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बंटवारे ने उजाड़ दी पूरी दुनिया, रिफ्यूजी कैंपों की छाननी पड़ी खाक, बेघर होने के दर्द ने बनाया ‘सागर सरहदी’

Last Updated:May 11, 2026, 05:31 IST

आज की युवा पीढ़ी मशहूर स्क्रिप्ट राइटर और निर्देशक सागर सरहदी के काम से वाकिफ न हों, लेकिन उन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी सिनेमा को संपन्न बनाया है. 1947 के बंटवारे ने उनके जीवन पर गहरा असर डाला. अपने घर से उजड़ने के इसी दर्द को उन्होंने अपने नाम ‘सरहदी’ के जरिए ताउम्र जिंदा रखा. उन्होंने मुंबई में कड़े स्ट्रगल के बाद ‘कभी-कभी’, ‘सिलसिला’ और ‘बाजार’ जैसी कालजयी फिल्मों के जरिए अपनी पहचान बनाई. वे सिर्फ पुरानी पीढ़ी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि ‘कहो ना प्यार है’ जैसी मॉडर्न फिल्मों में भी अपना जादू बिखेरा. 2021 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके लिखे डायलॉग आज भी बंटवारे के दर्द और मानवीय संवेदनाओं को बखूबी बयां करते हैं.

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कलम का जादूगर, बंटवारे ने उजाड़ दी दुनिया, रिफ्यूजी कैंपों की छाननी पड़ी खाकZoomसागर सरहदी ने ‘बाजार’ नाम की फिल्म भी डायरेक्ट की है.

नई दिल्ली: सागर सरहदी का नाम जहन में आते ही ‘कभी-कभी’ और ‘बाजार’ जैसी फिल्मों की याद ताजा हो जाती है, लेकिन उनके असली वजूद के पीछे बंटवारे का एक गहरा जख्म छिपा था. 11 मई 1933 को बाफा (अब पाकिस्तान) में जन्में गंगासागर तलवार का बचपन पहाड़ों, दरियाओं और खुली वादियों के बीच बीता. लेकिन जब वे महज 14 साल के थे, तब देश के बंटवारे ने उनकी पूरी दुनिया उजाड़ दी. अपना हंसता-खेलता घर छोड़ उन्हें रिफ्यूजी कैंपों की खाक छाननी पड़ी. इसी बेघर होने के दर्द ने गंगासागर तलवार को ‘सागर सरहदी’ बना दिया. उन्होंने अपने नाम के साथ ‘सरहदी’ इसलिए जोड़ा ताकि वे दुनिया को बता सकें कि सरहदें सिर्फ जमीन नहीं बांटतीं, बल्कि इंसान के दिल को भी चीर देती हैं.

मुंबई का सफर उनके लिए आसान नहीं था. पेट पालने के लिए कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं, लेकिन उनका मन तो कहानियों और नाटकों में बसता था. जब उन्होंने कलम उठाई, तो उर्दू साहित्य और थिएटर की दुनिया में तहलका मचा दिया. ‘शहीद भगत सिंह’ और ‘हीर रांझा’ जैसे उनके नाटक खूब मशहूर हुए. जल्द ही उनकी प्रतिभा को यश चोपड़ा जैसे दिग्गजों ने पहचाना और फिर शुरू हुआ फिल्मी पर्दे पर उनके शब्दों का जादू. उन्होंने ‘कभी-कभी’, ‘सिलसिला’, ‘चांदनी’ और ‘नूरी’ जैसी कालजयी फिल्मों के संवाद लिखे. उनकी लिखी लाइनें ऐसी होती थीं जो सीधे दिल को छू जाती थीं, क्योंकि उनमें बनावटीपन नहीं, बल्कि जिंदगी का असली तजुर्बा और सरहद पार से आई वो टीस झलकती थी.

‘कहो ना प्यार है’ के लिए भी किया कामसागर सरहदी सिर्फ पुराने दौर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने बदलते सिनेमा के साथ खुद को ढाला. जब राकेश रोशन ने ऋतिक रोशन को ‘कहो ना प्यार है’ से लॉन्च किया, तब भी उन्होंने डायलॉग्स के लिए सागर साहब पर ही भरोसा जताया. 1982 में फिल्म ‘बाजार’ के जरिए उन्होंने निर्देशन में भी अपनी धाक जमाई, जिसे आज भी एक क्लासिक माना जाता है. 22 मार्च 2021 को भले ही वे इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनके लिखे डायलॉग और उनकी वह ‘सरहदी’ पहचान आज भी हर उस इंसान को याद आती है जो अपनी जड़ों से उखड़ने का दर्द समझता है. वे सचमुच एक ऐसे शायर थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी उस पल-दो-पल की शायरी के नाम कर दी, जो अमर हो गई.

About the AuthorAbhishek NagarSenior Sub Editor

अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और पॉल…और पढ़ें

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