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Pigeons Detecting Cancer in CT Scans : सीटी स्कैन देखकर कबूतरों ने बता दिया कहां है कैंसर वाला ट्यूमर, मेडिकल साइंस में मचेगा तहलका | Cancer Screening

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डॉक्टर भी खा गए धोखा, लेकिन सीटी स्कैन देखकर कबूतरों ने बता दिया कहां है कैंसर

Last Updated:June 24, 2026, 23:02 IST

Pigeons Detecting Cancer in CT Scans: कैंसर जैसी बीमारी का पता लगाने में अब कबूतर मेडिकल साइंस की मदद करेंगे. एक नई रिसर्च में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. अमेरिका के एक रिसर्चर ने छह कबूतरों को सीटी स्कैन देखकर लंग कैंसर पहचानने की ट्रेनिंग दी. इसके नतीजे बेहद शानदार रहे. इंसानी दिमाग स्कैन में जो ट्यूमर नहीं देख पाता, उसे कबूतर आसानी से पकड़ लेते हैं.डॉक्टर भी खा गए धोखा, लेकिन सीटी स्कैन देखकर कबूतरों ने बता दिया कहां है कैंसरZoomरेडियोलॉजिस्ट से ज्यादा स्मार्ट हैं कबूतर! सीटी स्कैन देखकर लगा लेते हैं लंग कैंसर का पता. (Photo Made With AI)

नई दिल्ली: कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं. इस बीमारी में मरीज की जान बचाने के लिए समय पर इसका पता चलना बहुत जरूरी है. सीटी स्कैन में किसी गड़बड़ी को देखकर रेडियोलॉजिस्ट अक्सर कैंसर का पता लगाते हैं. लेकिन कई बार रेडियोलॉजिस्ट भी गलती कर बैठते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक हर दस में से तीन स्कैन में रेडियोलॉजिस्ट ट्यूमर पकड़ने में चूक जाते हैं. यह मरीजों की जान के लिए बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि बीमारी बढ़ती जाती है. लेकिन अब इस परेशानी का हल बहुत ही अजीब तरीके से निकाला गया है. अमेरिका में एक रिसर्चर ने इस काम के लिए कबूतरों की मदद ली है. जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा. कबूतर अब लंग कैंसर का पता लगाने में वैज्ञानिकों की मदद कर रहे हैं.

कबूतर सीटी स्कैन देखकर कैसे लगा लेते हैं लंग कैंसर का पता?

मैसाचुसेट्स के कॉलेज ऑफ द होली क्रॉस में एक रिसर्चर डॉ ग्रेगरी डिगिरोलामो ने यह अनोखी रिसर्च की है. उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर छह कबूतरों को खास ट्रेनिंग दी. इन कबूतरों को सीटी स्कैन के छोटे वीडियो दिखाए गए. उन्हें यह तय करना था कि लंग्स में कोई नोड्यूल यानी गांठ है या नहीं. यह गांठ आगे चलकर कैंसर का रूप ले सकती है.

इस ट्रेनिंग का तरीका बहुत ही आसान और दिलचस्प था. आधे कबूतरों को ट्यूमर सही पहचानने पर खाने का इनाम दिया गया. बाकी आधे कबूतरों को एकदम साफ स्कैन पहचानने पर इनाम मिला. धीरे-धीरे इन कबूतरों ने यह काम बहुत अच्छे से सीख लिया. वे बिना ट्यूमर वाले और ट्यूमर वाले स्कैन में आसानी से फर्क करने लगे. सबसे बड़ी बात यह है कि कबूतरों ने नए स्कैन में भी बिल्कुल सही पहचान की जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे.

इंसान का दिमाग सीटी स्कैन में कैंसर का ट्यूमर क्यों नहीं देख पाता?

इंसानी दिमाग की अपनी कुछ खास सीमाएं होती हैं जो कई बार भारी पड़ जाती हैं. डॉ ग्रेगरी ने 2025 में अपनी एक अहम स्टडी पब्लिश की थी. इसमें उन्होंने बताया था कि रेडियोलॉजिस्ट का दिमाग स्कैन में ट्यूमर देख लेता है. लेकिन उनका कॉन्शस दिमाग इसे समझ नहीं पाता है और वे स्कैन को नॉर्मल बता देते हैं.

आई-ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी से पता चला कि जब रेडियोलॉजिस्ट किसी ट्यूमर को देखते हैं तो उनकी आंखें वहां ठहर जाती हैं. उनकी आंखों की पुतलियां भी बड़ी हो जाती हैं जो एक अहम संकेत है. उनकी आंखों और दिमाग को पता होता है कि कुछ गड़बड़ है. लेकिन यह जानकारी उनके कॉन्शस दिमाग तक नहीं पहुंच पाती है. इसलिए डॉक्टर उस ट्यूमर को अनदेखा कर देते हैं.

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इस ट्रेनिंग का तरीका बहुत ही आसान और दिलचस्प था. आधे कबूतरों को ट्यूमर सही पहचानने पर खाने का इनाम दिया गया. बाकी आधे कबूतरों को एकदम साफ स्कैन पहचानने पर इनाम मिला. धीरे-धीरे इन कबूतरों ने यह काम बहुत अच्छे से सीख लिया. वे बिना ट्यूमर वाले और ट्यूमर वाले स्कैन में आसानी से फर्क करने लगे. सबसे बड़ी बात यह है कि कबूतरों ने नए स्कैन में भी बिल्कुल सही पहचान की जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे.

इंसान का दिमाग सीटी स्कैन में कैंसर का ट्यूमर क्यों नहीं देख पाता?

इंसानी दिमाग की अपनी कुछ खास सीमाएं होती हैं जो कई बार भारी पड़ जाती हैं. डॉ ग्रेगरी ने 2025 में अपनी एक अहम स्टडी पब्लिश की थी. इसमें उन्होंने बताया था कि रेडियोलॉजिस्ट का दिमाग स्कैन में ट्यूमर देख लेता है. लेकिन उनका कॉन्शस दिमाग इसे समझ नहीं पाता है और वे स्कैन को नॉर्मल बता देते हैं.

आई-ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी से पता चला कि जब रेडियोलॉजिस्ट किसी ट्यूमर को देखते हैं तो उनकी आंखें वहां ठहर जाती हैं. उनकी आंखों की पुतलियां भी बड़ी हो जाती हैं जो एक अहम संकेत है. उनकी आंखों और दिमाग को पता होता है कि कुछ गड़बड़ है. लेकिन यह जानकारी उनके कॉन्शस दिमाग तक नहीं पहुंच पाती है. इसलिए डॉक्टर उस ट्यूमर को अनदेखा कर देते हैं.

डॉ ग्रेगरी इसी बिना सोचे समझे काम करने वाले विजुअल सिस्टम को समझना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने कबूतरों का इस्तेमाल किया क्योंकि उनका विजुअल सिस्टम इंसानों के अनकॉन्शस विजुअल सिस्टम जैसा ही काम करता है.

क्या बिना ट्रेनिंग के भी कबूतरों ने पहचानी फेफड़ों की गंभीर बीमारियां?

इस रिसर्च में सबसे चौंकाने वाली बात कुछ समय बाद सामने आई. जब कबूतरों ने लंग नोड्यूल पहचानना सीख लिया तो उन्होंने दो और बीमारियां भी पहचान लीं. इन दोनों बीमारियों के लिए उन्हें कोई खास ट्रेनिंग नहीं दी गई थी. इसमें पहली बीमारी एमफिसेमा थी. इस गंभीर बीमारी में फेफड़ों के एयर सैक पूरी तरह डैमेज हो जाते हैं. दूसरी बीमारी ग्राउंड-ग्लास नोड्यूल थी जो शुरुआती लंग कैंसर का बड़ा संकेत होती है.

डॉ ग्रेगरी ने इस बारे में बताया, ‘इंसानी आंखों को यह दोनों बीमारियां लंग नोड्यूल से बिल्कुल अलग लगती हैं.’ लेकिन कबूतरों ने जिस तरह से अपना काम किया उससे एक नई बात सामने आई. इससे पता चलता है कि इन तीनों बीमारियों में कोई एक कॉमन विजुअल साइन जरूर मौजूद है. इंसानी दिमाग भी शायद इस अहम साइन को पकड़ लेता है. लेकिन डॉक्टर का कॉन्शस दिमाग स्कैन को पूरी तरह नॉर्मल बता देता है.

कबूतरों की इस अनोखी रिसर्च का मेडिकल साइंस में कैसे होगा बड़ा इस्तेमाल?

आपको यह जानकर पूरी राहत मिलेगी कि आपके अगले चेकअप में कोई सफेद कोट पहने कबूतर नहीं बैठा होगा. डॉ ग्रेगरी इस शानदार रिसर्च का इस्तेमाल पावरफुल मेडिकल एआई टूल्स बनाने में करना चाहते हैं. ये एडवांस एआई टूल्स डॉक्टरों को स्कैन बहुत बारीकी से देखने में मदद करेंगे. वे आई-ट्रैकिंग और आंखों की पुतलियों के फैलने वाले फिजियोलॉजी डेटा का इस्तेमाल करेंगे.

इससे यह पता चलेगा कि रेडियोलॉजिस्ट का दिमाग स्कैन में छुपी छोटी बीमारियों पर कैसे रिस्पॉन्स करता है. फिर इस खास डेटा को नए एआई मॉडल में फीड किया जाएगा ताकि गलतियां कम हों. डॉ ग्रेगरी ने बिल्कुल साफ किया, ‘यह मेडिकल एआई किसी रेडियोलॉजिस्ट की जगह नहीं लेगा बल्कि यह केवल एक टूल की तरह उनकी मदद करेगा.’ यह टूल उनके कॉन्शस और अनकॉन्शस दिमाग के बीच के गैप को भरेगा और उनकी क्षमता को बढ़ाएगा.

मेडिकल एआई और इस खास टेक्नोलॉजी का भविष्य में क्या स्कोप है?

इस अनोखी रिसर्च से सिर्फ लंग कैंसर ही नहीं बल्कि कई और फील्ड में बड़े बदलाव आ सकते हैं.

डॉ ग्रेगरी ने इस बारे में बताया, ‘अभी मैं खुद को सिर्फ मेडिकल फील्ड तक ही सीमित रख रहा हूं क्योंकि मेरे लिए यह ज्यादा प्रैक्टिकल है.’ लेकिन उन्होंने उम्मीद जताई कि वे असली और नकली पेंटिंग के बीच भी इस तकनीक का टेस्ट करेंगे.

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