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Jalore News | Mamaji Ke Mitti Ke Ghode | Viral Story

Last Updated:June 24, 2026, 16:01 IST

Jalore Famous Mama Ji Ke Ghode : जालौर की आहोर तहसील के हरजी गांव में सात कुम्हार परिवार 60 साल से मामाजी के मिट्टी के घोड़े बना रहे हैं, जिनकी मांग गुजरात तक और विदेशों से आए पर्यटकों तक है. शिल्पकार पुखराज प्रजापत ने बताया कि सबसे पहले मिट्टी लाई जाती है, फिर उसे अच्छी तरह गूंथा और तैयार किया जाता है. इसके बाद गांव के बाहर जाकर घोड़ों की नाल तैयार करवाई जाती है. फिर अलग-अलग आकार में घोड़ों के हिस्से बनाए जाते हैं और उन्हें जोड़कर पूरा घोड़ा तैयार किया जाता है.

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जालौर. हरजी गांव की पहचान सिर्फ एक गांव के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी विरासत के रूप में भी है जो मिट्टी से गढ़ी जाती है और आस्था से जुड़ी हुई है. जालौर जिले की आहोर तहसील का यह गांव पिछले करीब 60 वर्षों से ‘मामाजी के घोड़ों’ के निर्माण के लिए जाना जाता है. ये घोड़े केवल मिट्टी की कलाकृति नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर मंदिरों और थानों में अर्पित करते हैं.

हरजी गांव में करीब सात कुम्हार परिवार आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. बिना किसी आधुनिक मशीन के, केवल हाथों की मेहनत और वर्षों के अनुभव से तैयार किए जाने वाले ये घोड़े अपनी बनावट और रंग-रूप के कारण अलग पहचान रखते हैं. एक घोड़ा तैयार करने में कई दिन लग जाते हैं, जिसमें धैर्य और सावधानी दोनों की जरूरत होती है.

कैसे तैयार होते हैं मामाजी के घोड़ेइन घोड़ों की मांग केवल जालौर जिले तक सीमित नहीं है. बाड़मेर, बालोतरा, सिरोही और आसपास के कई इलाकों के साथ-साथ गुजरात से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. लोक देवता मामाजी में आस्था रखने वाले लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर यहां से घोड़े खरीदकर अर्पित करते हैं. यही वजह है कि हरजी गांव की यह परंपरा वर्षों से लगातार चली आ रही है और आज भी उतनी ही मजबूत बनी हुई है. शिल्पकार पुखराज प्रजापत ने बताया कि सबसे पहले मिट्टी लाई जाती है, फिर उसे अच्छी तरह गूंथा और तैयार किया जाता है. इसके बाद गांव के बाहर जाकर घोड़ों की नाल तैयार करवाई जाती है. फिर अलग-अलग आकार में घोड़ों के हिस्से बनाए जाते हैं और उन्हें जोड़कर पूरा घोड़ा तैयार किया जाता है. इसके बाद उसे अच्छी तरह पकाया जाता है और फिर रंग-रोगन किया जाता है. तैयार होने के बाद दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं और घोड़े लेकर जाते हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें मामाजी, झुंझारजी या मल्लिनाथजी के नाम से पूजा जाता है और उसी के अनुसार इनका नाम भी तय होता है. उन्होंने बताया कि एक बार अमेरिका से आए पर्यटक भी यहां से मिट्टी के ये घोड़े अपने साथ ले गए थे, जिससे इस लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिली.

पीढ़ियों से संभाल रहे हैं विरासतशिल्पकार रामलाल ने बताया कि उनका परिवार पीढ़ियों से यह काम करता आ रहा है. उनके बनाए हुए घोड़े जालौर, बाड़मेर, बालोतरा और सिरोही के अलावा गुजरात तक भेजे जाते हैं. लोग मन्नत मानते हैं और पूरी होने पर यहां आकर घोड़े लेकर जाते हैं. यही इस गांव की पहचान बन चुकी है. हरजी गांव के शिल्पकारों के लिए यह काम केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि उनकी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान भी है. बदलते समय में जहां मशीनों ने कई पारंपरिक कलाओं को पीछे छोड़ दिया है, वहीं यहां के कारीगर आज भी अपने हाथों के हुनर से इस विरासत को जिंदा रखे हुए हैं.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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