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बीकानेर में गुनहागारी से बचाइ गई थी मरुस्थल की जीवनरेखा खेजड़ी I rajasthan news I BIKANER NEWS I

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क्या सच में 1794 में पेड़ काटने पर लगता था ऐसा अनोखा जुर्माना, जाने इतिहास

Last Updated:June 22, 2026, 18:27 IST

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, ऐसे में बीकानेर रियासत के 1794 के ऐतिहासिक अभिलेख चौंकाने वाला तथ्य उजागर करते हैं. इन दस्तावेजों के अनुसार उस समय हरी खेजड़ी के वृक्षों की कटाई को दंडनीय अपराध घोषित किया गया था और दोषियों पर आर्थिक दंड ‘गुनहागारी’ लगाया जाता था. इसका उद्देश्य केवल पेड़ों की रक्षा नहीं, बल्कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी, पशुधन, कृषि और ग्रामीण आजीविका को सुरक्षित रखना था। विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था उस दौर में पर्यावरण संरक्षण की बेहद दूरदर्शी और कानूनी पहल थी, जो आज के आधुनिक पर्यावरण कानूनों की पूर्व झलक मानी जा सकती है.

बीकानेर. आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और पर्यावरण संरक्षण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब बीकानेर रियासत के ऐतिहासिक अभिलेख यह साबित करते हैं कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए यहां करीब 230 वर्ष पहले ही सख्त प्रशासनिक व्यवस्था लागू कर दी गई थी. वर्ष 1794 में बीकानेर दरबार ने हरी खेजड़ी के वृक्षों की कटाई को दंडनीय अपराध घोषित करते हुए दोषियों पर आर्थिक दंड लगाने का प्रावधान किया था. उस समय इस दंड को ‘गुनहागारी’ कहा जाता था. यह व्यवस्था बताती है कि तत्कालीन शासन पर्यावरण संरक्षण को लेकर कितना सजग और दूरदर्शी था.बीकानेर रियासत की मोदी लिपि में लिखित कागज बहियों में दर्ज आदेशों से इस ऐतिहासिक तथ्य का खुलासा हुआ है. अभिलेखों में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि यदि कोई व्यक्ति हरी खेजड़ी का वृक्ष काटता है तो उस पर ‘गुनहागारी’ लगाई जाएगी. इसका उद्देश्य केवल एक पेड़ को बचाना नहीं था, बल्कि मरुस्थल की प्राकृतिक संपदा, कृषि व्यवस्था, पशुधन और ग्रामीण समाज की आजीविका को सुरक्षित रखना भी था.

बीकानेर रियासत के ये ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात का सशक्त प्रमाण हैं कि मरुस्थलीय समाज ने सदियों पहले ही यह समझ लिया था कि प्रकृति का संरक्षण ही भविष्य की समृद्धि और जीवन का आधार है. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल ने बताया कि बीकानेर रियासत के ये अभिलेख भारतीय पर्यावरण इतिहास के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं. उनके अनुसार यह आदेश उस दौर में जारी किया गया था, जब दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की आधुनिक अवधारणाएं भी विकसित नहीं हुई थी. इसके बावजूद बीकानेर दरबार ने प्रकृति संरक्षण को शासन की प्राथमिकताओं में शामिल किया और इसके लिए दंडात्मक व्यवस्था तक लागू कर दी. गोयल बताते हैं कि बीकानेर रियासत की सोच केवल वृक्षों की रक्षा तक सीमित नहीं थी. उस समय यह समझ विकसित हो चुकी थी कि यदि खेजड़ी जैसे वृक्ष सुरक्षित रहेंगे तो पशुओं को चारा मिलेगा, खेती को सहारा मिलेगा और मरुस्थल का पारिस्थितिक संतुलन भी बना रहेगा. यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण को सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाज के हितों से जोड़कर देखा गया.  ‘गुनहागारी’ थी प्रभावी दंड व्यवस्थारियासती काल में किसी नियम का उल्लंघन करने पर लगाए जाने वाले आर्थिक दंड को ‘गुनहागारी’ कहा जाता था. बीकानेर दरबार ने खेजड़ी की अवैध कटाई रोकने के लिए इसी व्यवस्था को लागू किया. इससे लोगों में कानून का पालन करने की भावना बनी और प्रशासन को भी वृक्ष संरक्षण के लिए प्रभावी अधिकार प्राप्त हुए. यह उस समय की ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था थी, जो पर्यावरण संरक्षण को कानूनी आधार प्रदान करती थी.

मरुस्थल की जीवनरेखा है खेजड़ीथार

रेगिस्तानी क्षेत्रों में खेजड़ी का विशेष महत्व है. यह वृक्ष कम वर्षा और कठिन जलवायु परिस्थितियों में भी जीवित रहता है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का प्रमुख स्रोत हैं, जबकि इसकी फलियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘सांगरी’ कहा जाता है, राजस्थान के प्रसिद्ध व्यंजनों का हिस्सा हैं. इसकी गहरी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं और भूमि की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती हैं. यही कारण है कि खेजड़ी को मरुस्थलीय क्षेत्रों का ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि खेजड़ी की मौजूदगी से खेतों में नमी बनी रहती है, जैव विविधता को बढ़ावा मिलता है और रेगिस्तानी इलाकों में हरित आवरण सुरक्षित रहता है. यह वृक्ष केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, पशुपालन और कृषि अर्थव्यवस्था की भी आधारशिला माना जाता है. आज जब पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार नए कानून बना रही हैं और बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, तब बीकानेर रियासत के वर्ष 1794 के ये अभिलेख एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. ये बताते हैं कि मरुधरा में प्रकृति संरक्षण की परंपरा केवल सामाजिक आस्था तक सीमित नहीं थी, बल्कि शासन की नीतियों और कानूनों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा थी.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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