1100 साल से विराजमान हैं मां लक्ष्मी, यहां ढलने वाला पहला चांदी का सिक्का देवी को ही चढ़ाया जाता था

Last Updated:July 08, 2026, 12:57 IST
1100 Year Old Mahalakshmi Temple Jaipur History: जयपुर के हवामहल बाजार स्थित चांदी की टकसाल में 1100 वर्ष पुराना महालक्ष्मी मंदिर है. पहले यहां राजपरिवार के सिक्के बनते थे और पहला सिक्का मां लक्ष्मी को अर्पित होता था. मंदिर में मां गजलक्ष्मी की दुर्लभ प्रतिमा है, जिसके पीछे विष्णु भगवान शेषनाग पर विराजमान हैं. राजा-महाराजाओं के समय सिर्फ राजपरिवार के लोगों को ही दर्शन की अनुमति थी, लेकिन 2022 से अब यह आम जनता के लिए खोल दिया गया है. आज भी भक्त यहां चांदी के सिक्के चढ़ाने आते हैं. (498 characters)
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Jaipur: जयपुर अपने ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिरों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. यहाँ की चारदीवारी में ऐसे सैकड़ों वर्ष पुराने मंदिर स्थित हैं, जिनकी अद्भुत मान्यताओं और प्राचीनता के कारण भक्त दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं. ऐसा ही एक स्थान है हवामहल बाजार में स्थित ‘चांदी की टकसाल’ का प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर. यह जयपुर का सबसे पुराना महालक्ष्मी मंदिर माना जाता है. यहाँ स्थापित 1100 वर्ष पुरानी मां लक्ष्मी की प्रतिमा के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है. लोकल-18 की टीम ने इस मंदिर के इतिहास को जानने के लिए पुजारी राजेंद्र कुमार शर्मा से विशेष बातचीत की.
पुजारी राजेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, मंदिर में स्थापित प्रतिमा की स्थापना राजा मानसिंह के दादा द्वारा की गई थी. सदियों पहले इस स्थान पर राजपरिवार के लिए चांदी के सिक्के बनाए जाते थे. उस समय की परंपरा के अनुसार, टकसाल में ढलने वाला पहला सिक्का सबसे पहले मां लक्ष्मी को अर्पित किया जाता था. इसके बाद ही बाकी सिक्के एक गुप्त सुरंग के जरिए सीधे सिटी पैलेस तक पहुँचाए जाते थे. यह मंदिर हवामहल बाजार के ईशान कोण में स्थित है, जिसके कारण स्थानीय व्यापारियों में इस मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा है और कई दुकानों का नाम भी महालक्ष्मी जी के नाम पर रखा गया है.
गजलक्ष्मी रूप की अद्भुत महिमामंदिर के पुजारी बताते हैं कि विग्रह में मां लक्ष्मी को ‘पाताल लोक’ से ‘कमल’ के रूप में निकलते हुए दर्शाया गया है, जो पृथ्वी पर ‘गजलक्ष्मी’ के रूप में विराजमान हैं. प्रतिमा के दोनों ओर दो हाथी और दो उल्लू सुशोभित हैं. विग्रह के पीछे शेषनाग पर भगवान विष्णु विराजमान हैं और ऊपर स्वर्ग लोक का दृश्य है, जिसमें राजा इंद्र अपनी इंद्राणी और ऐरावत हाथियों के साथ मां लक्ष्मी पर पुष्प वर्षा करते हुए दिखाई देते हैं. 11वीं शताब्दी में जब आमेर राजधानी थी, तब यह प्रतिमा वहां की टकसाल में स्थापित थी. बाद में, जयपुर की स्थापना से करीब 100 साल पहले बनी चांदी की टकसाल में इसे स्थानांतरित कर दिया गया. 1727 में जयपुर की स्थापना के साथ ही यह मूर्ति यहीं स्थापित हो गई.
अब आम भक्तों के लिए खुले हैं मंदिर के कपाटइतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि राजा-महाराजाओं के समय में इस मंदिर में केवल राजपरिवार के सदस्यों को ही प्रवेश की अनुमति थी. आम जनता के लिए मंदिर के दरवाजे बंद रहते थे. भक्तों को केवल दीपावली के दिन ही दर्शन का सौभाग्य मिलता था. हालांकि, वर्ष 2022 के बाद से यह मंदिर आम श्रद्धालुओं के लिए हमेशा के लिए खोल दिया गया. किलेनुमा दीवार पर एक मंजिल ऊपर बने इस अनूठे मंदिर में आज भी लोग चांदी के सिक्के अर्पित करने आते हैं. सुबह-शाम होने वाली आरती में शामिल होने के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों की भी भारी भीड़ उमड़ती है.
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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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Jaipur,Jaipur,Rajasthan



