न खेत जोतने की जरूरत, न बीज बोने का खर्च, बारिश में इस कांटेदार सब्जी से ग्रामीण कमा रहे मोटी रकम

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खेतों की बाड़ में उगता है ये कांटेदार सब्जी, 100 रुपए किलो तक पहुंचा भाव
Last Updated:August 17, 2026, 06:41 IST
Spiny Gourd Vegetable: बारिश का मौसम शुरू होते ही खेतों की बाड़ और झाड़ियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले ककोड़े अब ग्रामीण बाजारों में खास आकर्षण बने हुए हैं. हरे रंग और कांटेदार सतह वाली इस देसी मौसमी सब्जी की मांग बढ़ने से सीकर के बाजार में इसके भाव करीब 100 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं. ग्रामीण परिवार और भील व घुमंतू जनजाति के लोग आसपास की बेलों से ककोड़े तोड़कर बाजार में बेच रहे हैं. खास बात यह है कि ककोड़े की खेती के लिए अलग से खेत तैयार करने या बीज लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. बारिश और नमी मिलते ही इसकी बेल खेतों की मेड़ों, बाड़ और झाड़ियों में तेजी से फैलती है. ग्रामीणों के लिए यह सब्जी स्वाद के साथ बिना बड़े निवेश के अतिरिक्त कमाई का जरिया भी बन रही है. स्थानीय लोगों के मुताबिक ताजा ककोड़े की सब्जी का स्वाद बारिश के मौसम में खास होता है और मांग बढ़ने से अच्छी गुणवत्ता के ककोड़े हाथों-हाथ बिक रहे हैं.
बारिश का मौसम शुरू होते ही खेतों की बाड़ और झाड़ियों में उगने वाले ककोड़े अब ग्रामीण इलाकों के बाजारों की खास पहचान बन गए हैं. कभी खेतों की मेड़ों और बाड़ पर यूं ही नजर आने वाले ककोड़े इन दिनों लोगों की पसंदीदा मौसमी सब्जी बने हुए हैं. हरे रंग और कांटेदार बाहरी सतह वाले ककेड़ों की बाजार में मांग बढ़ने से इनके दाम करीब 100 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं. ग्रामीण और भील और घुमंतू जनजाति के लोग इन्हें प्राकृतिक रूप से उगी बेलों से तोड़कर बाजार में बेच रहे हैं.
ककोड़े किसी विशेष खेत में बोई जाने वाली सामान्य सब्जी नहीं हैं, बल्कि बारिश के मौसम में खेतों की बाड़ और आसपास की झाड़ियों में अपने आप उगने वाली बेल पर लगते हैं. नमी और अनुकूल मौसम मिलते ही इनकी बेल तेजी से फैलने लगती है और कुछ ही समय में बड़ी संख्या में ककोड़े दिखाई देने लगते हैं. यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बारिश के दिनों में खेतों की बाड़ सिर्फ खेतों की सुरक्षा का साधन नहीं रहती, बल्कि परिवारों के लिए मौसमी आमदनी का जरिया भी बन जाती है.
ग्रामीण बाजारों में पहुंचने वाले ककोड़े को देखकर इसकी खासियत का अंदाजा लगाया जा सकता है. छोटे से लेकर बड़े आकार तक के ककोड़े बाजार में बिक्री के लिए आ रहे हैं और खरीदार भी इन्हें पसंद के अनुसार खरीद रहे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक ताजा ककोड़े की सब्जी का स्वाद बारिश के मौसम में अलग ही आनंद देता है. यही पारंपरिक स्वाद इसे दूसरी मौसमी सब्जियों से अलग पहचान देता है और हर साल बरसात में इसकी मांग बढ़ जाती है.
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ककोड़े की खास बात यह भी है कि इसे ग्रामीण परिवार अपनी पारंपरिक रसोई के अनुसार कई तरीकों से तैयार करते हैं. इसकी सब्जी को मसालों के साथ बनाया जाता है और ताजा ककोड़े की सब्जी को स्वादिष्ट माना जाता है. कई परिवार इसे बारिश के मौसम की खास सब्जी के तौर पर देखते हैं. लंबे समय से ग्रामीण खान-पान का हिस्सा रहे ककोड़े अब बाजार में भी अपनी अलग जगह बना रहे हैं, जिससे नई पीढ़ी भी इस देसी और मौसमी सब्जी को पसंद कर रहे हैं.
ककोड़े की बढ़ती मांग ग्रामीणों के लिए भी कमाई का एक दिलचस्प अवसर लेकर आई है. खेतों की बाड़ और झाड़ियों से इन्हें तोड़कर बाजार तक पहुंचाने में घुमंतू जनजाति के लोगों को अतिरिक्त मेहनत तो करनी पड़ती है, लेकिन तैयार फसल खरीदने या अलग से खेत तैयार करने की जरूरत नहीं होती. बारिश के मौसम में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होने वाली यह सब्जी परिवारों के लिए बिना बड़े निवेश के अतिरिक्त आमदनी का साधन बन रही है.
सीकर के बाजार में करीब 100 रुपए किलो तक भाव मिलने से ककोड़े की चर्चा और बढ़ गई है. हालांकि इनके दाम आवक, गुणवत्ता और स्थानीय मांग के हिसाब से ऊपर-नीचे हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा समय में अच्छी गुणवत्ता के ककोड़े हाथों-हाथ बिक रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों से जैसे-जैसे ज्यादा लोग इन्हें तोड़कर बाजार में ला रहे हैं, वैसे-वैसे दुकानों और सब्जी मंडियों में इनकी मौजूदगी भी बढ़ती जा रही है.
भील जनजाति के रमेश ने बताया कि उनका परिवार सुबह-सुबह आसपास के खेतों और खुली जगह पर जाकर ककोड़े को इकट्ठा करता है. जब बड़ी मात्रा में यह ककोड़े इकट्ठा हो जाते हैं तो वे सब्जी बाजार में जाकर खुद ग्राहकों को बेचते हैं. उन्होंने बताया कि अभी इस सब्जी की बड़ी डिमांड है. तीन से चार घंटे में ही कई किलो ककोड़े की सब्जी आसानी से बिक जाती है. उन्होंने बताया कि अभी फिलहाल इसके भाव है 100 से भी अधिक में चल रहे हैं.
First Published :
August 17, 2026, 06:41 IST



