National

OBC क्रीमी लेयर पर क्‍या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला, अब क्‍या चाहती है सरकार? – OBC Creamy layer upsc civil services supreme court centre fresh plea

होमताजा खबरदेश

OBC क्रीमी लेयर पर क्‍या था SC का फैसला, UPSC मामले में क्‍या चाहता है केंद्र?

Last Updated:August 25, 2026, 09:27 IST

OBC Creamy Layer: अन्‍य पिछड़ी जातियों में क्रीमी लेयर का मुद्दा एक बार फिर से उठ खड़ा हुआ है. इस बार यह मामला UPSC सिविल सर्विसेज से जुड़ा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले 11 मार्च 2026 को महत्‍वपूर्ण फैसला दिया था. अब केंद्र ने इस मामले में शीर्ष अदालत में याचिका दायर स्‍पष्‍ट दिशा-निर्देश मांगा है.OBC क्रीमी लेयर पर क्‍या था SC का फैसला, UPSC मामले में क्‍या चाहता है केंद्र?ZoomOBC क्रीमी लेयर को लेकर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. (फाइल फोटो)

OBC Creamy Layer: अदर बैकवर्ड क्‍लास या अन्‍य पिछड़ी जातियों (OBC) के क्रीमी लेयर का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में है. यह मामला संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सर्विसेज परीक्षा से जुड़ा तकरीबन 10 साल पुराना मामला है. यूपीएससी-सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सफल OBC कैटेगरी के तकरीबन 100 कैंड‍िडेट को कार्मिक विभाग (DoPT) ने अयोग्‍य घोषित कर दिया था. विभाग ने क्रीमी लेयर को आधार बनाते हुए यह कदम उठाया था. बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. शीर्ष अदालत ने 11 मार्च 2026 को इन सभी अभ्यर्थियों के दावों पर विचार करने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट की 2 जजों की बेंच ने कहा था कि सिर्फ आय को आधार बनाते हुए क्रीमी लेयर को तय नहीं किया जा सकता है. साथ ही कोर्ट ने केंद्र को इसपर विचार करने के लिए 6 महीनों का वक्‍त दिया था. यह मियाद सितंबर में खत्‍म होने वाली है. इसे देखते हुए DoPT ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस मामले में साफ स्‍पष्‍टीकरण और दिशा-निर्देश देने की मांग की है.

OBC क्रीमी लेयर के मामले में केंद्र सरकार ने ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर स्‍पष्‍टीकरण मांगा है, जब देशभर में आरक्षण के सपोर्ट और उसके खिलाफ आवाजें उठ रही हैं. पहले समझते हैं कि जिस मामले को लेकर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, वह आखिर क्‍या है और DoPT अदालत से क्‍या चाहता है. दरअसल, यह मामला तकरीबन 10 साल पुराना 2015-16 का है. DoPT ने यूपीएससी सिविल सर्विसेज में सफल तकरीबन 100 ओबीसी कैंडिडेट के कैंड‍िडेचर को क्रीमी लेयर के आधार पर खारिज कर दिया था. इन कैंडिडेट्स में से एक रोहित नाथन की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्‍हा और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने 11 मार्च 2026 को अहम आदेश दिया था. बेंच ने कहा था कि ओबीसी कैटेगरी के लिए क्रीमी लेयर का निर्धारण सिर्फ आय यानी इन्‍कम के आधार पर नहीं किया जा सकता है.

केंद्र की क्‍या है चिंता

अब सवाल उठता है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में केंद्र की क्‍या चिंता है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि सिविल सेवा परीक्षा (CSE)-2025 के मामले में कैटेगरी-वाइज मेरिट और आवंटन सूची को अंतिम रूप देने में देरी का व्यापक असर पड़ सकता है. केंद्र के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च का फैसला CSE-2025 का अंतिम परिणाम घोषित होने के 5 दिन बाद आया था, ऐसे में यदि कैटेगरी-वाइज मेरिट और सर्विस अलोकेशन लिस्‍ट को दोबारा अंतिम रूप देने की प्रक्रिया शुरू होती है, तो इसका असर नई बैच के प्रशिक्षण से लेकर वरिष्ठता और वेतन निर्धारण तक पर पड़ सकता है. सरकार ने कहा कि इस देरी का ‘कैस्केडिंग इफेक्ट’ (टॉप टू बॉटम इफेक्‍ट) होगा और एक प्रक्रिया में बदलाव से नियुक्ति से जुड़े कई स्तर प्रभावित हो सकते हैं. केंद्र ने इसी आधार पर मामले में स्पष्टता और उचित दिशा-निर्देश देने का आग्रह किया है.

अक्‍टूबर 2004 का वह पत्र

क्रीमी लेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहा विवाद 14 अक्टूबर 2004 को DoPT की ओर से जारी एक पत्र से जुड़ा है. इस पत्र के जरिए सितंबर 1993 के उस ऑफिशियल मेमोरेंडम (OM) की व्याख्या की गई थी, जिसमें OBC के लिए क्रीमी लेयर तय करने के इन्‍कम क्राइटेर‍िया में वेतन और कृषि से होने वाली आय को बाहर रखा गया था. साल 2004 के स्पष्टीकरण में कहा गया कि सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) और प्राइवेट सेक्‍टर में कार्यरत कर्मचारियों की वेतन आय को क्रीमी लेयर तय करने में आधार बनाया जाएगा. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस व्यवस्था से सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और PSU या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव पैदा हुआ. उनका कहना है कि 2004 का स्पष्टीकरण प्रभावी रूप से 2014 तक लागू नहीं हुआ, जबकि बाद में इसे सिविल सेवा परीक्षा-2015 से लागू किया गया.

100 कैंडिडेट प्रभावित

इसके बाद करीब 100 ऐसे अभ्यर्थियों के OBC दावे क्रीमी लेयर के आधार पर खारिज किए गए, जिन्होंने सक्षम अधिकारियों से जारी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर परीक्षा पास की थी. इनमें से अधिकांश अभ्यर्थी सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं में पक्षकार हैं. खास बात यह है कि कुछ अभ्यर्थियों को UPSC या राज्य संस्थाओं की अन्य परीक्षाओं में OBC दर्जा मिला, लेकिन CSE प्रक्रिया में उनका दावा खारिज कर दिया गया. अब इस पेचीदा मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्‍पष्‍ट दिशा-निर्देश देने की मांग की है.

About the AuthorManish Kumar

बिहार, उत्‍तर प्रदेश और दिल्‍ली से प्रारंभिक के साथ उच्‍च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्‍लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…

और पढ़ेंLocation :

New Delhi,Delhi

First Published :

August 25, 2026, 09:05 IST

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj