जाति पर गाली प्राइवेट में दी या पब्लिक में, इससे तय होगा मुकदमा, हाईकोर्ट का फैसला

Last Updated:December 18, 2025, 06:46 IST
SC-ST Act News: एससी-एसटी एक्ट (SC/ST एक्ट) के तहत जातिसूचक गाली देने के मामलों में अब यह तय करना जरूरी होगा कि क्या अपमानजनक शब्द सार्वजनिक स्थान पर बोले गए थे या निजी स्थान पर. राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बंद शोरूम के अंदर हुई ऐसी गाली को ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में नहीं माना जा सकता.
राजस्थान हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में 31 साल पुराने सजा को पलट दिया.
SC-ST Act News: एससी-एसटी एक्ट यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम पर एक अहम फैसला सामने आया है. किसी ने जाति को लेकर गाली प्राइवेट में दी या पब्लिक में, अब इससे मुकदमा तय होगा. जी हां, राजस्थान हाईकोर्ट का मानना है कि अगर किसी की जाति को लेकर गाली प्राइवेट में दी गई है तो उससे एससी-एसटी एक्ट का केस नहीं बनता है. यही कारण है कि राजस्थान हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत 31 साल पुरानी सजा रद्द कर दी है. मामला शोरूम में ऋण से खरीदे वाहन के भुगतान को लेकर जुड़े विवाद से था.
दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट के मुताबिक, बंद शोरूम के भीतर हुई कथित जातिसूचक गाली को ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में नहीं माना जा सकता. राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और इस मामले में याचिककार्ता को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि ‘सार्वजनिक दृष्टि’ का मतलब है आम लोगों द्वारा देखा या सुना जाना. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) तभी लागू होती है जब अपमानजनक शब्द आम लोगों की नजर में या सुनाई में बोले जाएं. हाईकोर्ट ने घटना शोरूम के अंदर होने और स्वतंत्र गवाह न होने की पुष्टि की. क्योंकि यह मामला व्यावसायिक विवाद से जुड़ा है, इसलिए इस पर SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) लागू नहीं होगा.
क्या है मामला?मामला 31 साल पुराना है. मामले की शुरुआत 1994 में हुई. तब जोधपुर के एक शोरूम में व्यावसायिक विवाद के दौरान जातिसूचक गाली देने का आरोप लगा. शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से संबंधित रखता था. उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे जाति के आधार पर अपमानित किया. विवाद की जड़ एक वाहन की खरीद से जुड़ी थी. शिकायतकर्ता ने शोरूम से ऋण पर एक वाहन खरीदा था, मकगर भुगतान में देरी हो गई. इसी कारण शोरूम मालिक ने वाहन को जब्त करने की कोशिश की. इस दौरान शोरूम के अंदर दोनों पक्षों के बीच बहस हुई, और आरोप है कि आरोपी ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया. शिकायतकर्ता ने दावा किया कि यह अपमान SC/ST एक्ट के तहत आता है, क्योंकि यह उन्हें सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने का प्रयास था.
ट्रायल कोर्ट का फैसला क्या थाट्रायल कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद 1994 में आरोपी को दोषी ठहराया. कोर्ट ने SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) के तहत सजा सुनाई, जिसमें जाति के आधार पर अपमान करने पर दंड का प्रावधान है. ट्रायल कोर्ट का मानना था कि शोरूम एक व्यावसायिक स्थान है, जहां लोग आते-जाते रहते हैं, इसलिए यह घटना सार्वजनिक दृष्टि में आती है. आरोपी को जेल की सजा और जुर्माना लगाया गया. हालांकि, आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, और मामला हाईकोर्ट पहुंचा. अपील में आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि घटना बंद शोरूम के अंदर हुई थी, जहां कोई बाहरी व्यक्ति मौजूद नहीं था. यह एक निजी विवाद था, न कि सार्वजनिक अपमान.
क्या है एससी-एसटी एक्ट एससी-एसटी एक्ट का पूरा नाम है अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम. यह 1989 में बना एक कानून है. इसका मकसद दलितों और आदिवासियों को जाति के आधार पर होने वाले अपमान, हिंसा और अत्याचार से बचाना है. अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर इन समुदायों के व्यक्ति को जातिसूचक गाली देता है, मारता है या उनकी संपत्ति नुकसान पहुंचाता है, तो उसके खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान है. यह कानून पीड़ितों को तुरंत न्याय और सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है.
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Location :
Jodhpur,Rajasthan
First Published :
December 18, 2025, 06:19 IST
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जाति पर गाली प्राइवेट में दी या पब्लिक में, इससे तय होगा मुकदमा, HC का फैसला



