तैयार हो जाता है. यही वजह है कि पुराने समय में यह खेल बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय था. कई बार खेल के दौरान चक्कर या तान में कोई खराबी आ जाए तो बच्चे खुद ही उसे ठीक करने की कोशिश करते हैं. इस तरह खेल के साथ बच्चों को चीजों को समझने और अपने स्तर पर छोटी-मोटी मरम्मत करने का हुनर भी मिलता था.

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August 19, 2026, 17:42 IST

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